मधुर व्यवहार है सुखी परिवार का आधार

मधुर व्यवहार है सुखी परिवार का आधार

हर व्यक्ति की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि उसका एक सम्पन्न व सुखी परिवार हो। घर की व्यवस्था इतनी उत्तम हो कि बड़ों को उचित आदर व श्रद्धा मिले तथा छोटों को स्नेह, भरपूर प्यार और आशीर्वाद।

इस तरह के परिवार के निर्माण में हर व्यक्ति का परस्पर सहयोग होना आवश्यक है वरना कभी-कभी गृहक्लेश और वैचारिक मतभेदों के कारण अच्छे-भले परिवार भी नष्ट हो जाया करते हैं। अत: परिवार की खुशहाली के लिए एक-दूसरे की कोमल भावनाओं व संवेदनाओं को समझकर उनका आदर करना चाहिए।

परिवार के सभी रिश्तों में अटूट बन्धन होता है जिनकी मर्यादा का सम्मान करना हर सदस्य का कर्तव्य होता है। अपने आराम के लिए दूसरों को कष्ट देने और एक-दूसरे की उपेक्षा करने से रिश्तों की यह नाजुक डोर टूट भी सकती है।

आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए पारिवारिक आर्थिक नीति इस प्रकार होनी चाहिए कि प्रतिमाह बजट बनाने की आवश्यकता न पड़े। यह सुविधा बहुत ही सरलता से परिवार के आपसी सामंजस्य से उपलब्ध हो सकती है अगर हर समस्या पर गंभीरता से विचार किया जाये। इससे न केवल वह समस्या दूर होती है अपितु स्नेह भी बढ़ता है। परिवार के बड़े व्यक्तियों की जिम्मेदारी होती है कि वे अपनी आय को पूरे परिवार पर खर्च करें न कि अपनी अनावश्यक निजी पूर्ति के लिए। इसी प्रकार छोटे सदस्यों को चाहिए कि वे सभी बड़ों को सम्मान, आदर व श्रद्धा दें, जिससे बड़े उन पर गर्व कर सकें।

परिवार के बीच स्नेह, संगठन, सहयोग व सद्भाव का तालमेल होना आवश्यक है। बाजार में खाना, कपड़े लांड्री में धुलवाना और अन्य कार्यों के लिए बाजार पर निर्भर रहना जैसे कार्य मतभेदों को जन्म दे सकते हैं, इसलिए जहां तक हो सके, सभी को मिलजुल कर काम करना चाहिए।

पति और पत्नी का रिश्ता परिवार में रीढ़ की हड्डी की तरह होता है जिसमें अत्यंत कोमलता का संबंध होता है। अत: जहां पत्नी का व्यवहार स्नेहिल हो, वहीं पति को भी उसकी संवेदनाओं का आदर करते हुए उसकी उचित आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए।

पति-पत्नी को अपने-अपने जीवन के हर पहलू से एक-दूसरे को अवगत करा देना चाहिए क्योंकि इस पवित्र रिश्ते में गोपनीयता अच्छी नहीं होती।

इसी प्रकार माता-पिता, भाई-बहन, देवर-भाभी के रिश्ते को भी मर्यादा के अन्तर्गत समान आदर व श्रद्धा देनी चाहिए। इस तरह प्रेम-भाव से तीज-त्यौहारों तथा अन्य पारिवारिक आयोजनों का मजा बढ़ जाता है तथा हर समय परिवार में चहल-पहल व खुशी का माहौल रहता है।

सभी सदस्यों को समय-समय पर गोष्ठी करके एक-दूसरे के संस्मरण, प्रसंग, विचार इत्यादि सुनने चाहिये। इससे परिवार में घनिष्ठता आती है।

- मनु भारद्वाज 'मनु'

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