अति घातक हैं झूठ और बेईमानी

अति घातक हैं झूठ और बेईमानी

मनुष्य की जरूरतें बहुत थोड़ी सी हैं, भोजन, वस्त्र और आवास, साथ में स्वस्थ मनोरंजन, चिकित्सा सुविधा और न्याय के लिए सुरक्षा की व्यवस्था तो प्रशासनिक जिम्मेदारी है। समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति मनुष्य थोड़े से मनोयोग और शारीरिक श्रम द्वारा कर सकता है फिर भी मनुष्य झूठ-प्रपंच और बेईमानी का सहारा क्यों लेता है?
सादगी, सज्जनता और सच जितना आनन्ददायक और सहज-सरल होता है, उसकी तुलना में झूठ और प्रपंच से मन-मस्तिष्क और हृदय पर भारी बोझ लदा रहता है तथा 'बुद्धि' का सारा समय कपट-दुराचरण का ताना-बाना बुनने में खप जाता है।
किसी से धोखा किया गया हो तो मन में आशंका बनी रहती है कि संबंधित व्यक्ति को सच्चाई का पता न लग जाये। किसी का नुक्सान किया हो, झूठ बोला गया हो और समाज में सज्जन बने फिर रहे हों, तो भी मन अपराध-बोध से बच नहीं पाता। बुरे कर्म की सजा सार्वजनिक रूप से भले ही न मिले, किंतु आत्मा-प्रताडऩा से बच पाना सर्वथा कठिन है।
चोरी-बेईमानी झूठ फरेब सब के सब 'लोभ' के आंगन के बिरवे हैं। अत्यधिक लोभ और अहंवृत्ति के पोषण के लिए तथा अपनी महानता-विशिष्टता की छाप जन मानस पर छोडऩे के लिए लोग दम्भ का और झूठ का आश्रय लेते हैं किंतु सच्चाई देर तक छिप नहीं सकती। झूठ और बेईमानी की सजा यह है कि आदमी अंदर ही अंदर घुटता रहता है परंतु किसी से कह नहीं सकता। वह हर पल बेबस और बेचैन रहता है। उसकी मानसिक क्षमताएं यों ही नष्ट होती रहती हैं। शरीर से अच्छा भला दिखते हुए भी वह भीतर से खोखला होता है।
उसे यह आशंका संत्रस्त किये रहती है कि उसकी पोल न खुल जाये। वह जहां-तहां अपना चेहरा छुपाता फिरता है। सच्चाई सामने आते ही झूठा व्यक्ति लोक-प्रतिष्ठा तो खोता ही है, साथ में राजदण्ड भी नहीं बच पाता। झूठ और बेईमानी से बचते हुये सादगी और सच्चाई का जीवन जीना चाहिए।
-घनश्याम प्रसाद साहू

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