बाल कथा: प्रश्न का उत्तर

बाल कथा: प्रश्न का उत्तर

पदमपुराण की कथा में एक स्थान पर एक प्रसंग आता है कि एक समय ईश्वर भक्त गजराज कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंडकी नदी में स्नान कर रहा था। स्नान करते समय उसका पैर एक विशालकाय मगरमच्छ ने पकड़ लिया। असहय पीड़ा से कराहते हुए हाथी विष्णु भगवान को पुकारने लगा। जैसे ही भगवान विष्णु के कानों में अपने प्र्रिय गजराज की करूण पुकार पड़ी, वे शंख चक्र और गदा धारण किये अविलंब नंगे पैर उसकी रक्षा के लिए दौड़ पड़े। आते ही उन्होंने चक्र चला कर हाथी को मगरमच्छ के चंगुल से मुक्ति दिलाई।
इसी संदर्भ में एक बार अकबर बादशाह ने भरी सभा में बीरबल से बड़े विनोदी स्वर में पूछा-बीरबल! एक बात बताइये, यह बात हमारी समझ में नहीं आती कि क्या तुम्हारे भगवान के पास दूसरे सेवक नहीं थे जो एक मामूली से हाथी की पुकार सुनकर अपने आप ही नंगे पैर भागे चले आये। इस अदना से काम के लिये तो वे किसी भी देवी देवता को हुक्म दे सकते थे। बादशाह के व्यंग्य को सुनकर सभी दरबारी हंसकर बोले - वाकई सही बात है।
बीरबल को बादशाह की बात कुछ अच्छी नहीं लगी। उनका स्वभाव था कि वे बात को चुपचाप सुन लेते थे। वे उतावलेपन या उत्तेजित होकर तुरंत कोई उत्तर नहीं देते थे। उपयुक्त समय आने पर ही वे सटीक और सही उत्तर देते थे। उस समय भी बीरबल ने कुछ नहीं कहा। केवल मुस्कुरा कर रह गये।
बात आई गई हो गई परंतु बीरबल के मन में बादशाह का प्रश्न खटकता रहा। एक दिन अकबर बादशाह महल के विशाल सरोवर में नौका विहार कर रहे थे। उस समय नाव में उनका पुत्र सलीम भी सवार था। उस दिन बीरबल भी किसी विशेष प्रयोजन से बादशाह के साथ नाव में संवार हुए थे।
जब बीरबल ने देखा कि नाव सरोवर के बीचोंबीच पहुंच गई है तो उन्होंने बड़ी सर्तकता और फुर्ती से बालक सलीम को अपने पीछे छिपा लिया और उसी के आकार और रूप रंग जैसा मोम का पुतला जो उन्होंने राजा की नजरों से रछपाकर रखा था, सरोवर में फेंक दिया। छपाके की आवाज के साथ ज्यों ही अकबर ने यह दृश्य देखा तो उनके होश उड़ गये। उन्होंने सोचा शायद नटखट सलीम ने पानी में छलांग लगा ली है। बदहवास से बादशाह ने आव देखा न ताव तुरंत बिना कुछ कहे सरोवर में छलांग लगा दी। नौकर चाकर इस प्रत्याशित घटना से घबरा उठे। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
अकबर बादशाह तैरते हुए जब मोम के पुतले के पास पहुंचेे तो सारी स्थिति उनकी समझ में आ गई। उन्होंने नाव की ओर देखा तो बालक सलीम नाव में सुरक्षित बैठा बाल स्वभाव से बादशाह की ओर मुस्कुरा रहा था। बादशाह तैरते हुए नाव की तरफ आये और क्रोध में बीरबल पर बरस पड़े- 'बीरबल! यह क्या बचकाना हिमाकत की है तुमने। सलीम का पुतला तुमने पानी में इस तरह क्यों फेंका? जानते हो इस गुस्ताखी के लिए तुम्हें हम कठोर से कठोर दंड दे सकते हैं।
बीरबल हंस पड़ा। बादशाह को बड़े नम्र स्वभाव से उत्तर दिया- महाराज इस धृष्टता के लिए मैं शर्मिंदा हूं। मुझे क्षमा करें हजूर। आपके प्रश्न का उत्तर तो मुझे देना ही था। आप सरोवर में इस तरह नाहक कूद पड़े। यहां तो बहुत से सेवक मौजूद थे जो आपके एक इशारे पर सरोवर में कूदकर सलीम को बचा सकते थे। बादशाह अकबर को भरी सभा में पूछा अपना प्रश्न याद आ गया। वे समझ गये कि बीरबल ने हमें उसी का उत्तर दिया है। अब बादशाह को अच्छी तरह समझ में आ गया था कि भगवान विष्णु गजराज के प्राणों की रक्षा के लिए अपने आप ही क्यों दौड़ पड़े थे। उनके अंर्तमन ने कहा- हे राजन! अपनी संतान के प्रति माता-पिता के ह्नदय में सहज करूणा,ममता और उदारता भरी ही रहती है। हम सब जीव भी तो ईश्वर की संतान हैं। बादशाह ने बीरबल से कहा- मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर तुमने दे दिया है बीरबल। वाकई तुम चतुर और विद्वान हो।
- परशुराम संबल

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