क्यों होते हैं वो इतने बहानेबाज़

क्यों होते हैं वो इतने बहानेबाज़

बहानों का क्या है। कैसे भी कितने भी कभी भी बनाए जा सकते हैं। बनाते-बनाते अब वो खून में शामिल हो गए हैं। अब भले ही जरूरत हो न हो, चट से जुबान से कोई भी एक पेटेंट बहाना फिसल जाता है। कभी अगर बहाने जान बचाते हैं तो उलटे भी पड़ जाते हैं याने कि जान पर ही बन आती है। यू एस में हुए एक सर्वे के अनुसार बहानेबाजी की आदत पुरूषों में स्त्रियों के मुकाबले ज्यादा होती है।
कुछ बातें बहानों के ताल्लुक जान लें ताकि आप उन्हें पहचानने में माहिर हो जाएं और कोई आपको यूंही बेवकूफ न बना सके।
शुरू से ही - बहाने बनाने में महारथ बचपन से ही हासिल हो जाती है। कई चलता पुर्जा किस्म के लड़कों की सबसे पहले टार्गेट होती है मां जिसे इमोशनली ब्लैकमेल करना भी लड़के खूब जानते हैं। बीवी तो फिर भी उनके बहाने जल्दी समझ जाती है लेकिन बेचारी मां पटावे में बहुत जल्दी आ जाती है। शोध के मुताबिक 70 प्रतिशत लड़के बहाने बनाने में होशियार होते हैं जब कि 30 प्रतिशत लड़कियां ही बहाने बाज होती हैं।
कब बनाते हैं बहाने - किशोर उम्र का रोशन मां के सामने ही चाय के कप में शराब डालकर आराम से पी लिया करता। मां को जरा भी शक नहीं होता। रोहित को अपनी प्रेमिका के साथ वक्त गुजारना होता तो मीटिंग्स का बहाना पेटेंट होता। शीना के तबलावादक मोहनजी जब भी बगैर बताए छुट्टी करते, उनके मोहल्ले की कोई बुढिय़ा मर गई होती थी। (न जाने कितना बड़ा मोहल्ला था जिसमें इतनी सारी बुढिय़ाएं थीं) जीवन में कभी न कभी हम सभी बहाने बनाते हैं, कभी किसी अच्छे मोटिव से, अपनी जान बचाने, अपनी कोई गलती पर पर्दा डालने या महज आदतन अकारण ही।
यह कहना कि पुरूष ही ज्यादा बहानेबाज होते हैं, सही नहीं है। यह आदत की बात है और इसे हम जनरलाइज नहीं कर सकते।
बहाने हम क्यूं बनाते हैं? ऐसा हम अपने डिफेंस मेकेनिज़्म के कारण करते हैं। लाइफ सेविंग ट्रिक्स के अन्तर्गत आती हैं ये ट्रिक्स जो कि महिला पुरूष दोनों ही निस्संकोच वक्त पडऩे पर अपनाते हैं। थोड़ी बहुत बहानेबाजी आर्ट ऑफ लिविंग के अन्तर्गत चलती है। जिन्दगी में सभी को इसे कभी न कभी किसी भी रूप में अपनाना पड़ता है बल्कि समझदारी से की जाए तो यह आपके चरित्र का गुण है, प्लस पॉइंट है। कई लोग यूं बहाना बनाते हैं कि वे तो कभी बहाने बनाते ही नहीं क्योंकि वे बेहद सद्चरित्र हैं। उनकी तो बस सदा क्लीनडीलिंग रहती हैं लेकिन बहाना तो उन्होंने बनाया ही। ताडऩे वाले कयामत की नजर रखते हैं। आपकी बॉडी लैंग्वेज आपकी पोल खोल देती है।
इमेज पर बुरा असर:- साइकोलॉजिस्ट असीम भारद्वाज के अनुसार बहाने बनाने वाले लोग अपनी इमेज स्वयं ही खराब कर लेते हैं। लोगों को वे विश्वसनीय नहीं लगते।
बिहेवियर एक्सपर्ट रीना मुखर्जी की माने तो बहानेबाज लोगों का बहाने बनाने से आत्मविश्वास घटने लगता है। बहानेबाजी उनका ढुलमुल चरित्र दर्शाती है।
हर व्यक्ति यही चाहता है कि घर बाहर दोनों जगह उनकी छवि अच्छी बनी रहे। उनका व्यक्तित्व स्ट्रांग और इम्प्रेसिव लगे।
लेकिन हाय रे, बहानेबाजी की आदत यह सब मटियामेट कर व्यक्तित्व का कबाड़ा कर देती है। इमेज बिगड़ी तो आपका सच भी बहाना लगने लगता है। ये तो बस फेंकू मास्टर हैं। काम न करने के सौ बहाने हैं इसके पास। घर में पत्नी विश्वास नहीं करती, ऑफिस में बॉस। ऐसे में व्यक्ति यही सोचता है क्लीन डीलिंग ही बेस्ट पॉलिसी है। हम भी ट्रांसपरेंट रहें तो सामने वाला भी ट्रांसपरेंट रहेगा। बेमतलब की बहानेबाजी में आखिर रखा ही क्या है?
- उषा जैन 'शीरीं'

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