रिश्ते-मानव जीवन का आधार

रिश्ते-मानव जीवन का आधार

आदिकाल से ही मनुष्य सामाजिक प्राणी रहा है जिससे हमारी सामाजिक व्यवस्था में आपसी रिश्तों की भी सुदृढ़ परंपरा रही है और यही परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपने की अविरल परिपाटी भी है। परिवारों में रिश्तों का महत्त्व किसी से छुपा हुआ नहीं है। हमारे समाज व परिवार में बच्चों को शैशवास्था से ही रिश्तों के संबंध में जानकारी करवाई जाती है। यहां तक कि बच्चे रिश्तों को कैसे निर्वहन करें, उस बारे में भी बाकायदा परिवार के सदस्य उन्हें बताते हैं।

भारतीय संस्कृति में पलने वाले समाजों में रिश्तों का तो बहुत ज्यादा महत्त्व है इसलिए यहां परिवारों में प्रत्येक सदस्य के जिलए अलग संबोधन है, जैसे मामा-मामी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ,भाभी इत्यादि। परिवारों में आज भी इन्हीं संबोधनों या पदनामों के अनुरूप सदस्यों को बुलाया जाता है। यह बात अलग है कि परिवार के इन प्रगाढ़ रिश्तों में आज दरार आ गई है लेकिन फिर भी आज की तार-तार हुई सामाजिक व्यवस्था में थोड़ा बहुत प्रेम,प्यार सद्भावना तथा अपनत्व दिखलाई पड़ता है। उसके पीछे ये हमारे अटूट रिश्ते ही है। हालांकि बनते बिगड़ते रिश्ते ही सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।

हर रिश्ते का, परिवार के परिजनों में अपना महत्त्व होता है और यही उनकी अलग पहचान भी बनाता है। ये रिश्तेे मूल्यों पर आधारित होने से इतने परिपक्व होते हैं कि उन्हें चाहकर भी नहीं तोड़ा जा सकता। रिश्तों में पास-दूर, आयु इत्यादि की भी घनिष्ठता होती है। कई रिश्ते तो समतुल्य भी होते हैं जो समान रूप से सम्मानीय होते हैं जैसे मामा-पिता, सास-ससुर को रखा जा सकता है। वैसे भतीजे-भतीजियों, पुत्र पुत्रियों, पोते-पोतियों की परिवार में एक अलग ही जमात होती है।

रिश्ते परिवारों में जन्म से तो बनते ही हैं लेकिन दिल के रिश्ते की भी बात कुछ और ही होती है। रिश्ते अपार संपदा व वैभव से कभी नहीं बनते हैं बल्कि कभी-कभी रिश्ते तो खून के रिश्तों से भी कहीं ज्यादा प्रगाढ़ नजर आते हैं। रिश्तों में अमीर व गरीब का भेद-भाव तो यं भी नहीं करना चाहिए लेकिन बदलते परिवेश में रिश्तों को भी धन-दौलत की तराजू से तौला जा रहा है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। यह भेदभाव परिवार के निकट सदस्यों में भी देेखा जा सकता है। जहां एक भाई तो इतना अमीर है कि उसके पास सब कुछ है। वहीं दूसरे भाई की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय है कि परिवार का पेट पालना भी मुश्किल हो रहा है लेकिन है तो सगा भाई, फिर इतनी दूरी क्यों?

आर्थिक संपन्नता और विपन्नता के दौर में निश्चय ही रिश्तों में बदलाव आया है और इसके लिए काफी हद तक नई पीढ़ी व नए ख्यालात के लोग जिम्मेदार हैं लेकिन उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि पारिवारिक रिश्तों के बंधन को तोड़कर वे अपना अलग से अस्तित्व ज्यादा दिन तक कायम नहीं रख सकते हैं। समाज व परिवार में हर व्यक्ति जहां अपनी पहचान रखता है, वहीं उसमें ऐसी क्षमता व प्रतिभा भी होती है जो हर कार्य को सहज बना सकता है। ऐसे कार्यों में वे प्रमुख भूमिका निभाते हैं शादी सगाई जैसे महत्त्व के कार्य के लिए बीच में किसी ऐसे माध्यम की जरूरत होती है।

वर्तमान समाज पूरी तरह से भौतिकता के मकडज़ाल में फंस चुका है। प्रत्येक वस्तु चाहे वह भावनात्मक ही क्यों न हो, लेकिन उसकी कीमत भी मूल्यों से आंकी जाने लगी है। रिश्तों का टिकाऊपन भी अब तो काफी कुछ रूपयों पैसों पर आधारित होता जा रहा है जिससे समाज व परिवार में आपसी वैमनस्यता बढ़ती जा रही है। इसी बिखराव की वजह से कई परिवारों में एकाकीपन व असुरक्षा की भावना इस कदर व्याप्त हो गई है कि सबके रहते भी वे अपने को अलग थलग समझने लगे हैं।

निश्चय ही जब हम शुरू से ही रिश्तों को प्रारंभिक घटके के रूप में मानते आ रहे हैं तो रिश्ते ही ऐसे होते हैं जो मानवीय जीवन का आधार स्तंभ होते हैं और यदि इन्हीं ठोस स्तंभों में दरार आ जाए तो हमारे सामाजिक मूल्यों का ।ास होगा ही, वहीं नैतिक मूल्यों का पतन भी अवश्यंभावी ही लगता है, इसलिए जहां तक हो सके 'रिश्ते' विश्वसनीयता की कसौटी पर खरे उतरें। पहल हम सबको मिलजुल कर करनी होगी, क्योंकि दोहरे मापदंड अपनाकर हम रिश्तों को कदापि मजबूत नहीं बना सकते हैं।

-चेतन चौहान

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