काँटे ही काँटे हैं प्रेम की राहों में

काँटे ही काँटे हैं प्रेम की राहों में

स्कूल कॉलेज में साथ में पढऩे वाले लड़के लड़कियों के लिए ट्यूशन, कोचिंग, कंप्यूटर प्रशिक्षण आदि कतिपय ऐसे स्थान हैं जहां से प्रेम का बीज अधिकतर अंकुरित होता है और फूटता भी है। साथ-साथ आने जाने, बैठकर पढऩे-लिखने, प्रतिदिन मिलने-जुलने और दोस्ती की प्राथमिक सीढ़ी पर चढऩे का सर्वोत्तम मौका उन्हें मिलता है जिस पर चढ़कर वे प्यार की मंजिलें तलाशने लग जाते हैं।

कुछ लड़के तो ऐसे भी होते हैं जिनका पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं है। वे ट्यूशन या कोचिंग इसलिए ज्वाइन करते हैं कि अमुक लड़की वहां पढऩे जाती है। स्कूल-कॉलेजों में कुसंगति से भी अच्छे और पढऩे-लिखने वाले बच्चे भी इन चक्करों में पड़ जाते हैं। माता-पिता, परिवार और घर के बड़े बुजुर्गों की इज्जत की परवाह न करते हुए प्रेम के पंछी ऐसी उड़ान भरना चाहते हैं जहां अधिकतर, स्वच्छंद श्वास लेना भी दुष्कर होता है। जरा विचार कीजिए कि जिन माता-पिता के यहां हमने जन्म लिया, उनकी ही उंगली पकड़कर चलना सीखा, जिनकी गोद में खेलकर बड़े हुए, उनके साए में पले, जिन्होंने अपना निवाला हमारे लिए बचाकर अपने खून से सींचा पर क्या इन्हीें दिनों के लिए बड़ा किया है कि हम एक तथाकथित प्रेमी के लिए अपने माता-पिता के त्याग और ममता को भूल कर, उनके अरमानों का गला घोंट दें जिनका हम पर पूर्ण अधिकार है।

अपने माता पिता के कभी न चुकाये जाने वाले ऋण को न भूलते हुए उनके बताए हुए रास्तों व आदर्शों पर चलना ही सही दृष्टि में सच्चा प्रेम है, अत: शारीरिक आर्कषण और वासना के बहकावे से दूर हटना वांछनीय है क्योंकि यह वह रास्ता है जिसकी मंजिल का पता मिलना मुश्किल और अत्यन्त दुष्कर भी है। जो इन राहों पर चल पड़े हैं वे जान लें कि बड़े कांटे हैं इस राह में।

-नवीन श्रीवास्तव 'नूतन'

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