क्यों भागते हैं घर से लोग?

क्यों भागते हैं घर से लोग?

आज का सामाजिक यथार्थ क्या है? जीवन की जटिलता व चीजों के मकडज़ाल में फंसे उपभोक्ताओं का स्वयं कमोडिटी में बदल संवेदनहीन हो जाना, जीवन से सरलता का लुप्त हो जाना, रिश्तों का माधुर्य तनावों के चलते कड़वाहटों में बदल जाना, हर क्षेत्र में गलाकाट अस्वस्थ प्रतियोगिता, जरूरत की वस्तुओं के बढ़ते दाम और नौकरी का अभाव, ऐसे में क्या आश्चर्य कि हर व्यक्ति कुंठित और अकेला होता जा रहा है।
पीढिय़ों का अंतर और बुजुर्गों की अवहेलना, उन्हें हाशिए पर धकिया दिये जाने से कुंठा इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति घर परिवार से, यहां तक कि समाज से पलायन कर जाना चाहता है। यह स्थिति फिर भी आत्महत्या से बेहतर है क्योंकि यहां 'रिकवर' होने का मौका तो है।
नादान उम्र के विद्यार्थी कई बार फेल होना बर्दाश्त नहीं कर पाते। यहां पर उनके अभिभावकों का भी कुछ दोष होता है जो उन्हें असफलता पर प्रताडि़त करते हैं और असफलता का खौफ उनके दिल में जगाए रहते हैं। अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को कई बार वे बच्चों पर थोपना चाहते हैं। माना वे उनका भला चाहते हैं इसलिए उन्हें डांटते मारते हैं पर आज माहौल और सोच बदल गई है। पुरानी सभी बातें अच्छी थीं, ऐसा नहीं है। पहले बच्चों को कड़े अनुशासन में रखा जाता था, वह भी ठीक नहीं था। आज वे विद्रोही बन गए हैं।
बड़े बुजुर्ग आज घरवालों के लिए बोझ हैं। न अब उन्हें पहले सा आदर सम्मान मिलता है, न वे औरों के लिए जरूरी हैं। उनका बोलना तक बेटे बहुओं को नहीं सुहाता। उनसे राय लेना तो दूर, उनके अनुभवों की भी कद्र नहीं। जगदीश प्रसाद रिटायरमेंट के बाद बीवी तक को बुरे लगने लगे। वह भी बेटे बहू की हां में हां मिलाती, उनके साथ ही उन्हें हर समय ताने देती, कौंचती रहती। उनकी मानसिक स्थिति से किसी को जैसे सरोकार न था। वे इतना डिप्रेशन में आ गए कि ऐसी ही मन:स्थिति में सब से वितृष्णा से भर घर छोड़कर चले गए।
बॉलीवुड और मॉडलिंग का ग्लैमर भी लड़के लड़कियों के लिए घर से भागने का एक कारण है। यह बात अलग है कि अंजाम सब का वही होता है। खासकर लड़कियां गलत हाथों में पड़कर अपना जीवन तबाह कर लेती हैं। फिर किस्मत से ही कोई वापस घर पहुंच पाती है।
इसके लिए मां बाप कभी-कभी दोषी हो सकते हैं लेकिन हमेशा नहीं। बच्चे स्कूल, कंपनी और माहौल, जहां टी वी सिनेमा कल्चर हावी हो रहा है, से इतने प्रभावित रहते हैं कि वे मां बाप को सुनते ही नहीं। समझाने पर विद्रोह पर उतर आते हैं। कभी-कभी एक ही मां बाप की दो संतानों में एक बहुत ही नेक, समझदार व आज्ञाकारी निकलती है, दूसरी उद्दंड, नासमझ लड़ाकी। हर बात को न करने, अवमानना करने वाली।
कई बार मानसिक रोगी अपनी धुन में घर छोड़ कर चल देते हैं। उन्हें बरगलाने वालों की भी कमी नहीं। यह एक बहुत ही करूण और दुखद स्थिति है उनके प्रति लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए। वे जिसकी देखरेख में हैं, उनका कर्तव्य है कि वे उनके प्रति गैरजिम्मेदार न बनें।
बिजनेस में घाटा, शेयर में बर्बादी, किसी बेईमान दोस्त, पार्टनर, रिश्तेदार द्वारा आर्थिक चोट देना, दीवालिया हो जाना घर से पलायन का एक अहम कारण है।
कई बार पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचने के लिए लोग घर से पलायन कर जाते हैं। ऐसे लोग पलायनवादी कहलाते हैं जो व्यक्तित्व का शर्मनाक पहलू है।
इसके अलावा कई बार सांसारिक विरक्ति भी पलायन का कारण बन जाती है। ऐसा करना नैतिक अपराध तब है जब व्यक्ति जिम्मेदारी से बचने के लिए यह रूख अपनाता है।
- उषा जैन 'शीरीं'

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