बाल कथा: बुद्धिमान मैना

बाल कथा: बुद्धिमान मैना

दिसंबर का महीना था। सांझ घिर आई थी। आकाश में घने काले बादल छाये हुए थे। शरीर को कंपा देने वाली ठंडी ठंडी तेज़ हवा चल रही थी। बिजली रह रहकर कड़कती और आसमान गरजने लगता था। ऐसे आसार बन रहे थे कि जोर से बारिश आयेगी और ओले पडंगे।

उसी समय एक मैना अपने दो छोटे छोटे बच्चों को साथ लेकर, दाने-पानी की खोज में अपने घर से बहुत दूर निकल आई थी। घर बहुत दूर और ऐसा भयानक वातावरण। बच्चे भी तेज़ गति से उड़ नहीं पा रहे थे। इसलिए मैना ने जोखिम उठाना ठीक नहीं समझा और सोचा कि क्यों न किसी सुरक्षित स्थान पर शरण ले ली जाये ?

उसे सामने ही एक बड़ा सा पीपल का पेड़ दिखाई पड़ा। मैना ने बच्चों से कहा-'बच्चों, बूंदा बांदी शुरू हो गई है। मौसम बड़ा खराब है। हम समय से अपने घोंसले में नहीं पहुंच पायेंगे। तुम दोनों मेरे पीछे आओ, सामने ही पीपल का विशाल वृक्ष है। यहां हमें रात बिताने के लिये अच्छा और सुरक्षित स्थान मिल जायेगा।

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बच्चे मां के पीछे पीछे हो लिये।

जब मैना बच्चों को लेकर पीपल के पेड़ पर पहुंची तो देखा कि वहां तो केवल कौवों का ही साम्राज्य था। वे कांव काव करके आपस में झगड़ रहे थे। कभी-कभी उड़कर एक दूसरे पर चोंच से प्रहार भी कर देते थे। उन्हें न तो मौसम की चिंता थी, न ही एक दूसरे का पड़ोसी होने के नाते उनमें परस्पर सद्भाव, प्रेम, एकता और भाईचारे की भावना थी। क्लेश और अशांति के कारण ही शायद वहां कोई दूसरा शांतिप्रिय पक्षी ठहरना पसंद नहीं करता था।

मैना अपने दोनों बच्चों को लेकर एक डाल पर बैठ गई। कौवों को संबोधित करते हुए उसने निवेदन किया, कहा-'बंधुवर ! आप सब देख ही रहे हैं कि मौसम ने बड़ा भयानक रूप धारण कर लिया है। मेरा घोंसला इस स्थान से बहुत दूर है और दो छोटे बच्चों का साथ है, इसलिये दया करके यदि आप लोग मुझे अनुमति दें तो मैं यहां कोई उपयुक्त स्थान चुनकर यहां रात बिताना चाहती हूं।'

किंतु उज्जड और झगड़ालू कौवों के हृदय में मैना और उसके बच्चों के प्रति तनिक भी दया नहीं उमड़ी। वे मैना की बात सुनकर अपने कर्कश स्वर में एक साथ चिल्ला उठे-'नहीं नहीं, तुम यहां नहीं ठहर सकती। यह हमारा स्थान है, कोई धर्मशाला नहीं है। हमारे सिवाय यहां कोई दूसरा नहीं ठहर सकता। हम उसे ठहरने ही नहीं देते। तुम अपने बच्चों को लेकर चुपचाप यहां से भाग जाओ नहीं तो हम तुम्हें मारेंगे।'

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बेचारी मैना कौवों का निर्णय सुनकर घबरा गई। कौवों का ऐसा निर्दयी व्यवहार देखकर उसे अपने और बच्चों के प्राण संकट में नजऱ आने लगे। आसपास ऐसा कोई सुरक्षित वृ़क्ष भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। बस सामने ही आम के पुराने वृक्ष का एक सूखा कंकाल था। मरता क्या नहीं करता। मैना ने साहस और धैर्य को नहीं छोड़ा। वह बच्चों को ढाढस बंधाती हुई उड़कर उस सूखे आम के ठंठ पर आ गई। उसने इधर उधर नजऱ दौड़ाई। अचानक कुछ देखकर उसके चेहरे पर आशा की किरण जाग उठी-'बच्चों, अब घबराने की जरूरत नहीं। हमें यह सूखा और बेकार सा दिखाई देने वाला पेड़ ही आश्रय देगा। देखो, इसके मोटे तने में एक बड़ी और आरामदायक खोखर है। हम रात यहां आराम से और निडर होकर बिता सकते हैं।'

वह दोनों बच्चों को लेकर खोखर में आराम से बैठ गई।

देखते ही देखते तूफान आ गया। तेज़ हवा के साथ बारिश शुरू हो गई। बिजली जोरों से कड़की और मोटे मोटे ओले बरसने शुरू हो गये। ओलों की मार से पेड़ों के पत्ते, फल-फूल सब झडऩे लगे। प्रलय जैसा वातावरण बन गया। मैना बच्चों को अपने से चिपकाये सुरक्षित बैठी परमात्मा का चिंतन कर रही थी।

तूफान छंट गया।

भोर हुई। आसमान बिलकुल साफ था। हल्की हल्की सुनहरी धूप चमक रही थी परंतु रात के तूफान के आंतक का प्रभाव चारों तरफ साफ दिखाई पड़ रहा था। मैना पंख फैला कर बाहर निकली। बच्चों से बोली-'आओ बच्चो, जल्दी से दाना चुगकर घर लौटते हैं। भगवान का लाख लाख शुक्र है, हम अपनी सूझ-बूझ और धैर्य के कारण सही सलामत बच गये।Ó कहकर मैना बच्चों के साथ आकाश में उडऩे लगी।

ओलों की मार से घायल और बारिश की ठंड से ठिठुरे हुए कौवे, कुछ मर गये थे कुछ घायल अवस्था में पड़े कराह रहे थे। वे आकाश में उड़ती हुई मैना को बच्चों के साथ सुरक्षित देखकर आश्चर्य से निहार रहे थे। मैना ने कौवों की ओर इशारा करते हुए बच्चों से कहा-'बच्चों। यह बात हमेशा याद रखना कि जो दुर्जन आपत्ति के समय दूसरों के प्रति सहायता, सहानुभूति और दया नहीं रखते, उनका यही अंजाम होता है।'

- परशुराम संबल

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