जीवन का स्वीट पॉयजन है असंयम

जीवन का स्वीट पॉयजन है असंयम

जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है असंयम। इसके द्वारा जितनी हानि उठानी पड़ती है, उतनी हानि सौ दुश्मन मिलकर भी नहीं पहुंचा सकते। इंद्रियों की एवं मन की सामर्थ्य को सृजनात्मक कार्यों में प्रयुक्त करने की अपेक्षा जब हम उसका अपव्यय अनुपयुक्त दिशा में करते हैं तो वह शक्ति न केवल व्यर्थ ही चली जाती है वरन् उसके अभाव के कारण उत्पन्न हुई दुर्बलता से एवं दुरूपयोग के कारण उत्पन्न हुई हानिकारक प्रतिक्रिया से हमेशा दुखद परिणाम ही सामने आते हैं।

जीभ के असंयम के कारण हम प्राय: अपनी आधी आयु खो देते हैं और एक चौथाई जिंदगी बीमारियों का कष्ट उठाते हुए, हकीम डॉक्टरों के आगे नाक रगड़ते हुए उनकी जेबों को गरम करते हुए ही बिता डालते हैं।

जीभ ही नहीं बल्कि अन्य इन्द्रियों का असंयम भी न्यूनाधिक रूप से ऐसा ही घातक होता है। ब्रह्मचर्य की मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहने के कारण आज अधिकांश नर-नारी गुप्त रोगों से ग्रसित पाये जाते हैं। पुरूषों में स्वप्नदोष, प्रमेह, नपुंसकता, शीघ्रपतन, बहुमूत्र, सुजाक उपदंश आदि अनेक रोग हो जाते हैं।

असंयम के कारणों से ही स्त्रियों में प्रदर, सोम, गर्भाशय में सूजन, गांठें, मासिक धर्म के समय कमर में दर्द, अधिक रक्तस्राव, संतान न होना, होकर मर जाना, प्रसवकाल में भयंकर कष्ट आदि अनेक प्रकार के जननेन्द्रिय संबंधी रोग घर कर लेते हैं। जो लड़के-लड़की विवाह से पूर्व स्वस्थ व सुन्दर रहते हैं, वे असंयम के कारणों से ही अपने स्वास्थ्य का सर्वनाश कर बैठते हैं।

असंयम मीठा विष है। यह मीठी चटनी की तरह सुन्दर तो लगता है परन्तु इसका प्रभाव जीवन पर अत्यंत ही बुरा पड़ता है। क्षणिक सुख की अनुभूति ही परिणाम में विषतुल्य होती है। मानसिक एय्याशी भी ऐसी ही घातक होती है। चटोरेपन व कामुकता की भांति ही उसका भी भयंकर प्रभाव होता है। शौकीन व्यक्ति आये दिन ऐसे अवसरों की तलाश में रहते हैं जिससे मानसिक एय्याशी होती रहे, परन्तु वे यह नहीं समझते कि इससे अपनी कितनी बड़ी हानि कर रहे हैं।

आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए हम अपने बहुमूल्य समय का सत्यानाश करते रहते हैं। जीवन की एकमात्र संपत्ति समय ही है। जो उसका सदुपयोग कर लेता है, वह विजयी बन जाता है और सफल होकर उन्नति के शिखर तक पहुंच जाता है। जिसने लापरवाही के साथ अपने वक्त को काटा, उसके पल्ले हाथ मलते रहना ही पड़ता है।

सवेरे जल्दी उठना, हर काम को फुर्ती और मुस्तैदी से निबटाना, अपने कार्यक्रम में आशावादी और उत्साही रहना, समय विभाजित करके हर काम ठीक समय पर करना एक ऐसा दिव्य गुण होता है, जिसे अपना कर कोई सामान्य स्थिति में पड़ा हुआ मनष्य भी सफलता का वरण कर सकता है।

कई लोग असंयम के वशीभूत होकर दावतों में बहुत खा जाते हैं और बाद में बहुत कष्ट उठाते हैं। इसी प्रकार सामने उपस्थित सुख एवं उपभोग की वस्तुएं धन, ऐश्वर्य, शक्ति, सत्ता, प्रशंसा, प्रतिष्ठा आदि उपस्थित होने पर लोगों की नीयत बिगड़ जाती है। कितनी मात्र उनके लिये पर्याप्त है, कितने का उपयोग उनके लिये संभव है, यह सोचने की अपेक्षा वे अधिकाधिक माया का लालच उसी प्रकार करने लगते हैं जैसे चटोरा आदमी अधिक खाकर मर जाता है।

असंयम के कुचक्र में पड़कर आदमी अपना आपा खो बैठता है और कभी-कभी इंसानियत को छोड़कर हैवानियत का रूप धारण कर लेता है। मानव का मन आज कामवासना एवं मनोरंजन की ओर अधिक दौडऩे लगा है।

घर की स्त्री के रहते हुए भी वह बाहर की स्त्रियों की ओर आकर्षित होता है। इसके पीछे दलील यह होती है कि घर की औरत से उसका मन नहीं भर पाता है। यही भावना असंयम की भावना कहलाती है। घर की वस्तु से संतुष्टि न पाकर बाहर की वस्तु के भ्रमजाल में अपने को फंसाते जाना ही असंयम कहलाता है।

कामवासना, मनोरंजन आदि के अधिकाधिक अवसर प्राप्त करने के लिये लोग इतने बदहवास हो जाते हैं कि अपने स्वास्थ्य का भी ख्याल नहीं करते। मनोरंजन करना एवं कामवासना की क्षुधा को शांत करना जीवन के लिए आवश्यक ही नहीं वरन् परमावश्यक भी है परन्तु संयम की सीमा को लांघकर अपने जीवन को असमय ही बुढ़ापे की ओर धकेल देना तथा अनेक अनचाहे रोगों को बुला कर उसमें फंस जाना क्या बुद्धिमानी है? सभी चीजें एक सीमित मात्र में ही आनंददायक हो सकती हैं। उनकी अति सब प्रकार से घातक ही सिद्ध हो सकती है।

- आनंद कुमार अनंत

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