बाल कथा: सच बोलने वाला मकान

बाल कथा: सच बोलने वाला मकान

एक था ठग। राह चलते लोगों को बातों में उलझाकर मूर्ख बनाना उसके बाएं हाथ का खेल था। एक बार वह एक गांव में पहुंचा। उसने पता कर लिया कि गांव में एक बूढ़ा है जिसके पास बहुत पैसा है और वह एकदम अकेला रहता है। शाम के समय ठग बूढ़े के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ। चलते समय वह लंगड़ा रहा था। उसने पुकारा, 'भाई, मेरे पैरों में बहुत कष्ट है। चला भी नहीं जा रहा है।

तभी बारिश शुरू हो गई। ठग भीग गया। बूढ़े व्यक्ति ने दरवाजा खोला और उसे अंदर बुला लिया। ठग तो यही चाहता था। बूढ़े ने उसे पलंग पर बैठाकर कहा, 'मैं तुम्हारे लिए भोजन लेकर आता हूं।

बूढ़े के जाने के बाद वह खुश हो गया कि यहां खूब हाथ मारने का मौका है। तभी बूढ़ा गरमागरम भोजन ले आया। ठग ने छककर खाया तो उसे नींद आने लगी। ठग चाहता था, बूढ़ा सो जाए तो वह घर की तलाशी ले और जो कुछ हाथ लगे, उसे लेकर रफूचक्कर हो जाए लेकिन ठग ने देखा, बूढ़ा जाग रहा है। बूढ़े के सो जाने की प्रतीक्षा करते-करते ठग को कब नींद आ गई, उसे पता ही न चला।

नींद खुली तो सुबह का उजाला फैल चुका था। बूढ़ा हाथ में चाय का प्याला लिए खड़ा था। उसने कहा, 'लगता है, तुम्हें खूब नींद आई। खैर, लो चाय पी लो, फिर मैं तुम्हारे लिए भोजन बनाऊंगा।

ठग ने उठना चाहा पर वह हिल भी न सका। उसके पैरों में बहुत दर्द हो रहा था। उसने कहा, 'बाबा, रात में तो मैं भला-चंगा था।

बूढ़ा हंसकर बोला, 'तुम भूल रहे हो। कल तो तुमने बताया था कि तुम्हारे पैर में दर्द था।

ठग चौंक उठा। वह तो भूल ही गया था कि कल शाम उसने बूढ़े को क्या बताया था। वह हड़बड़ाकर बोला, 'हां, पैर में दर्द तो था पर इतना नहीं कि जितना इस समय हो रहा है।

बूढ़े ने ठग को सहारा देकर बैठाया। फिर कहा, 'घबराओ मत, यहां आकर जैसा सोचो, वैसा ही हो जाता है।

यह सुनकर ठग घबरा गया। एकाएक उसके मुंह से निकला, 'बाबा, मैंने अपना गलत परिचय दिया था। और फिर उसने सब कुछ सच-सच बता दिया।

बूढ़े ने उसकी कमर थपथपाकर कहा, 'कल शाम तुम्हें देखते ही मैं जान गया था कि तुम किस इरादे से मेरे पास आए हो। यहां जो भी आता है, उसे सब कुछ सच-सच बताना ही पड़ता है और फिर वह बदले हुए रूप में यहां से जाता है।

'तो क्या मैं भी बदल सकता हूं? ठग ने घबराकर पूछा।

'तुम बदल गए हो, तभी तो तुमने मुझे सब कुछ सच-सच बता दिया, बूढ़ा बोला।

ठग की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला, 'मैं खूब समझता हूं कि ठगी-चोरी बुरी बातें हैं लेकिन न जाने क्यों मैं अपनी आदत से मजबूर हो जाता हूं।

'अब बुरी आदत तुम्हारी मजबूरी नहीं बन सकेगी। आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं, बूढ़ा बोला।

'लेकिन मैं तो चारपाई से उठ भी नहीं सकता, ठग बोला।

बूढ़े ने कहा, 'तुम आओ तो सही। और फिर बूढ़े ने सहारा देकर ठग को उठाया। ठग को लगा, जैसे उसका सारा दर्द एकाएक छूमंतर हो गया हो। अब वह आराम से ऐसे चल पा रहा था, जैसे दर्द कभी था ही नहीं।

बूढ़े के मकान में एक तहखाना था। उसका दरवाजा बंद था। ठग ने डरे स्वर में पूछा, 'क्या आप मुझे तहखाने में कैद करेंगे?

बूढ़ा जोर से हंसा, 'अरे, नहीं-नहीं। तहखाने में कुछ कैदी हैं। सच बोलने वाला मकान उन्हें अपने आप तहखाने में बंद कर देता है। तहखाने में उन लोगों की बुरी भावनाएं कैद हैं जो मुझे लूटने के इरादे से यहां आए थे।

बूढ़े ने तहखाने का बंद दरवाजा जरा-सा उठाया तो अंदर से रोने-चीखने की आवाजें आने लगीं। ठग को लगा जैसे गरम हवा के झोंकों से उसका मुंह झुलसा जा रहा है। वह घबराकर पीछे हटा तो बूढ़े ने तहखाने का दरवाजा बंद कर दिया। बोला, 'भैया, वे सब तुम्हारे मन की बुरी भावनाएं थीं जो तुम्हारे अंदर से निकलकर यहां कैद हो गई हैं।

'आप हैं कौन? ठग ने डरे हुए स्वर में पूछा।

'मैं कोई नहीं, मन में रहने वाला सच हूं, जो यहां आने वाले व्यक्ति के झूठ को बाहर निकाल देता है।Ó बूढ़े ने हंसकर कहा और तभी ठग बेहोश हो गया। जब उसकी मूर्छा टूटी, तो वह एक मैदान में पेड़ के नीचे घास पर पड़ा था। उसके पास में ही भोजन रखा था।

ठग ने इधर-उधर देखा पर उसे बूढ़ा और उसका मकान कहीं दूर तक भी दिखाई न दिए। वही मकान, जो झूठ बोलने लोगों से बिलकुल सच बुलवा लेता था।

-नरेन्द्र देवांगन

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