स्थायी संबंधों का आधार है सीमित व्यवहार

स्थायी संबंधों का आधार है सीमित व्यवहार

समाज का एक सनातन नियम है परस्पर संबंध, सामंजस्य और एक दूसरे को सहन करने और निभाने की प्रवृत्ति। समाज में रहना है तो आस-पड़ोस, रिश्ते-नाते, मित्रता आदि संबंधों को बनाना और निभाना अति आवश्यक है। समाज से कट कर मनुष्य का सुखी रह पाना अत्यंत ही कठिन है।
हर व्यक्ति को किसी न किसी दूसरे व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती ही है और ऐसी स्थिति में यह अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है कि अपने संबंधों की मधुरता को स्थायी बना कर रखा जाये किंतु वर्तमान में अधिकांश यह देखने में आता है कि हमारे संबंध बहुत शीघ्र कटु हो जाते हैं। हम जितनी शीघ्रता से रिश्ते जोड़ते हैं उतनी ही शीघ्रता से रिश्ते तोड़ भी देते हैं। किसी के प्रति भी पूर्ण आस्था, विश्वास, प्रेम और समर्पण की भावना बहुत कम ही मन में उत्पन्न हो पाती है। यों तो यह समस्या पुरूषों में भी पाई जाती है किंतु महिलाओं के संबंध में यह बात बहुतायत के साथ दिखाई देती है। महिलाएं बहुत शीघ्र ही अपने संबंधों के प्रति उदासीन हो जाती हैं। शायद इसका कारण महिलाओं की भावुक प्रवृत्ति होती है जिसके वशीभूत वे जो भी संबंध बनाती हैं, उसके प्रति आवश्यकता से अधिक समर्पित हो जाती हैं किंतु जब उन्हें उसके प्रत्युत्तर में सीमित और शीतल व्यवहार प्राप्त होता है तो उनका मन रिक्त हो उठता है और वे अपने उस रिश्ते के प्रति खीझ और कड़वाहट से भर उठती हैं और जल्द ही उनके रिश्ते टूटने लगते हैं।
यदि हम अपना व्यवहार सीमित और नियंत्रित रखें तो हमें किसी भी रिश्ते और संबंध से इतनी जल्दी ऊब और खीझ महसूस नहीं होगी। सीमित रखने का यह अर्थ नहीं है कि जो भी हमसे मिले, उससे अत्यन्त ही नपे तुले शब्दों में बातचीत करके शीघ्र ही बात समाप्त कर दें बल्कि हमें चाहिये कि हम दूसरों से मात्र उतना ही व्यवहार रखें जितना उनसे प्राप्त हो सके।
हर व्यक्ति समान स्वभाव का नहीं होता और यह अत्यधिक कठिन भी है कि जितना प्रेम और समर्पण हम किसी के प्रति रखते हैं या प्रदर्शित करते हैं उतना ही वह भी करे।
हमारे संबंधों में स्वार्थ भी काफी हद तक छाया रहता है। हम किसी भी व्यक्ति से मित्रता या रिश्ता अकारण ही नहीं जोड़ते। उनके पीछे कहीं न कहीं हमारे मन में यह भावना अवश्य ही रहती है कि वह व्यक्ति हमारे अमुक काम आ सकता है और जब हमारी इच्छा पूर्ण नहीं हो पाती तो हम उस संबंध के प्रति उदासीन हो जाते हैं।
कोई यदि हमारे दुख-सुख में अपने पूर्ण मनोयोग से काम आता है तो हमें यह कतई नहीं सोचना चाहिये कि वह व्यक्ति अपने घर में फालतू है या उसके पास कोई काम-काज नहीं है। कई बार हम ऐसे मामलों में बेहद स्वार्थी हो जाते हैं। किसी की भावना को अनदेखा करना उचित नहीं है।
समाज में रह कर यह सोचना कि हमें किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी, हमारी गलतफहमी है। कई बार ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति हमारे प्रति काफी समय तक बेहद समर्पित रहता है किंतु धीरे-धीरे उसका व्यवहार शुष्क और औपचारिक होता जाता है। ऐसे में हमें यह सोचना चाहिये कि अवश्य हमारे व्यवहार से उसे कहीं न कहीं चोट पहुंची है और हमारा व्यवहार उसके प्रति उतना स्नेहपूर्ण नहीं रहा होगा जितना उसका था पर ऐसा नहीं होता। हम उस व्यक्ति को तो दोष दे देंगे कि वह हमसे खिंचने लगा है किंतु स्वयं के व्यवहार का कभी विश्लेषण नहीं करेंगे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उस खिंचाव के पीछे हमारा शुष्क और स्वार्थपूर्ण व्यवहार रहा हो।
धन ऐसी वस्तु है जो संबंधों की मधुरता में बहुत जल्दी कड़वाहट घोल देती है। जहां तक हो सके, अपनी आवश्यकता स्वयं ही पूर्ण करनी चाहिये। कोई हमसे अधिक अर्जित करता है या कम अर्जित करता है, उसकी स्वयं की आवश्यकताएं हमसे कम हैं या उसे धन की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी हमें है, यह भावना असामाजिक है। हम अपनी आय का निश्चित भाग बैंक में या अन्य कहीं लगा कर जिस प्रकार स्वयं अपने भविष्य के प्रति निश्चिंत होना चाहते हैं उसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी चाहता है, यह बात हमें समझनी चाहिये।
फिर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन की व्यवस्था करना हमारा कर्तव्य है, किसी अन्य से चाहे वह कितना ही निकट संबंधी या अंतरंग मित्र क्यों न हो, वक्त बेवक्त धन की मांग करना अपने संबंधों को स्वयं ही कटु बनाना है।
इसी प्रकार अक्सर महिलाओं की आदत होती है कि वे दूसरों से अपनी घर गृहस्थी के प्रयोगार्थ या अपने निजी प्रयोग के लिये कोई भी वस्तु लाने को निस्संकोच कह देती हैं और फिर उसके पैसे देने के प्रति इतनी अधिक लापरवाह हो जाती हैं कि पूरे माह उन्हें उसकी याद नहीं आती। ऐसा करने के पीछे कारण मुख्य होता है कि वे सोचती हैं कि अगले माह के बजट में समायोजित कर दिया जायेगा। ऐसे में क्या यह सोचना हमारा कर्तव्य नहीं है कि नियमित आय में हमारे उस मित्र या संबंधी के ऊपर वह खर्च अकारण बोझ बन जायेगा।
समाज में रह कर बहुधा सामाजिक व्यवहार के नाते लेन-देन का काफी व्यवहार होता है। दूसरों के यहां विभिन्न उत्सवों पर व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार उपहार या नकदी देता लेता है। यह लेन देन भी कई बार बड़े कड़े अनुभव दे जाता है, अत: लेन-देन के मामले में हमें सतर्कता से काम लेना चाहिये।
उपहार देना कोई अहसान करना नहीं होता है। फिर उपहार छोटा हो या बड़ा, रूचिपूर्वक खरीदा जाना चाहिये न कि यह सोच कर कि यह हमारे उपयोग की वस्तु नहीं है, या उनकी स्थिति हमसे कम है अत: अमुक चीज उनके लिये बेकार है या घर में यह वस्तु फालतू है अत: यही दे दी जाये। आपको जिसने निमंत्रित किया है, उसने यह सोच कर नहीं किया है कि आप उसे उतनी कीमत या उपहार अवश्य ही देंगे।
वर्तमान में हर किसी का जीवन बेहद व्यस्त और आत्मकेंद्रित है। ऐसे में यदि हमसे कोई मित्रता करता है, रिश्ता जोड़ता है या संबंध बनाना चाहता है तो केवल मन की कोमल भावना प्रेम, स्नेह, सौहार्द आदि के वशीभूत होकर न कि हमसे कुछ पाने की आशा में।
- रंजना श्रीवास्तव

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