जानिए प्रेम और वासना में अंतर

जानिए प्रेम और वासना में अंतर

युवावस्था उम्र का वह बसंत है जिसमें हृदय पटल पर प्रेम के फूलों का खिलना लाजिमी है। उम्र के इस मुकाम पर हर किसी की तमन्ना होती है कि उसे किसी का प्रेम मिले या किसी पर अपना प्रेम लुटाया जाए। इसी तमन्ना के प्रभाववश हमारे युवा प्रेम मार्ग पर चल पड़ते हैं किन्तु प्रेम के वास्तविक अर्थ व स्वरूप के ज्ञान के अभाव में आमतौर पर प्रेम के विकृत मार्ग को अपनाते हुए प्रेम को प्रेम का सम्बन्ध न रखते हुए वासना का रिश्ता बना लेते हैं जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अपने भावी जीवन में कई तरह के गंभीर कष्टों व परेशानियों आदि से जूझना पड़ता है।

प्रेम सम्बन्धों का नतीजा चाहे कैसा भी निकले, युवाओं को प्रेम करने से कोई भी रोक नहीं सकता। यह सत्य ही है कि बड़ों की सच्ची सलाह, उनका बन्धन अथवा विरोध भी युवाओं के मन को प्रेम के प्रति आकर्षित होने से रोक नहीं पाता। वैसे भी आधुनिकता और मीडिया के प्रभावस्वरूप प्रेम फैशन की वस्तु बनकर रह गया है और शारीरिक आकर्षण युवा प्रेम का आधार बन गया है। प्रेम के सच्चे अर्थ, उसकी सीमाओं व उसमें निहित नैतिकता के पालन से किसी को कुछ लेना-देना नहीं।

युवाओं को तो अपने यार-दोस्तों पर रौब जमाने व उनके बीच प्रेम के बारे में चटखारे लेकर चर्चा करने के लिए किसी न किसी से प्रेम सम्बन्ध कायम करना ही है। यही वजह है कि मात्र शारीरिक आकर्षण से पनपने वाला यह प्रेम धैर्य व समझ के अभाव में जल्द ही शारीरिक वासना का सम्बन्ध बन कर रह जाता है और अन्तत: जैसे-जैसे वासना बढ़ती जाती है प्रेम की भावनाएं विकृत होती हैं तथा जरा से व्यवधान से ही सम्बन्ध विच्छेद के साथ ही युवाओं को पछतावे के भंवर में डुबो देता है।

किसी से भी प्रेम हो जाना स्वाभाविक ही है व पाप या अपराध भी नहीं है किन्तु विकृत प्रेम का मार्ग अपनाना और नैतिकता की सीमाएं तोड़कर उसे वासना में तबदील करना बुराई है, प्रेम कतई नहीं। सच्चा प्रेम भी वासना के संवेग का रूप कब धारण करता है, इस विषय में मनोवैज्ञानिक सत्य यह है कि प्रेम के दौरान जब युवक-युवती, एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, एकान्त का वातावरण होता है तो वे एक-दूजे के हृदय में निहित भावनाओं को वरीयता देने की बजाय मांसल आकर्षण का शिकार हो जाते हैं।

तब शारीरिक सौन्दर्य से वशीभूत होकर एकाएक सब बातों के अर्थ बदल जाते हैं। वासना के संवेग उफनते शरीर को एक-दूसरे में समा जाने को उकसाते हैं व अपने ऊपर नियन्त्रण न कर पाने की स्थिति में प्रेम आसानी से वासना का सम्बन्ध बन जाता है जिस पर बाद में पछताने के बावजूद युवा बार-बार यही करते रहते हैं।

अत: युवा ध्यान रखें कि प्रेम और वासना के बीच महीन-सा पर्दा होता है जिसे जरा सी भूल, जरा सी चूक हटा सकती है। प्रेम प्रेम है, वासना कतई नहीं और वासना वासना है, प्रेम कतई नहीं। वासना प्रेम के आखिरी पड़ाव शादी के बाद एक-दूजे के बीच आनी चाहिए। वहां भी वासना को गृहस्थ धर्म समझ कर प्रेम की उदात्त भावनाओं से पृथक रखना चाहिए। प्रेम करने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि प्रेम में भावनाओं से ही जुड़ें, शरीर से नहीं।

- कृष्ण कुमार दिलजद

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