बाल कथा: इंसान का दिल

बाल कथा: इंसान का दिल

सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर के चार बच्चे थे सूर्य, चंद्रमा, अंधकार और वर्षा। ईश्वर ने अपने इन बच्चों के खेलने के लिए मुक्त आकाश और विस्तृत पृथ्वी बनाई।
सूर्य और चंद्र आकाश में लुकाछिपी का खेल खेलते जबकि वर्षा और अंधकार असीम पृथ्वी पर क्रीड़ाएं करते। उनके खेलने के लिए नदी, पहाड़, जंगल, मैदान उपलब्ध थे।
प्रारंभ में तो चारों बच्चों में खूब मेल रहा। जब तक वे एकदूसरे को देख न लेते चैन नहीं पड़ता लेकिन कुछ समय बाद इन चारों बच्चों में अपनी-अपनी प्रभुता को लेकर खटपट शुरू हो गई। ईर्ष्या के कारण वे एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाते।
इनकी आपसी खटपट से तंग आकर ईश्वर ने दो प्राणी और बनाए। ये नए प्राणी स्त्री और पुरूष के नाम से जाने गए। दोनों को मानव कहा गया।
मानव के सृजन के बाद ईश्वर ने सोचा कि अब उसे अवकाश ग्रहण कर लेना चाहिए ताकि बिना किसी मध्यस्थ के बच्चे अपनी जीवन की गाड़ी स्वयं चलाए, स्वावलंबी बनें और अपने झगड़े निपटाएं पर वह अपने बच्चों से दूर भी नहीं रहना चाहता था। अत: उसने निश्चय किया कि अज्ञात रूप से निवास करेगा, परंतु उनके सामने नहीं रहेगा। विदा लेने से पहले ईश्वर ने बच्चों को बुलाया और जानना चाहा कि उसके पीछे वे कैसे रहेंगे, क्या-क्या करेंगे?
ईश्वर ने वर्षा से पूछा, 'पुत्री, तुम क्या-क्या करोगी?'
वर्षा ने अपने हृदय में छिपे आक्रोश को वाणी देते हुए कहा, 'मैं सोचती हूं बिना रूके बरसूं ताकि सब कुछ पानी में समा जाए।'
'नहीं, ऐसा मत करना,' ईश्वर ने समझाया और स्त्री-पुरूष की ओर इशारा करते हुए कहा, 'क्या तुम चाहती हो ये दोनों पानी के नीचे रहें? अच्छा हो तुम सूर्य से तय कर लो कि जब तुम बरस लो, वह अपना काम करने आ जाए।' ईश्वर जानते थे कि वर्षा सूर्य से नाराज है।
वर्षा ने उस समय तो हां कर दी, परंतु उसने सोच लिया कि वह सूर्य से तालमेल नहीं करेगी। कहीं तो वह खूब बरस कर अतिवृष्टि ला देगी और कहीं चुप लगा जाएगी, ताकि अनावृष्टि से सूखे की स्थिति बन जाए। बाढ़ या सूखा दोनों स्थितियां मनुष्य को परेशान कर डालेंगी, यह बात वर्षा अच्छी तरह जानती थी।
'और तुम किस प्रकार का व्यवहार करोगे?' ईश्वर ने सूर्य से पूछा।
'मैं तो खूब तेजी से चमकना चाहता हूं और अपने नीचे का सब कुछ जला देना चाहता हूं।' सूर्य ने सभी उपस्थित लोगों पर तिरछी दृष्टि डालते हुए कहा।
ईश्वर ने समझाया, 'नहीं पुत्र, यह ठीक नहीं। इन परिस्थितियों में मेरे नए बच्चे अपना भोजन कैसे प्राप्त कर सकेंगे। तुम सबसे बड़े हो, अत: संयम से रहना। जब पृथ्वी को कुछ समय के लिए गरम कर लो।
तब वर्षा को अवसर देना कि वह इसे फिर तरोताजा कर दे। ऐसा सामंजस्य बनाए रखना।' सूर्य ने कोई उत्तर न देकर चुप रहना ही अच्छा समझा।
'अंधकार, तुम्हारा क्या इरादा है?' ईश्वर ने अगला प्रश्न किया।
'परम पिता, मैं सभी लोकों पर सदा राज करना चाहता हूं,' अंधकार ने अपनी आंखें बंद करते हुए कहा।
आखिर ईश्वर के धैर्य का बांध टूट गया। वे चिल्लाए, 'दया रखो, क्या तुम मेरी सृष्टि के लिए अभिशाप बनना चाहते हो। फिर इस सृष्टि को देख कौन पाएगा, इसका विकास कैसे होगा, इसका भोग कौन कर पाएगा? मेरी मानो, चंद्र को पृथ्वी पर चमकने का अवसर देना। वह तुम्हें भी अवसर देगा।'
ईश्वर ने चंद्र से कुछ नहीं पूछा क्योंकि वह जानते थे कि अपने शीतल स्वभाव के कारण चंद्र किसी के लिए कष्टकारी नहीं होगा। यहां तक कि उसकी छाती कोई रौंदना चाहे, तब भी वह मना नहीं करेगा।
विलंब हो चुका था। अत: ईश्वर ने स्त्री-पुरूष को, बिना कोई प्रश्न किए, आशीर्वाद दिया और सदा के लिए आंखों से ओझल हो गए परंतु प्रेम के वशीभूत हो इंसान के सोए पड़े दिल में अपना सूक्ष्म रूप छोड़ते चले गए। दिल को यह बात पता भी न चल पाई।
हृदय जब सोकर उठा तो उसने देखा कि ईश्वर सभी को छोड़कर वास्तव में चले गए हैं।
उसने सूर्य, चंद्र, वर्षा, अंधकार सभी के पास जाकर परमपिता के बारे में पूछा। उन्होंने दो टूक उत्तर दिया, 'हमें क्या पता?'
निराश हृदय ने अपने आश्रयदाता स्त्री-पुरूष से पूछा कि परमपिता कहां चल गए हैं? उन्होंने कहा, 'हमें भी पता नहीं ईश्वर कहां है, पर उसे तलाश करने में हम तुम्हारी मदद अवश्य कर सकते हैं।'
हृदय प्रसन्न हुआ। उसने कहा, 'मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं ईश्वर से फिर मिलूं लेकिन अब जबकि उसका पता नहीं है, मैं तुम लोगों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसकी तलाश करता रहूंगा।'
और वही हुआ। तब से मनुष्य के सभी बच्चे ईश्वर को चाहने वाले दिल से युक्त होते हैं और सदैव ईश्वर की तलाश में लगे रहते हैं।
- नरेन्द्र देवांगन

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