पुरूष के लिए यौन ही सबसे बड़ा सच है

पुरूष के लिए यौन ही सबसे बड़ा सच है

दुनिया के सब संबंध, सारे नाते झूठे, एक पति-पत्नी का मिलन इस धरती का सबसे बड़ा सत्य है। यही सत्य शिव है और शिव ही सुंदर है। यदि पत्नी बनी युवती शुरू से ही पुरूष की अदम्य प्यास, उसकी यौन विषयक चाहत के बारे में जान ले तो दांपत्य व उम्र के उस मोड़ पर, जब शरीर शिथिल होने लगता है, गृहस्थी के दायित्व लगभग निबटने लगते हैं, तब भी उनकी आपसी चाहत वैसी ही उद्दाम बनी रहती है जैसी विवाह के पूर्व के दिनों में रही थी। आज भी हर पत्नी अपने पति को मात्र पति, स्वामी, साथी के रूप में तो स्वीकारती है पर उसके पुरूष को, उसके भीतर के मर्द को जानने की कोशिश नहीं करती।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे कोमलता, नज़ाकत व भावुकता स्त्री की पहचान है और हर स्त्री अपनी नजाकत व भावुकता की सही प्रतिक्रिया चाहती है ताकि उसे ठीक से समझा जा सके, ठीक उसी तरह पुरूषों में भी अपने पुरूषत्व को लेकर एक विशेष प्रकार का भाव रहता है। अपने पौरूष अर्थात् मर्दानगी के अहसास से ही वे खुश, तृप्त व सतुंष्ट नजर आते हैं और चाहते हैं उनकी इस तृप्ति की भागीदार उनकी अंकशायिनी भी हो। पुरूष को 'मर्द' होने के भाव से ही अपनी श्रेष्ठता का अहसास होता है और इसी श्रेष्ठ भाव के चलते ही वे स्त्री को अपना संरक्षण प्रदान करने का गौरव भी महसूस करते हैं।

सेक्स तो शिव है पुरूष के लिए:- जीवन के तमाम संबंधों के बजाय पुरूष को स्त्री के संग भोगा यौन सुख विशेष तृप्ति देता है। सम्भवत: इसके पीछे भी यही भावना विशेष रूप से काम करती है कि ये क्षण उसके जीवन के सुखदायी क्षण होते हैं तथा इस माध्यम से वह अपनी प्रिया को पूरा पा लेने में भी समर्थ होता है। वे घनिष्ठता, चाहत व मुहब्बत के भीने-भीने क्षण, जो आनंद देते हैं, निस्संदेह किसी भी पुरूष मन को भर देने को पर्याप्त हैं। पुरूष के लिए सेक्स ही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।

पुरूषों की यौन भावना क्या है, यह जानने के लिए यदि पहले यह जानना जरूरी समझा जाए कि पुरूष प्यार के बारे में क्या सोचता है तो ज्यादा ठीक रहेगा। स्त्री के लिए प्यार, चाहत, स्पर्श, कोई उपहार देना, मधुरता से बातचीत करना हो सकता है पर किसी पुरूष के लिए यह सब खास नहीं होता। पुरूष के लिए प्यार का सीधा-सादा अर्थ है, किसी अपने को पूरी तौर पर पा लेना। संभवत: इसका अर्थ है पुरूष के लिए प्यार का मतलब है किसी के साथ सहवास करने की इच्छा। प्यार करना व प्यार पाना ही पुरूष मन को भाता है। पुरूष को संभोग मुख्यत: तीन कारणों से पसंद आता है और तृप्त करता है।

पहले, पुरूष को इस दौरान मिली निकटता, दो शरीरों का मिलन और भरपूर उत्तेजना बेहद पसंद आती है। इन नाजुुक व निजी क्षणों में पुरूष मन इतना दयालु व उदार हो उठता है कि मांगने पर असंभव भी देने की हां भर ले। सहवास के क्षणों में पुरूष तनाव व दिन भर की थकान झट भूल जाता है। उसे केवल सीढ़ी-दर सीढ़ी चढ़ती उत्तेजना ही ध्यान में रहती है। अपने प्रिय को पूरा पा लेना ही उसका ध्येय रहता है जो उसे तमाम सांसारिक समस्याओं से परे कर देता है। उत्तेजना का नशा उसे स्वर्गीय सुख देता है जो शायद किसी दूसरे नशे से कहीं ज्यादा असरकारक है। यदि यह कहा जाए कि इस समय उसे स्त्री के ऐब भी नजर नहीं आते तो कुछ भी गलत नहीं होगा।

कहा भी गया है कि पुरूष को प्रसन्न व वश में रखने का मार्ग एक ही है कि उसे व्यंजनों की तृप्ति के साथ यौन तृप्ति भी मिलती रहे। किसी पसंदीदा स्त्री को भरपूर चरम सुख तक ले जाना किसी भी पुरूष के लिए गर्व का विषय है। ऐसे में उसे अपने पौरूष पर बेइंतहा प्यार आता है। यदि वह स्त्री पत्नी हो और पति की इस इच्छा का आदर कर उसे आमंत्रण दे और चाहे कि पति उसे तृप्त कर दे, तब तो पुरूष का यह गर्व उसे खुशी से भर अतिशय उदार बना देता है कि उसके (पुरूष) माध्यम से उसके प्रिय पात्र को आनंद मिले।

यह बात ही उसे तमाम तनावों व उलझनों से मुक्त कर देने के लिए काफी है। अमेरिकन मनोवैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि संभोग के क्षणों में 95 प्रतिशत मर्द भावुक हो जाते हैं और ये ही वे कोमल क्षण हैं जब पुरूष को लगता है कि कोई उनका बेहद अपना है जो उन्हें चाहता है, उन्हें प्यार करना चाहता है व उनसे प्यार पाना चाहता है। सहवास द्वारा मिलने वाली मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक तृप्ति वास्तव में शारीरिक तृप्ति या 'हल्के हो लेने' के भाव से कहीं ज्यादा अहम है। यदि ऐसा न होता तो जबरन किया गया बलात्कार भी भावुक तृप्ति देता या फिर पत्नी की मर्जी के खिलाफ उससे किया शारीरिक संसर्ग अपराधी भाव न उपजाता।

पुरूष मन बड़ा चंचल:- पुरूष के लिए संभोग की संपूर्ण क्रिया और उसका सफल सम्पादन उसके पौरूष का प्रतीक है। संभोग से पुरुष को अपने जीवन की सार्थकता का अनुमान होता है जिससे उसका तन ही नहीं, मन व पौरूष तृप्ति पाता है। पत्नी को तृप्त करने की समूची क्रिया की महारथता ही किसी पुरूष के गर्व का कारण है।

विवाहित पुरूष हस्तमैथुन या पराई स्त्रियों के चक्कर यूं ही नहीं काटता। जब पत्नी उसकी यौन भावना का लगातार तिरस्कार करती जाती है, तब वह पत्नी ही नहीं, घर के आकर्षण से भी बंधा नहीं रह पाता।

भावनात्मक व वैचारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो कोई पुरूष घर से बाहर कदम तभी निकालता है जब पत्नी उसकी यौन इच्छा को न समझ कर जब-तब टालती भी है व दुत्कारती भी है। संभवत: वह पुरूष मन को पहचानती नहीं है, तभी तो ऐसा अमानवीय व्यवहार बेहिचक कर जाती है।

पति के व्यवहार, विचार व भावनाओं को पूरी गंभीरता व परिपक्वता से समझने के लिए उसके पुरूष मन को समझ लेना बेहद जरूरी है ताकि उसकी यौन विषयक मांग को ईमानदारी से समझ उससे वैसा ही व्यवहार किया जा सके। यह सौ फीसदी सच है कि जो स्त्रियां चेहरे पर तृप्ति की चमक लिये अभिमानिनी बनी डोलती हैं, अधिकारिणी का-सा खुला व्यवहार करती हैं, वे भले ही शारीरिक रूप-गुण रखती हों या न रखती हों, अपने पति के पुरूष मन को बखूबी पहचान पाती हैं। वे उसकी इच्छा का आदर करना व स्वयं को प्रस्तुत करना भी बखूबी जानती हैं। फिर सहवास तो कुदरती देन है, उससे दुराव-छिपाव कैसा? खुलकर की गई अभिव्यक्ति ही रिश्ते को मजबूत बनाती है।

- कर्मवीर अनुरागी

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