दांपत्य में बढ़ती दूरियां

दांपत्य में बढ़ती दूरियां

तीस वर्षीय रजनी अपने ही ऑफिस के तिरेपन वर्षीय उच्च अधिकारी श्री पी.के. रमन से प्रेम करने लगी थी। एक सुंदर जवान पढ़ी लिखी स्त्री स्वयं जब किसी पुरुष से पहल करे तो वह भी विश्वामित्र बन ही जाएगा। इस केस की जब उन्होंने तफ्तीश की तो यह बात जाहिर हुई कि रजनी ऐसा महज अपने पति से बदला लेने के लिए कर रही थी। पति को वह जिस ढंग से चलाना चाहती थी, पति उसकी बात सुनने को तैयार न होता क्योंकि उसे लगता रजनी अपने मायकेवालों के इशारों पर चलकर उनका घर ताबाह करने पर तुली है। अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करने के लिए वह उसे उकसाती। ऐसी स्त्री के लिए उसके मन में प्यार व अपनापन होता भी तो कैसे। वे केवल दिखावे भर के लिए पति पत्नी बनकर रह गए थे। मैरिज काउंसलर अश्विनी घोष का मानना है कि यह सब स्त्री के आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने, घर से बाहर रहने तथा ग्लैमर के पीछे भागने का ही परिणाम है। दरअसल अब यह व्यक्तित्वों की लड़ाई जिसे अंग्रेजी में परसेनेलिटी क्लैश कहते हैं, ज्यादा हो गई हैं। पति-पत्नी में तालमेल अब पूर्वानुसार सहज नहीं रह गया। आज कॉलेज लेवल से ही लड़कियां दबंग होने लगी हैं। फिर आज का कल्चर उपन्यास, कहानियां, टी.वी. सीरियल्स, फिल्में उन्हें और हवा देती हैं।

पहले की औरतों को सेवा करने में सुख मिलता था। अब उन्हें सेवा करवाने में मजा आता है। पति आज्ञाकारी हुआ तो ठीक और अगर वह भी दबंग आक्र ामक हुआ तो नतीजा प्रलयंकारी हो उठता है। आज की मूल्यहीन संस्कृति भी बहुत कुछ दांपत्य में दूरियों का कारण है। पहले मनुष्य ईश्वर से, समाज से, खुद से डरता था। वह विवेकशील था। मर्यादा में रहना ही उसके संस्कारों में था। आज मां-बाप और बच्चे सभी बेहद ऊंची उड़ान भरने में विश्वास रखते हैं। यह कसूर किसी व्यक्ति विशेष का न होकर पूरे माहौल का ही है जहां जीवित रहने, अपनी गरिमा आत्मसम्मान बनाये रखने के लिए महत्त्वाकांक्षी होना जरूरी भी हो गया है। इसके लिए स्वाभाविक है कि लड़के लड़की शादी देर से करते हैं जब वे कुछ बन जाते हैं लेकिन तब तक उनकी सामंजस्य स्थापित करने की सामर्थ्य चुक गई होती है।

उनकी अपनी निश्चित धारणाएं, मूल्य, आदतें इतने गहरे उनके मन में पैठ चुके होते हैं जिन्हें बदल पाना उनके लिए मुमकिन नहीं रह जाता। विवाहित जीवन ही मनुष्य के लिए एक नॉर्मल, स्वस्थ, सदियों से आजमाया हुआ जीने का सही तरीका है। एक दूसरे के पूरक होते हैं पति पत्नी। एक के बिना दूसरा अधूरा है। फिर क्यों न आपसी समझदारी, एक दूसरे के प्रति सहानुभूति, आपसी तालमेल, सहनशीलता, प्यार और सहयोग से ही वे अपना दांपत्य सुखमय बना कर रहें।

- उषा जैन शीरीं

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