अपनी पार्टनर को समझिए

अपनी पार्टनर को समझिए

जब से आदम और हौव्वा का इस धरती पर जन्म हुआ है उसी के साथ शुरू हो गया था स्त्री और पुरूष का यह नायाब रिश्ता। वक़्त गुजऱता गया और बढ़ते गए भावनात्मक रिश्ते। स्त्रियों के मन की चाह बढ़ती गयी, उनका नज़रिया पुरूषों के प्रति बदलता गया। कभी-कभी तो स्त्री पुरूष का यह रिश्ता इस सीमा तक पहुंच जाता है कि उनमें समीप आने की संभावना तक खत्म हो जाती है। स्त्रियों को समझ पाना वैसे बहुत ही मुश्किल काम है। पुरूषों के लिए सारी जिंदगी यह दुविधाजनक स्थिति बनी रहती है कि आखिर स्त्रियां उनसे क्या चाहती हैं? शादी के कई साल हो जाने के बाद भी पुरूष और स्त्री एक दूसरे के साथ उसी चारदीवारी में रहते-रहते अपने रिश्ते की गहराई को जान नहीं पाते। पुरूषों को स्त्रियों की मानसिक स्थिति का आभास तक नहीं होता कि वे अपने पति से क्या चाहती हैं। जीवन के कई पड़ाव अपनी पत्नी के साथ बिताने के बाद भी पुरुष उसकी इच्छाएं जान ही नहीं पाता। छोटी-छोटी नोक-झोंक एक बड़ी लड़ाई का रूप धारण कर लेती है और कई बार तो इसका नतीजा बड़ा भयानक निकलता है। स्त्रियों का दिल मोम की भांति नरम होता है। अगर उनकी ज़रूरतों को पुरूष समझ नहीं पाता तो इससे वे कमज़ोर पड़ जाती हैं। उम्र के नाज़ुक पड़ाव में पुरूष को स्त्री को अच्छे से समझ कर उसका नाजुक से नाजुक समय में भी साथ निभाना चाहिए। स्त्री और पुरूष की गृहस्थी की गाड़ी इन चार चीजों से खिंचती है इसलिए पुरूषों को इन कारणों की गांठ बांध लेनी चाहिए।

- उनके साथ हर मुश्किल मुक़ाम पर दीवार की तरह अडिग रहकर उनका साथ देना चाहिए।

- उन्हें दूसरों के सामने बेइज्ज़त नहीं करना चाहिए।

- उनके पक्ष को बिना सुने उन्हें ग़लत नहीं ठहराना चाहिए।

- उन पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। आइए जानें स्त्रियों की इस स्थिति को अलग-अलग मुक़ाम पर ।

बीस वर्ष की उम्र में:- यह उम्र निश्चित ही काफी खतरनाक होती है। बीस साल की युवती जब जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती है तो ऐसे में उसकी प्रथम चाहत होती है एक पुरूष से दोस्ती। यह दोस्ती साधारण फ्रेंडशिप से शुरू होती है पर धीरे-धीरे समय के साथ स्त्री को लगने लगता है कि उस पुरूष के साथ वह पूरी जिंदगी व्यतीत कर सकती है। इस स्थिति में वह पुरूष से यही चाहती है कि वह उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकारे।

बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि स्त्रियां तो अपनी इच्छाएं पुरूष दोस्त के सामने रख देती हैं पर पुरूषों के ऊपर होती है अपने घर को चलाने की जि़म्मेदारी। वह चाहता है कि वह जीवन में बहुत आगे बढ़े और इस स्थिति में वह स्त्री उसे अपने रास्ते में रूकावट प्रतीत होती है।

बात अगर शादी तक पहुंच भी जाती है और शादी हो भी जाती है तो पुरूषों की जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं पर स्त्रियां उस समय उससे यह अपेक्षा करती हैं कि पति उसे नई-नई जगह पर घुमाए। उन्हें अपना जीवन किसी हिंदी फिल्म की हीरोइन की भांति प्रतीत होता है। ऐसे में उसकी शारीरिक ज़रूरतें भी अपनी चरम सीमा पर होती हैं जिसे उनके पति को समझना चाहिए और उन्हें हर संभव खुशी देनी चाहिए क्योंकि अगर शुरूआती दौर में ही पुरूष अपनी पत्नी का दिल जीतने में सफल हो पाता है तभी उनकी गृहस्थी भी सुखपूर्वक चल सकेगी।

पत्नी को नए रिश्तों को समझने में देर लग सकती है पर उसके दिल में धीरे-धीरे रिश्तों को निभाने की आदत डलवाएं। उसे समझाएं कि शादी सिर्फ पुरूष से ही नहीं, पूरे परिवार के साथ होती है। उसके मां बनने की खुशी में उसका पूरा साथ दें और कोशिश करें कि आप गर्भावस्था के दौरान उसकी आंखों में आंसू नहीं आने देंगे। आने वाले बच्चे के ऊपर पूरा ध्यान रखें।

चालीस साल की उम्र में:- चालीस की उम्र में पति-पत्नी दोनों अच्छी तरह अपने-अपने जीवन में स्थापित हो चुके होते हैं। पत्नी अगर गृहिणी है तो वह उस समय अपने पूरे परिवार से एक अच्छा तालमेल बिठा चुकी होती है। इस समय प्यार का महत्त्व जिंदगी में अधिक रखना चाहिए वरना रिश्तों को कड़वाहट में बदलने में देर नहीं लगेगी।

यह वह दौर है जब आप दोनों के लाडले किशोरावस्था में आ चुके होते हैं और आपके प्यार की उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा ज़रूरत होती है क्योंकि यह अवस्था बच्चों के लिए काफी खतरनाक होती है। ऐसे में आप दोनों को अपने लाड ़से उन्हें सही रास्ता दिखाना है और जीवन के गंभीर पहलुओं से भी अवगत कराना चाहिए।

पचास साल की उम्र: इस आयु के आस पास अवस्था में स्त्रियों का रवैय्या कभी-कभी कुछ अलग सा हो जाता है क्योंकि यह अवस्था होती है 'मेनोपॉज़' यानी 'रजोनिवृत्ति' की। ऐसे में वे या तो डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं या उनमें जीवन जीने की इच्छा ही खत्म हो जाती है। कभी-कभी वे बात-बात पर चिड़चिड़ाती हैं। ऐसे में उनके पति को चाहिए कि उनकी ज़रूरतों को समझे और अपने प्यार से अपनी पत्नी को उस स्थिति से बाहर निकाले।

साठ साल की उम्र में स्त्री को समझना:- यह उम्र का वह दौर होता है जब स्त्री और पुरूष अपने बच्चों का विवाह आदि करके अपनी मुख्य जि़म्मेदारी को पूरा कर चुके होते हैं। उन दोनों को इस समय एक दूसरे के साथ की ज्यादा से ज्यादा ज़रूरत होती है। पति को अपनी पत्नी की मन: स्थिति को समझते हुए उसका पूरा ख्याल रखना चाहिए। पत्नी को भी चाहिए कि वह जीवनसंगिनी के रूप में अपने सारे दायित्व पूरे करे और पति का पूरा ध्यान रखे। यह गृहस्थी का वह सुनहरा दौर होता है जब वे दोनों एक दूसरे को ज्यादा से ज्यादा समझते हैं और अच्छी तरह एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करते हुए जीवन जीते हैं।

याद रखें कि विश्वास और सकारात्मक व्यवहार को अपने जीवन में अपनाना अगर आसान नहीं है तो मुश्किल भी नहीं है। अगर दोनों ने अपने रिश्ते को भली-भांति समझपूर्वक निभाया तो जीवन में खुशियां बिखराने में देर नहीं लगेगी और आपके जीवन में खुशी का दीप सदा यूं ही जलता रहेगा।

-तरन्नुम

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