रिश्तेदारों में रिश्तेदारी: उचित या अनुचित

रिश्तेदारों में रिश्तेदारी: उचित या अनुचित

ममेरे, फुफेरे, चचेरे भाई-बहनों, मामा-भांजी, फूफा भतीजी में रिश्ते ज्यादातर मुस्लिम समाज में होते हैं जिसे बिलकुल बुरा नहीं माना जाता किन्तु हिंदू समाज ने ऐसे संबंधों/रिश्तों को असहज और अप्राकृतिक माना है और वैज्ञानिकों ने ऐसे संबंधों के विपक्ष में ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।
असल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नजदीकी रिश्तेदारों में वैवाहिक रिश्ता तय होना इसलिए ठीक नहीं माना गया है क्योंकि ऐसा होने से भावी संतान भी उन्हीं दोषों और व्याधियों से ग्रसित हो जाती है जो उनके माता पिता, दोनों का खानदानी रोग रहा होता है। इसके विपरीत जब मां बाप दोनों अलग अलग खानदानों से आते हैं तब पैतृक रोगों के संतान में आने की संभावना घट जाती है अर्थात् रिश्तेदारी में ब्याह होने से खानदानी रोगों के होने की संभावना यदि 80-90 प्रतिशत होती है तो अलग अलग खानदान में ब्याह होने से ऐसे रोगों के होने की संभावना मात्र 10-20 प्रतिशत ही होती है।
मुस्लिम संप्रदाय में हालांकि निकट के संबंधियों से संबंध जोडऩे का एक मजबूत ऐतिहासिक आधार है किन्तु यदि हम इतिहास का पूर्णत: विश्लेषण करें तो पायेंगे कि संभवत: ऐसे संबंधों को मुस्लिम धर्म में इसलिये ही मान्यता दी गई होगी क्योंकि उस समय मुस्लिम धर्म अपने शुरूआती दौर में था और मुसलमानों की जनसंख्या बेहद कम थी किन्तु अब यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित प्रतीत नहीं होता।
हिंदू समाज तो इसे शुरू से ही वैध नहीं मानता। एक पौराणिक कथा के अनुसार यमी ने अपने भाई यम की तरफ आकर्षित होकर ब्याह का प्रस्ताव रख दिया किन्तु यम ने इसे अनुचित ठहराते हुए एकदम से इंकार कर दिया। अत: ऐसे विवाहों को कानूनी स्वीकृति भी नहीं दी गई है और विज्ञान तो ऐसे संबंधों के विपक्ष में भयंकर प्रमाण प्रस्तुत कर ही चुका है।
अत: इस तरह के सामाजिक, वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण से अनुचित, अवैध वैवाहिक संबंध नहीं बनें, इसके लिए जरूरी है कि आपसी संबंधों की मर्यादा पर ध्यान दिया जाये। युवाओं के माता पिता और संबंधियों को इस संबंध में पहले से ही उन्हें जानकारी देनी चाहिए कि इससे होने वाली वैज्ञानिक हानियों को पूरी तरह समझा देना चाहिए जिससे निकट भविष्य में वे ऐसे किसी भी आकर्षण में बंधने से खुद को बचा सकें और सामाजिक कुंठाओं का शिकार होने से बच जायें।
मैं समझती हूं कि युवा होती किशोरियों की मांएं ऐसे संबंधों की त्रसदी से अपनी संतान को बचाने के लिए ही बड़े होने के साथ-साथ उन पर तरह-तरह की घरेलू पाबंदियां लगाती हैं-चाचा के साथ ऐसे हंसते बोलते हैं'। बड़े भाई के सामने इस तरह से बैठा जाता है। इससे अक्सर युवतियां चिढ़ भी जाती हैं जो सही स्थिति को जाने समझे बगैर स्वाभाविक भी है।
अत: माओं को चाहिए कि अपने आस पास की अच्छी बुरी बातों को अपनी युवा होती हुई बेटी-बेटों के सामने सहज होकर रखें और उनका विचार जानते हुए उन्हें बिलकुल ही दोस्ताना ढंग से समझायें। युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए सेक्स संबंधी शिक्षा भी माता-पिताओं, बड़े बुजुर्गों द्वारा सहज रूप से दी जानी चाहिए।
संबंधों का मर्यादित होना ही सर्वश्रेष्ठ समाज की रचना का दृढ़तम सूत्र बन सकता है। संयुक्त परिवार में हालांकि ऐसे आपसी संबंध अधिक फलते फूलते हैं किन्तु सावधानी हरेक जगह बरतनी चाहिए।
इतिहास में ऐसे संबंध मान्य थे अथवा नहीं, इस पर विचार करने से कुछ भी लाभ नहीं है क्योंकि हमारा वर्तमान और भविष्य ऐसे यौन संबंधों को मान्यता दे ही नहीं सकता क्योंकि इसके विरोध में कई तथ्यपूर्ण वैज्ञानिक और सामाजिक प्रमाण मौजूद हैं। मनोवैज्ञानिकों ने स्पष्टत: स्वीकार किया है कि ऐसे संबंधों के कारण व्यक्ति की प्रतिभा, उसका आत्मविश्वास और उसकी प्राकृतिक भावनाएं आगे चलकर बहुत कुंठित हो जाती हैं।
सही शिक्षा, अच्छे संस्कार, संतुलित बात, व्यवहार और संयमित आचरण द्वारा ही ऐसे संबंधों की बार-बार की पुनरावृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है जो व्यक्तित्व के सही विकास, स्वस्थ संतान और सम्पूर्ण नैतिक सामाजिक विकास के लिए एकदम आवश्यक है।
- अनुचन्दा

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