घर जमाई व हमारा समाज

घर जमाई व हमारा समाज

हमारे समाज में घर जमाई बनना उचित नहीं समझा जाता। घर जमाई बनने पर व्यक्ति को प्राय: अपना स्वाभिमान गंवाना पड़ता है। जो प्यार एवं सम्मान उसे अपने परिजनों से मिलता है, वह ससुराल वालों से कभी नहीं मिल पाता। घर जमाई बनने में उन्हें कुछ सम्मान भाग्य से नसीब होता है जिनकी सास होती है। ससुराल में सास ही अपने जमाई को बढ़ चढ़कर प्यार एवं सम्मान देती है। हमारे समाज में एक कहावत बहुत मशहूर है कि डायन तक को अपना जमाई जान से भी ज्यादा प्यारा होता है। घर जमाई उसी लड़की के माता पिता रखना पसंद करते हैं जिनका अपना खुद का बेटा नहीं होता या अगर बेटा, बेटे होते भी हैं तो अपनी शादी के बाद मां बाप की ठीक से देखभाल नहीं करते। बेटियां तो शादी के बाद भी अपने मां बाप से ताउम्र प्यार करती हैं और अपने पति को भी यही सलाह देती हैं कि वह भी उनकी उचित देखभाल करे तथा पूरा सम्मान दे। घर जमाई को उसकी ससुराल के अन्य लोग पसंद नहीं करते क्योंकि उनके मन में एक सवाल हमेशा सताता रहता है कि सास ससुर की मृत्यु के बाद वह जमीन जायदाद का अकेला मालिक हो जायेगा। घर जमाई पूरी तरह से ससुराल का ही हो जाता है। जिन मां बाप ने उसे पैदा किया पढ़ाया लिखाया, उसकी जायज नाजायज मांगों को अपनी यथाशक्ति सदैव पूरा करने की कोशिश की लेकिन उसका बेटा उनकी सेवा सुश्रूषा करने के समय ससुराल का हो जाता है। ससुराल में घर जमाई की प्राय: इज्जत नहीं होती। वह केवल काम करने वाला ही समझा जाता है। उसे वह सम्मान कभी नहीं मिलता जो उसे वहां यदा-कदा जाने पर मिलता है। घर जमाई बनना जमाइयों की कोई मजबूरी ही हो सकती है। जब उनकी ससुराल उनके अपने घर से अधिक साधन संपन्न होती है तो वे घर जमाई बनना ही अधिक श्रेयस्कर समझते हैं।

- एस.के. त्रिपाठी

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