दूसरे के घरेलू मामलों में ताक-झांक न करें

दूसरे के घरेलू मामलों में ताक-झांक न करें

औरत और ईष्र्या एक दूसरे के पर्याय हैं। यह भावना आगे बढऩे में सबसे बड़ी रूकावट है। झूठे अहम् का दंभ और र्ईष्र्यालु स्वभाव एक ऐसी निरर्थकता की संरचना करता है जिसमें ऊब-डूब करती गृहिणी अपने अस्तित्व को व्यक्तिहीन बना लेती
है।
क्यों नहीं सीख लेती है वे जीने की कला? क्या यह कार्य इतना मुश्किल है? क्या इसके लिए अति सुंदर और प्रतिभावान होना आवश्यक है? ऐसा कुछ नहीं है। एक आम पढ़ी-लिखी साधारण स्त्री भी सार्थक जीवन जी सकती है।

बच्चे जब छोटे होते हैं तो उनकी परवरिश गृहिणी का काफी समय ले लेती है। उन्हें कंपनी देना, अच्छे संस्कार देने के लिए ज्ञानवद्र्धक कहानियां सुनाना, इनडोर गेम्स खेलना, अगर नृत्य संगीत में प्रवीण हों तो उसकी तालीम देना एवं आर्ट पेंटिंग आदि सिखाना जैसे काम वे बखूबी कर सकती हैं।
अपने व्यक्तित्व को सजाने-संवारने की ओर ध्यान दें। गृहसज्जा में रूचि लें। पौधों का शौक हो और सुविधा हो तो उन्हें लगायें, उनकी देखभाल करें। सामाजिक कार्यकर्ता बनकर कुछ भलाई का कार्य किया जा सकता है। किसी अनपढ़ को पढ़ायें। स्लम्स में यदा-कदा जाकर देखें लोग कैसे रहते हैं। यह तजुर्बा आपको जीवन का मर्म समझने में सहायता होगा।
अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ें। ज्ञान की ज्योति जीवन के अंधकार में मार्ग प्रदर्शन के लिये आवश्यक है। व्यर्थ की कुंठाएं पालना छोड़ें। ये वो दिमागी चालबाजियां हैं जो आपके व्यक्तित्व के विकास में बाधक बन जाती हैं।
किसी की व्यक्तिगत जिंदगी में तांक-झांक करना, इधर-उधर की लगाई बुराई करना, दूसरे के फटे में टांग डालना, जैसी आदतें आपको निम्नतर बनाती हैं। क्या आप नहीं चाहेंगे कि लोग आपका उदाहरण औरों के समक्ष दें। आप अनुकरणीय
बनें।
जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर वह सब न कर पाने की छटपटाहट महसूस न करें जो आपने जीवन भर किया यानी कि घरेलू पालिटिक्स। निरर्थक जीवन की त्रासदी जीवन संध्या में सबसे ज्यादा महसूस होती है इसलिए अच्छा हो कि यौवन काल में ही संभल जायें।
- उषा जैन 'शीरीं'

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