देह शोषण के अनदेखे सच

देह शोषण के अनदेखे सच

एक सरकारी अस्पताल में पीड़ा से कराहती महिला के साथ वार्ड बाय छेडख़ानी करता है। महिला के एतराज करने पर वह उसे बेहोशी की दवा देकर बेइज्जत कर देता है। क्या यही है महिलाओं की आजादी, उन्हें बराबरी का हक दिया जाना? हैवानियत की ऐसी भूख का निवाला अलग-अलग रूपों में बार-बार बनती रहती है औरत।

एक अधेड़ औरत को निर्वस्त्र करके सारे गांव में घुमाया जाना, बाद में क्षतिपूर्ति के रूप में उसे एक लाख रुपये दिये जाना, मानो इसी में सत्ताधारियों की कर्तव्यपूर्ति हो गई हो। क्या देश में महिलाओं की यह इज्जत रह गई है? किसी भी देश की उन्नति वहां की महिलाओं के स्टेटस से ही आंकी जाती है। ऐसे में क्या हम एक उन्नत देश होने का दम भर सकते हैं?

आलम यह है कि शिक्षा में बराबर होने के बावजूद ऊंची नौकरियों को हासिल करके भी औरत को अकेले सफर करना, रात को बाहर रहना पड़ता है पर अब तो अस्पताल, अदालत, पुलिस स्टेशन तक में भी उसका अस्तित्व, उसकी इज्जत असुरक्षित है। आज पुरुष नारी को सिर्फ भोग्या के रूप में देखने लगा है। मां, बहन तो सिर्फ घर में हैं।

कितनी शर्मनाक बात है कि आज सभ्यता के युग में भी पुरुष एक पागल औरत को अपनी हवस का शिकार बना लेता है। छोटी-छोटी अबोध बच्चियों से बलात्कार करता है। पशुओं में भी ऐसे उदाहरण नहीं मिलेंगे जो आज मानव दुनियां के सामने पेश कर रहा है।

महिला उत्पीडऩ के खिलाफ कानून है लेकिन सामाजिक चेतना के बगैर ये कानून भी कागजी कार्यवाही बन कर रह गए हैं। इसके अलावा कानून पीडि़त औरतों की दलील को नहीं मानता। उसे तो सबूत चाहिए जिसके लिए बलात्कार पीडि़त स्त्री को दुबारा रुसवा होना पड़ता है मानो

एक बार का मरना उसके लिए काफी न था।

दंगे कैसे भी हों, वहां सर्वाधिक शोषित औरतें ही होती हैं। बंटवारे से लेकर बाबरी मस्जिद विवाद तथा उत्तराखंड मांग को लेकर औरतों पर जो जुल्म हुए, उनकी दर्दनाक कहानी इंसानियत के नाम पर कलंक है। उन्हें न सिर्फ जिन्दा जलाया गया, इज्जत लूटी गई बल्कि एक शहर में तो उन्हें निर्वस्त्र दौड़ाया गया। बाद में उनसे सामूहिक बलात्कार कर उस पर वीडियो फिल्में बनायी गई जिसे अत्याचारियों ने और उन जैसे उनके कामुक लंपट दोस्तों ने चटखारे लेकर देखा होगा।

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आज नारी के लिए कहां है सुरक्षा? नारी निकेतन भी व्यभिचार के अड्डे बन गये हैं। अनाथालय में मासूम बच्चियां चूंकि वे अनाथ होती हैं, ऐसे दरिन्दों का ईजी टारगेट बन जाती हैं। नारी सुधार गृह में और सजायाफ्ता मुजरिम नारियां जेल में कहीं भी तो सुरक्षित नहीं। ये औरतों के लिए यातना शिविर बन गए हैं।

समाज में होने वाले नारी उत्पीडऩ और उस पर अत्याचार को रोकना है तो हमें समाज की मनोवृत्ति में बदलाव लाना होगा। महिलाओं में जागृति लानी होगी।

उनका हौंसला बढ़ाना होगा। उन्हें किसी भी प्रकार का शोषण कतई नहीं सहना है फिर चाहे वो पति या सास का हो या किसी गुंडे बदमाश का। पुलिस वालों को भी पीडि़त महिलाओं का साथ देना चाहिए न कि वे यह सोचें कि हम भी बहती गंगा में हाथ धो लें।

पुलिस विभाग के लोगों पर सरकार और कोर्ट का सख्त रवैया होना चाहिए। पुलिस वाला पीडि़त महिला को तंग करे तो उसे नौकरी तो छोडऩी ही होगी और उसके विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाए ताकि विभाग के अन्य सदस्यों को चेतावनी मिल सकें।

चरित्रहीन पुरुषों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। औरत को तलाक की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। औरत को बेइज्जत कर उसका बलात्कार करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

नारी देह शोषण के छिट पुट उजागर तथ्य जब इतना आक्रोश पैदा करते हैं तो सोचिए कि जो कुछ घटित होता है, उसे देखने वाले और उससे भी बढ़कर भोगने वाली पर क्या गुजरता होगी।

- उषा जैन 'शीरीं'

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