एकतरफा नहीं होता प्यार

एकतरफा नहीं होता प्यार

जो एकतरफा हो, वह प्यार नहीं कहलाता। वह महज आकर्षण होता है जिसका कोई भविष्य नहीं। प्यार तभी परवान चढ़ता है जब दो दिल मिलते हैं, आंखें जुबां बन जाती हैं, साथ जीने मरने की कसमें खाई जाती हैं।

कृति और पुनीत पड़ोसी थे। साथ खेलते खाते कब पुनीत का झुकाव कृति की ओर हो गया, इससे कृति काफी समय तक अनभिज्ञ रही। एक दिन कृति को अकेले पाकर पुनीत ने भावातिरेक में अपने प्यार का इकरार करते हुए कृति को चूमना चाहा। शॉक की स्थिति में आई कृति उससे दूर छिटक कर खड़ी हो गई।

कृति ने कभी पुनीत को प्रेमी के रूप में नहीं चाहा था। उनके मानसिक स्तर में बहुत फर्क था। कृति कॉलेज में पढ़ रही थी जब कि पुनीत हाईस्कूल फेल था। कृति के सपनों का राजकुमार पढ़ा लिखा, सभ्य सुसंस्कृत व प्रभावशाली व्यक्तित्व का मालिक था।

पुनीत अपनी हरकतों से बाज न आया। कभी जबर्दस्ती अपने फोटोग्राफ उसके कमरे में छोड़ आता, कभी लव लैटर। वक्त बेवक्त उसे अकेले घर पर देखकर वह उससे प्रेम जताने पहुंच जाता। कृति ने उसकी हरकतों पर विराम लगाने के लिये रक्षाबंधन पर उसे राखी बांध दी। पुनीत ने राखी तो बंधवा ली लेकिन कुछ दिन बाद आत्महत्या कर ली जिसके लिए उसके घरवालों ने कृति को जिम्मेदार ठहराया।

संगीत की शिक्षा ग्रहण करती उर्वशी अपने संगीत के शिक्षक भवानी गुरूजी से प्रेम करने लगी। वह उनके प्यार में ऐसी दीवानी थी कि उसने यह भी न सोचा कि गुरूजी उम्र में उससे काफी बड़े और शादीशुदा हैं।

भाव विह्वल होकर एक दिन उर्वशी ने गुरूजी से उसे अपना लेने की प्रार्थना करते हुए कहा कि वह बगैर विवाह किये ही उनके बच्चे की मां बनना चाहती है। उसे उनसे और कुछ नहीं चाहिए। वह बच्चे के साथ पूरा जीवन अकेले गुज़ार लेगी। गुरूजी चरित्रवान समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने समझाया कि गुरू शिष्या का रिश्ता एक पवित्र रिश्ता है। उसे जो नापाक करते हैं उनके लिए उनके मन में कोई जगह नहीं। वह उनकी बेटी की तरह है।

बात उर्वशी की समझ में आ गई। उसने गुरूजी से क्षमा मांगी। उसकी नजऱों में उनका सम्मान बढ़ गया।

उर्वशी की तरह प्यार का इज़हार कम ही लड़कियां कर पाती हैं। वे मन की बात मन में रखना जानती हैं। पहल युवक ही करते हैं। जो समझदार होते हैं, लड़की के 'न' कहने पर उसका पीछा छोड़ देते हैं लेकिन ज्यादातर लड़के लड़की के पीछे पड़ जाते हैं जिसमें कभी-कभी उन्हें सफलता भी मिल जाती है। बाद में वह कितना निभाते हैं यह बात अलग है।

कई लड़के जब तक लड़की अप्राप्य रहती है उसके प्यार में दीवाने रहते हैं और प्यार का प्रतिउत्तर मिलने पर उन्हें लड़की में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वे कहते फिरते हैं 'वो लड़की ही क्या जो जल्दी से पटाये में आ जाए। मजा तो बिगड़ैल घोड़ी साधने में है।'

कुछ उन्मादी किस्म के लड़के लड़की की बेरूखी से त्रस्त उससे बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं। आए दिन अखबार में ऐसी खबरें पढऩे को मिलती हैं कि प्रेम में असफल होकर लड़के ने लड़की पर एसिड फेंक दिया, या अगर मेरी न हो सकी तो किसी और की भी न हो सकेगी, यह कहकर लड़की को जान से ही मार डाला।

यह प्यार नहीं उन्माद है, पागलपन है। प्रेम उत्सर्ग से महान बनता है। सच्चा प्यार चाहे जाने वाले की खुशियां चाहता है, उसका बुरा नहीं करता। प्यार का प्रति उत्तर न मिलने पर अवसाद से घिरना स्वाभाविक है लेकिन इससे उबर पाना भी असंभव नहीं। 'तू नहीं और सही' और सही यही सोच जि़न्दगी को नया मोड़ देती है।

- उषा जैन 'शीरीं'

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