अधेड़ावस्था में पति-पत्नी ऊब से बचें?

अधेड़ावस्था में पति-पत्नी ऊब से बचें?

कुछ दशक पहले पति पत्नी के लिए अधेड़ावस्था अपने साथ आज की तरह समस्याएं लेकर नहीं आती थी। तब उनके पास अपने को व्यस्त रखने के लिये एक भरा पूरा परिवार होता था जिसमें बेटे, बहू, पोते-पोतियां, विधुर चाचा, मामा या कोई विधवा मौसी, बुआ वगैरह भी हुआ करती थीं। इसके अलावा तीज त्योहार विशेष अवसर आदि मनते ही रहते थे जो जीवन का खालीपन भरने में भरपूर सहायक होते थे। उन दिनों बच्चे भी ज्यादा होते थे। इससे जहां कुछ बच्चे बड़े होते तो कुछ छोटे
भी होते थे जो मां बाप को व्यस्त रखते थे।
उस समय का परिवेश ही कुछ और था। गृहणियों के लिये गृह कार्य की सुविधाओं के लिये आज जैसे बिजली के उपकरण भी नहीं थे इसलिए तुलनात्मक रूप से उनके गृह कार्य भी बढ़े हुए थे। मसलन गैस की जगह अंगीठी, चूल्हा, मिक्सी की जगह सिलबट्टा, मूसल थे। दाल मसाले भी आजकल की तरह साफ किये कराये कूटे कुटाये नहीं मिलते थे। ये सब काम उन्हें काफी व्यस्त रखते थे। जिंदगी के हर क्षेत्र में आजकल की तरह पागल कर देने वाली प्रतियोगिता तब न थी।
बच्चों की शिक्षा दीक्षा को लेकर माता-पिता आज की तरह चिंतित नहीं रहते थे।
संयुक्त परिवार के विघटन के साथ ही जब एकल परिवार सीमित हो गये तो पति पत्नी के बीच समस्यायें बढऩे लगी। इनमें मुख्य समस्या थी ऊब और अकेलापन तथा जड़ता का अहसास, जीवन में व्याप्त होती नीरसता, खालीपन सूनापन। बच्चे बड़े होकर अपनी पढ़ाई तथा अपने फ्रेंड सर्कल में व्यस्त हो जाते हैं। पति महोदय बिजनेसमैन हैं तो अधेड़ उम्र तक आते-आते स्थापित हो जाते हैं। कारोबार फैला होता है तो वे उसमें व्यस्त रहते हैं। अगर पति महोदय नौकरी करते हैं तो प्रोमोशनों के बाद आफिस में कार्यभार बढ़ जाता है और वे वैसे व्यस्त हो जाते हैं। मुख्य समस्या होती है गृहणियों के लिए कि वे अपनी ऊब कैसे दूर करें। ऊब एक छूत की बीमारी की तरह है। ऊबने वाला अपनी सोहबत में रहने वालों को भी उबाने लगता है। यही हाल पति पत्नी का होता है। हमारे देश में आज भी अधिकतर स्त्रियां सोचती हैं कि चालीस की होने के बाद वे पूर्णत: बुढ़ा गई हैं और बुढ़ापे में भला क्या साज सिंगार करना, बस तन ढकना है। कितनी गलत मानसिकता है ये। जहां विदेशों में कहा जाता है कि जीवन ही चालीस के बाद शुरू होता है, वहां हमारे यहां की परंपरावादी औरतें इसे जीवन की इति समझ बैठती हैं। वास्तविकता तो यह है कि इस उम्र में बनाव सिंगार तथा शरीर
की देखभाल की ज्यादा आवश्यकता होती है।
अक्सर देखा जाता है कि सारा दिन घर की छोटी मोटी समस्याओं से जूझती पत्नी पति के काम से आते ही समस्याओं की पोटली खोलकर बैठ जाती है। वो तो अपना गुबार निकालकर मन हल्का करना चाहती है लेकिन पति पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, यह भूल जाती हैं। दिन भर की थकान, काम की उलझन, शहरों की भीड़ भाड़ व टै्रफिक से जूझते जब पति घर लौटते हैं तो वे पत्नी को मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर उनका स्वागत करते हुए देखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि एक सच्चे हमराज व हमदर्द की तरह सहानुभूतिपूर्ण ढंग से वह अपनी परेशानियां पूछें या अच्छे मूड में वो अगर आफिस के लोगों के बारे में लतीफा कोई चटपटी बातें, कमेंटस सुनायें तो हंसने हंसाने में पत्नी भी उनका साथ दे। पत्नी अपनी बात भी जरूर कर सकती है लेकिन सही मौके पर।
फिर इस उम्र में पत्नियां अक्सर बहुत फ्रिजिड हो जाती हैं। उनकी रसिकता मानो सारी चुक जाती है। पति महोदय कभी रूमानी मूड में आते है तो 'हटो जी, इस उम्र में चोंचले अच्छे नहीं लगते' कहकर उनका हाथ परे झटक देती हैं।
रोमांस के बिना जीवन कैसा? एक मशीनी जिंदगी ही तो जिंदगी का असली रूप नहीं, जीने का उद्देश्य नहीं। एक सपाट मरूभूमि सी जिंदगी में रोमांस मधुर फुहार की तरह आनंददायक है जो तन मन दोनों को सराबोर कर पुलकित कर देता है। तनावभरी जिंदगी को राहत के क्षण प्रदान करता है।
इसे चोंचले कहकर मुंह बिदकाना पत्नी की बहुत कड़ी भूल है। अपनी रोमानी प्रवृत्ति को वो शायद सस्ते किस्म के उपन्यास पढ़कर या कोई थर्ड रेट हिंदी फिल्म देखकर ही तृप्त कर लेती हैं। यह नहीं कि सिर्फ पत्नियां ही नीरस होती हैं। कई पति भी बेहद नीरस होते हैं। पत्नी कितनी भी सजी धजी हो, सुंदर कपड़े पहने इठला रही हो कि पति महोदय एक नजर तो उन पर इनायत करें, उनके रूप की प्रशंसा करें। ये शब्द 'आज तो तुम गजब ढा रही हो' भला पत्नी के कानों में अमृत न घोलेंगे लेकिन पति महोदय हैं कि अखबार पढऩे में ही मसरूफ हैं। हुस्न और इश्क की बात एक बार पति पत्नी बनने के बाद उन्हें जीवन से निकाल नहीं फेंकनी चाहिए।
पति पत्नी इस उम्र में किसी क्लब, किटी पार्टी या किसी अन्य सांस्कृतिक संस्था के सदस्य बन सकते हैं। इससे उनकी जान पहचान बढ़ेगी, सोशलाइजेशन होगा और मन भी बहलेगा।
पति पत्नी का रिश्ता साझेदारी का होता है। जैसे उनकी खुशी गम सब सांझा होता है, उसी तरह उनकी ऊब भी सांझी है जिसे दूर करने का प्रयत्न सम्मिलित होना चाहिए। एक अकेला आदमी ऊब सकता है लेकिन जहां दो हैं वहां ऊब का क्या काम?
अपने मन की हर बात वे एक दूसरे से कह सकते हैं। एक दूसरे की राय ले सकते हैं। फिर कुछ इधर उधर की, तेरी मेरी गप्पबाजी और हल्की फुल्की गॉसिप करने में हर्ज ही क्या है। इससे वातावरण खुशगवार बना रहेगा और उन्हें भी जिंदादिली का अहसास होगा।
इस तरह थोड़ी समझदारी, थोड़ी रसिकता, थोड़ा बदलाव, कोई हाबी और हल्की फुल्की गॉसिप उनके जीवन से ऊब का नामोनिशान सदा के लिए मिटा देगी।
- उषा जैन 'शीरीं'

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