स्त्री पुरूष संबंध: आखिर क्यों करते हैं लोग छेड़छाड़?

स्त्री पुरूष संबंध: आखिर क्यों करते हैं लोग छेड़छाड़?

आदमी की मानसिक और शारीरिक बनावट का अध्ययन करने वाले बताते हैं कि पुरूष में जब तक पुरूष-प्रधान हार्मोन की प्रबलता रहेगी, जो हजारों साल से है और हजारों साल तक रहेगी, तब तक वह महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करता रहेगा और नारी-मुक्ति का कोई भी आंदोलन और दुनिया का कोई भी कानून पुरूष के इस प्राकृतिक स्वभाव को रोक नहीं सकता।

शिक्षा के माध्यम से उसके हिंसात्मक आवेग को तो रोका जा सकता है पर उसे जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता। अपनी प्राकृतिक शिकारी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर पुरूष महिलाओं को आंख मारने, उन्हें देखकर सीटी बजाने, अंधेरे में उसे टटोलने, जोर-जबर्दस्ती करने, अपने पौरूष का प्रदर्शन करने और जबरन भगा ले जाने को हमेशा इसलिए मजबूर रहेगा कि उसके भीतर यह हार्मोन सदा मौजूद रहेगा।

आंखों से न दिखाई देने वाले इस हार्मोन तत्व में जो नैसर्गिक आकर्षण है उससे सहज महिलाओं में भी एक जैविक प्रतिक्रिया होती है और वे जाने-अनजाने उसकी ओर खिंची चली आती हैं, इसलिए बहुत से विद्वानों का मत है कि बलात्कार की शिकार हो जाने वाली महिला की समझदारी बलात्कार की प्रतिक्रिया के दौरान कम हो जाती है और बलात्कारी का दंड कम हो जाता है।

लेकिन जब हम यह देखते हैं कि इधर अपने देश में इस हार्मोन-रिलेटिड बिहेवियर की अधिकता होती जा रही है तो इसका कारण हमें अपनी ही संस्कृति में ढूंढने को मजबूर होना पड़ता है। किन्हीं वजहों से यह 'प्राकृतिक' नहीं रह जाता और माफ कर देने की असीम क्षमता भी खत्म होने लगती है। इसके चलते जिन लोगों को दंड भुगतना पड़ता है वे और अडिय़ल हो जाते हैं और ऐसे अडिय़लों की संख्या अब इतनी बढ़ती जा रही है कि महिलाओं की आजादी को खतरा हो रहा है। उनहें घर से बाहर निकलने की मनाही होने लगती है और वे घर के भीतर ही छोटे मोटे काम करने को अभिशप्त हो जाती हैं। खाना बनाने, बच्चे पालने और चौका बर्तन करने के अलावा कपड़े धोने के लायक ही उन्हें इसलिए बना दिया गया है कि घर से बाहर उन्हें मेल-हार्मोन से उपजने वाले संकट का गंभीर सामना करना पड़ता है।

अखबारों के पन्ने पलटें तो मालूम होगा कि 'पुरूष-हार्मोन' का आतंक समाज में अब कितना बढ़ता जा रहा है। चेन्नई में एक लड़की के साथ इतनी छेड़छाड़ हुई कि उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। जाहिर है कि ये किस्से छेड़छाड़ के ही नहीं, पागल प्रेम के भी हैं पर इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि इनकी प्रेरणा हमारी संस्कृति से ही मिलती है चाहे यह आज की फिल्मी संस्कृति हो या फिर कल की महाभारत अथवा रामायण वाली संस्कृति हो।

आदमी ने औरत की भूमिका को चिंरंतन काल से ही तय कर रखा है। घर और समाज में उसने एक स्थायी जगह दे रखी है। वह जगह है रसोईघर। वहां से फुर्सत पाते ही वह बिस्तर पर आ जाती है और बच्चा पैदा करने से लेकर बच्चा पालने तक वह सब काम करती है।

जिंदगी में औरत की यही एक 'सेट जगह' है, आखिरी स्टेशन है। उसकी मानसिकता का निर्माण भी इसी आधार पर होता है। भाई टांग पसारकर बैठा रहेगा, बहन चाय लाएगी। बहन को कोई छेड़ेगा तो वह उठेगा और उसे पीट आयेगा। फिर मौका मिलते ही वह उठेगा और किसी दूसरे की बहन को खुद छेड़ आयेगा।

दरअसल क्या है यह सब, समाज-मनोविज्ञान की दृष्टि से। यह और कुछ नहीं, दंभ है पुरूष के पुरूष होने का। उसमें उस प्रवृत्ति का प्राबल्य है जो उसे औरत को अंगूठे तले रखने को प्रेरित करती है और शाम ढलते ही वह खिड़की तले आने और सीटी बजाने को मजबूर है। सोचिए

तो लगता है कि यह कितनी बड़ी विडंबना है।

लड़के और लड़कियों को हम अलग-अलग स्कूलों और कालेजों में पढ़ाने का समर्थन करते हैं, बसों और रेलगाडिय़ों में उनके लिए अलग जगह बनाते हैं, अलग 'क्यू' लगाते हैं, अलग खाना खिलाते हैं, मंदिरों में अलग पूजा कराते हैं और अस्पतालों में भी उन्हें मर्दों से अलग कमरों में रखते हैं। इससे उनके स्वाभाविक तौर पर मिलने-जुलने पर एक अस्वाभाविक पाबंदी लग जाती है। इससे जो सामाजिक संस्कृति पैदा होती है, उसमें औरत गौण हो जाती है। सैंकड़ों साल से ऐसा चला आ रहा है वह छेडऩे और मजा लेने की चीज हो गई है, हर देश में, हर भौगोलिक पृष्ठभूमि में, कहीं कम, कहीं ज्यादा।

इस तरह की लंगड़ी और हार्मोनवादी संस्कृति की जरूरत अब हमें नहीं है। महिलाओं को शिक्षित करना, आत्म-निर्भर बनाना होगा। नैतिकता के पुराने मापदंड भी बदलने होंगे। सहशिक्षा को आदर से देखना और सामाजिक जीवन में 'रिजर्वेशन' को खत्म करना होगा। फिर देखिए कि धीरे-धीरे छेड़छाड़ और बलात्कार आदि की घटनाएं अपने आप कितनी कम होती जाएंगी।

- ओंकार सिंह

Share it
Top