सुखानुभूति के लिए अनिवार्य है दुख का आस्वादन भी

सुखानुभूति के लिए अनिवार्य है दुख का आस्वादन भी

एक कहावत है जितने दिन जेठ तपता है, उतने ही दिन सावन बरसता है। जेठ में जितने दिन पुरवाई चलती है, हवा ठंडी हो जाती है, उतने ही दिन सावन में धूल उड़ती है। जेठ नहीं तपेगा तो सावन भी नहीं बरसेगा, यह एक वैज्ञानिक सत्य भी है लेकिन एक बात यह भी है कि यदि ग्रीष्म कष्टदायक है तो वर्षा आनंददायक।

यही बात मनुष्य के जीवन में सुख-दुख के संबंध में भी उतनी ही सटीक है। ज्येष्ठ कष्ट का प्रतीक है तो श्रावण आनंद का लेकिन एक के बिना दूसरे की प्राप्ति असंभव है। इसी प्रकार दुख के बिना सुख की प्राप्ति या अनुभूति भी असंभव है।

दुख नहीं आएगा तो सुख भी नहीं आएगा क्योंकि दुख की अनुभूति के बाद ही सुख की अनुभूति संभव है। जितना लंबा दुख, उतना ही दीर्घ सुख। जितना गहरा घाव, ठीक होने पर उतना ही घना सुख। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व ही नहीं हो सकता।

सुख-सुविधाओं का अंत नहीं लेकिन मनुष्य की सीमा है। सुख-सुविधाओं में ठहराव आ गया तो जीवन में नीरसता आ गई और सुख-सुविधा छिन गई तो दुख ही दुख। किसी से कोई सुविधा छीन लो तो दुख और फिर से दे दो तो सुख लेकिन सुविधा की निरंतरता में सुख नहीं रहता। सुख की अनुभूति के लिए अनिवार्य है दुख की अनुभूति भी। सुख-दुख मनुष्य मन की सापेक्ष अवस्थाएँ हैं।

आप ध्यानपूर्वक अपने जीवन में घटित दुखों का अवलोकन कीजिए। हमें जीवन में जाने कितने दुख और कष्ट झेलने पड़ते हैं, अवमानना सहनी पड़ती है, उनकी तीव्रता से जूझना पड़ता है, उन्हें दूर करना होता है।

यदि हम अपने जीवन में आने वाले कष्टों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि कुछ कष्ट या कोई कष्ट विशेष जीवन में सबसे ज़्यादा पीडि़त करता रहा लेकिन साथ ही यह भी पाते हैं कि इस एक बड़े कष्ट के कारण हम असंख्य छोटे-छोटे कष्टों को भूल गए।

हर कष्ट अपने से छोटे कष्टों को गौण कर देता है। हर परेशानी दूसरी परेशानियों को समाप्त कर देती है। जिसे हम बड़ी परेशानी मानते हैं, यदि वह न होती तो इससे छोटी परेशानी भी तब कम कष्टदायक न होती लेकिन बड़ी परेशानियों के कारण हम छोटी परेशानियों से उबर जाते हैं जो हमारे आनंद के लिए ही नहीं, उन्नति के लिए भी अनिवार्य है।

कष्टों से जूझने की क्षमता का विकास कर देता है दुख। जितना बड़ा दुख, उतना ही क्षमतावान मनुष्य। हम कष्टों और समस्याओं से पलायन कर स्वयं अपने सुखों से दूर होते चले जाते हैं। असीमित उपभोग द्वारा भी हम अपने सुखों को कम कर देते हैं। शरीर को जितना अधिक आराम और सुविधाएं देते हैं, वह उतना ही निष्क्रिय और जड़ होता जाता है। परिश्रम अथवा व्यायाम करेंगे तो थोड़ा कष्ट तो ज़रूर होगा पर स्वस्थ शरीर का सुख भी मिलेगा। कम खाएंगे तथा भूख लगने पर ही खाएंगे तो भोजन के स्वाद का सुख भी मिलेगा।

जो सारे दिन खाद्याखाद्य चरते रहते हैं उनके लिए भोजन में स्वाद का सुख कहां? जीवन में जितना कष्ट आएगा, उतना ही आप कष्टों को सहते-सहते धैर्यवान होते जाएंगे। धैर्य एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है, उसे आगे ले जाता है, उसे संपूर्णता प्रदान करता है। बड़ा दुख उपचार कर देता है सभी छोटे-छोटे दुखों का और असंख्य छोटे-छोटे दुखों के उपचार से प्राप्त सुख असीम सुख में परिवर्तित होकर आनंद ही देता है।

- सीताराम गुप्ता

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