बाल कहानी: टीनएज-एक नाजुक अवस्था

बाल कहानी: टीनएज-एक नाजुक अवस्था

टीनएज एक ऐसा दौर होता है जो टीनएजर्स के लिए भी कठिन होता है और अभिभावकों के लिए भी। बच्चे समझदार हो रहे होते हैं और अपने निर्णय खुद लेना चाह रहे होते हैं। उधर अभिभावक बच्चों को बड़ा होते तो देख रहे होते हैं पर उन्हें बच्चा ही मान खुद निर्णय लेते हैं।

इस अवस्था में बच्चों में बहुत से शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं जिन्हें लेकर भी वे असमंजस में होते हैं। अगर आपका बच्चा भी इस दौर से गुजर रहा है तो कुछ बातों का ध्यान रखकर इस नाजुक अवस्था को आसान बनाएं:-

- बच्चे के साथ अधिक से अधिक समय गुजारने की कोशिश करें। बच्चा जो भी एक्टिविटी पसंद करता है, आप भी उस में भाग लें। अगर आप उसकी इच्छाएं पूरी करेंगे तो वह दोस्तों पर कम निर्भर रहेगा और आपकी दोस्ती पसंद करेगा।

- इस अवस्था में बच्चे के मन में बहुत से सवाल उठते हैं और अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए जब वह अभिभावकों से सवाल करता है तो अभिभावक प्राय: जवाब देने की बजाय डांट देते हैं। बच्चों को उनके सवालों के सही जवाब दें। उन्हें टालें नहीं। अगर आप उन्हें जवाब नहीं देंगे तो वे अपने जवाब ढूंढने दूसरे लोगों के पास जाएंगे और जरूरी नहीं कि जो जानकारी उन्हें मिले, वह सही हो। अधूरी व गलत जानकारी उनके भविष्य पर बुरा असर डाल सकती है।

- बच्चे जो भी कार्य कर रहे हैं, उन्हें करने के लिए उत्साहित करें और उत्साहित करने का सबसे अच्छा तरीका है उनकी प्रशंसा। उनकी कोशिशों की प्रशंसा कीजिए। उनके टेलेंट को पहचानिए। उन्हें उनकी रूचि के अनुसार एक्टिविटी में भाग लेने दें। उन पर ऐसे विषय न थोपें जिनमें उनकी रूचि न हो।

- एक दूसरे को जानें। बच्चे से अपनी जिंदगी को छिपाएं नहीं। बच्चे को देखने दें कि आप अपने निर्णय कैसे लेते हैं, कैसे काम करते हैं? इससे आपके जीवन मूल्य आपके बच्चे में खुद जाएंगे। अगर आप चाहते हैं कि बच्चे में अच्छे संस्कार जाएं तो पहले आप उसके लिए उदाहरण बनें। बच्चे अधिकतर बातें अपने घर से ही सीखते हैं, इसलिए घर का वातावरण अच्छा होना बहुत आवश्यक है। अगर आपके घर का वातावरण शांत नहीं है तो बच्चा असुरक्षा व अकेलापन महसूस करता है।

- आजकल पढ़ाई का बच्चे पर इतना दबाव रहता है कि बच्चा अपनी भूख, नींद तक भूल जाता है। इधर अभिभावक भी बच्चे से इतनी अधिक उम्मीदें रखते हैं जिसे पूरा करने में सभी बच्चे खरे उतरें, यह आवश्यक नहीं। अभिभावक व अध्यापकों की उम्मीदों पर खरा उतरने के चक्कर में बच्चे कई शारीरिक व मानसिक रोगों के शिकार हो रहे हैं और जब कभी वे खुद को असफल पाते हैं तो आत्महत्या जैसे घृणित कार्य तक कर लेते हैं।

पिछले कुछ समय से बच्चों में डिप्रेशन, आत्महत्या आदि के केसों में वृद्धि आई है। अभिभावक यह समझें कि हर बच्चे की मस्तिष्क क्षमता भिन्न होती है और यह जरूरी नहीं कि जैसा दूसरा बच्चा परफार्म कर रहा है आपका बच्चा भी करे। उसकी तुलना दूसरे बच्चे से न कर उसकी परफारमेंस में सुधार लाने का प्रयत्न करें।

- सोनी मल्होत्रा

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