इस्तीफे के बहाने मायावती ने खेला दलित कार्ड

इस्तीफे के बहाने मायावती ने खेला दलित कार्ड

मानसून सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हुआ। इसमें एक दलित के राष्ट्रपति बनने की बुनियाद पड़ी जबकि मानसून सत्र के दूसरे ही दिन दलितों की राजनीति करने वाली बसपा प्रमुख मायावती को राज्यसभा से त्यागपत्र देना पड़ा। मायावती के त्यागपत्र के कारणों पर नाराज विपक्ष ने देश में अघोषित आपातकाल जैसी बात कहनी शुरू कर दी है। सपा के एक नेता तो यहां तक कह रहे हैं कि लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन विपक्ष का सम्मान होना चाहिए।
कांग्रेस नेत्री रेणुका चैधरी ने कहा है कि इस देश में एक दलित नेता को बोलने का अधिकार नहीं है। इसके विपरीत भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि मायावती पिछले लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार से हताश हैं और इस्तीफा देने की धमकी देकर उपसभापति का अपमान कर रही हैं। उन्हें इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। इस घटना के बाद जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। जब मायावती ने अपना ट्विट किया कि उन्हें बोलने नहीं दिया गया तो वे राज्य सभा से इस्तीफा दे देंगी तो इसके जवाब में जनता की ओर से कहा गया कि मैडम इस शुभ कार्य को करने में एक क्षण का भी विलंब न करें। मतलब जनता भी नहीं चाहती कि इस देश में जाति और धर्म की राजनीति हो।
इसमें संदेह नहीं कि विपक्ष को सम्मान मिलना चाहिए और जब प्रधानमंत्री ने विपक्ष को पहले ही इस बात का आश्वासन दे रखा है कि सभी को अपनी बात कहने का मौका मिलेगा तो इसमें विपक्ष के अपमान का सवाल ही कहां पैदा होता है? अपनी बात रखना और राजनीति करना दो अलग बातें हैं। संसद में सार्थक बहस होनी चाहिए लेकिन जिस तरह से हर बार संसद का समय हंगामे की भेंट चढ़ता है, उसके मूल में टीवी पर चेहरा चमकाने की सोच भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। संसद अनुशासन और मर्यादा का मंच है।
वह बहस-मुबाहिसे का मंच है। तर्क-वितर्क का मंच है लेकिन राजनीति का मंच हरगिज नहीं है। विपक्ष को यह भी सोचना होगा कि बबूल बोकर आम नहीं खाया जा सकता। सम्मान पाने के लिए सम्मान देना भी होता है। सम्मान का सिद्धांत कभी-कभी राजनीति के सिद्धांत से बिल्कुल जुदा होता है। संसद अनुशासन का दूसरा नाम है। वहां व्यवस्था बनती है। व्यवस्था बनाने के लिए कानून बनता है। कानून बनाने वाले, व्यवस्था की बात करने वाले ही अगर व्यवस्था तोड़ने पर आमादा हो जाएं तो इससे अराजकता और स्वच्छंदता के हालात पैदा होते हैं।
हर सांसद अपने क्षेत्र की जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होता है। उसका अपना महत्व होता है। सांसद चुने जाने के बाद न तो कोई दलित होता है, न सवर्ण और न ही पिछड़ा। सार्वजनिक जीवन में इस तरह की सोच उचित भी नहीं है। सांसदों को जाति-धर्म की रोशनी में देखना कथमपि न्यायसंगत नहीं है। जनप्रतिनिधि सबका होता है। वह किसी जाति विशेष का नहीं होता। इस सोच को बदले जाने की जरूरत है। यह पहला मौका नहीं है जब मायावती ने दलित राग छेड़ा हो। यह राग वैसे भी उनकी राजनीतिक पूंजी रहा है। एक बार उनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जागी थी और जब उन्हें अपनी दाल गलती नजर नहीं आई तो उन्होंने यहां तक आरोप जड़ दिया कि वे दलित की बेटी हैं, इस नाते उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया। जब- जब उन पर सीबीआई जांच का शिकंजा कसा, उन्होंने दलित की बेटी वाले जुमले को बेहिचक दोहरा दिया और कहना न होगा कि इससे उन्हें बहुत हद तक दलितों की सहानुभूति का लाभ भी मिला लेकिन जब उन्हीं की पार्टी के लोगों ने निकाले जाने के बाद उन्हें दलित नहीं, दौलत की बेटी करार दिया तो इससे उनकी छवि को धक्का ही लगा।
रही बात बसपा प्रमुख मायावती के त्यागपत्र की तो इस आरोप के साथ उन्होंने राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया कि उन्हें सदन में अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। सवाल यह उठता है कि जब सभी सदस्यों को उपसभापति पीजे कुरियन ने यह व्यवस्था दी थी कि वे तीन मिनट में ही अपनी बात कहें तो मायावती ने सात मिनट क्यों लिए? यह तो व्यवस्था के खिलाफ जाने और सदन के अनुशासन को तोड़ने वाली बात हुई। ऐसे में अगर उपसभापति ने उन्हें टोका और अपनी बात समाप्त करने की सलाह दी तो इसमें गलत क्या है जो मायावती इतनी उग्र हो गईं। वे ऐसी कौनसी बात कह रही थीं जो तीन मिनट में खत्म नहीं हो सकती थी।
सदन विषय को उठाने का मंच है और जिस मुद्दे पर मायावती अपनी बात कह रही थीं, उसे कम समय में भी कहा जा सकता था तो क्या अपनी दलित राजनीति चमकाने के लिए मायावती ने ऐसा किया? बकौल मायावती, 'मैं अगर सदन में दलितों के हितों की बात नहीं उठा सकती तो मेरे राज्यसभा में रहने पर लानत है। मैं अपने समाज की रक्षा नहीं कर पा रही हूं। अगर मुझे अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया जा रहा है तो मुझे सदन में रहने का अधिकार नहीं है। मैं सदन की सदस्यता से आज ही इस्तीफा दे रही हूं।' विचारणीय तो यह है कि क्या वाकई मायावती को अपनी बात कहने का मौका नहीं मिला। जब वे मुख्यमंत्री थीं और जब तक राज्यसभा सांसद रहीं तो उन्होंने कितने दलित गांवों को गोद लिया। उन्हें आदर्श गांव बनाया। आलोचना करना आसान है लेकिन प्राप्त अवसरों को समाजहित के प्रति प्रतिबद्ध करना और बात है?
जिंदगी में चार संयमों की बात कही गई है। इंद्रिय संयम, विचार संयम, समय संयम और अर्थ संयम। पांचवां कोई संयम है ही नहीं। अगर मायावती ने समय और विचार संयम का ध्यान रखा होता तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा नहीं देना पड़ता। देश भर में भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्याएं होने के मुद्दे पर राज्यसभा में मंगलवार को नियम 267 के तहत चर्चा के दौरान उप सभापति ने हर सदस्य के तीन मिनट का समय निर्धारित किया था। विपक्ष को उसी वक्त इसका प्रतिवाद करना चाहिए था। और समय बढ़ाए जाने की मांग करनी चाहिए थी। विपक्ष यह भी दलील दे सकता था कि समय बढ़ा दिया जाए। वक्ताओं की संख्या घटा दी जाए। उन्हें दूसरे दिन मौका दे दिया जाए लेकिन लगता है कि विपक्ष इस मामले में विफल हो गया। मायावती की मानें तो सहारनपुर में हिंसा को जातीय हिंसा का नाम दिया गया है, जबकि यह दलितोें को डराने-धमकाने की कार्रवाई थी। इस पर सदन में हंगामा हुआ। जरूरी तो नहीं कि सदन में हर विचार पर सहमति ही हो। मायावती का कहना था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से भीड़ द्वारा हत्या करने की घटनाएं बढ़ रही हैं। अल्पसंख्यकों, पिछड़े, दलितों, किसानों और मजदूरों का दमन किया जा रहा है। मायावती का तर्क सही हो सकता है कि यह शून्यकाल नहीं है कि केवल तीन मिनट दिए जाएं। अपनी बात कहने के लिए ज्यादा समय दिया जाना चाहिए था। अगर इसी तरह के विचार सभी सांसद करने लगें तो संसद में समय का अभाव हो जाएगा। ऐसे में संसदीय कार्यवाही के नियमन पर सवाल उठने लगेंगे। इस पर भी तो ध्यान देने की जरूरत है।
जहां तक इस्तीफे का सवाल है तो यह भी मायावती की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। दलित राजनीति से उनके पांव पहले ही उखड़ चुके हैं। 2 अप्रैल, 2018 को राज्यसभा की मायावती समेत 10 सीटें रिक्त हो रही हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 403 सीटों में से सिर्फ 19 सीटें ही मिली हैं। बसपा के पास इतना संख्या बल भी नहीं है कि वह मायावती को राज्यसभा पहुंचा सके। 5 मई 2018 को भी उत्तर प्रदेश विधानपरिषद की 13 सीटें खाली हो रही हैं, लेकिन मायावती 2017 के संख्याबल के आधार पर वहां भी नहीं जा सकती। उनकी चिंता का यह बड़ा कारण है। 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को पूर्ण बहुमत मिला था और पार्टी का वोट प्रतिशत भी 30 से ज्यादा था लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 403 सीटों में से सिर्फ 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा। मायावती का वोट बैंक मानी जानी वाली दलित बहुल सीटों में से भी 84 प्रतिशत सीटें भाजपा प्रत्याशी जीत गए। दलित वोट बैंक का 41 फीसदी वोट भी भाजपा के खाते में चला गया। ये आंकड़े इतना तो बताते ही हैं कि मायावती के लिए राज्य सभा या विधान परिषद की राह बहुत आसान नहीं है।
ऐसे में उनकी बौखलाहट स्वाभाविक ही है। मायावती का वर्चस्व दलितों के भरोसे था। फिलहाल उनका परंपरागत दलित वोट बैंक दलित और गैर दलित के बीच बंट गया है। वे चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं लेकिन इसके बाद भी दलितों की जिंदगी में कोई खास परिवर्तन नहीं आ सका। वे दलितों की राजनीति तो करती रहीं लेकिन दलितों का हाल जानने कभी वे उनके बीच नहीं गई। राहुल गांधी ने जब किसी दलित परिवार में भोजन किया तो उनकी आलोचना की। भाजपा ने डोमराज के यहां दलित भोज किया तो उसकी आलोचना की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वाराणसी के रविदास मंदिर में जाना और महू में अंबेडकर जयंती मनाना भी उन्हें रास नहीं आया।
रामनाथ कोविंद को देश के प्रथम नागरिक की कुर्सी पर बैठाने का भाजपा का प्रयास भी उनके गले नहीं उतर रहा है क्योंकि अंदरखाने इस निर्णय से वे खुद को दलित राजनीति से बेदखल होता पा रही हैं।सच तो यह है कि मायावती को अब अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो गया है। उनकी राजनीति के दिन लद चुके हैं। उनके भ्रष्टाचार का भांडा फोड़ने के लिए सीबीआई उन पर कभी भी शिकंजा कस सकती है। इसलिए पहले ही उन्होंने दलित राग छेड़ दिया है। उनकी चिंता के केंद्र में 2019 है और मोदी तथा योगी सरकार जिस तरह दलितों के लिए काम कर रही है, उससे लगता नहीं कि दलितों के बीच मायावती की दाल भी गल पाएगी। ऐसे में केंद्र सरकार और भाजपा को दलित विरोधी और जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त बताकर वे दलितों में अपनी पैठ बनाना चाहती हैं लेकिन वे यह भूल रही हैं कि काठ की हांड़ी चूल्हे पर एक ही बार चढ़ती है। दलित की बेटी कहलाने भर से काम नहीं चलेगा, दलितों के लिए कुछ खास करना भी होगा। बरगलाने और भड़काने से दलितों का विकास नहीं होगा।
मायावती को अपने बनवाए पार्कों की तो चिंता है लेकिन दलितों की नहीं। बेहतर तो यह होता कि वे केंद्र और प्रदेश सरकार को बतातीं कि कौन से तौर-तरीके अपनाकर दलितों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है। वे आरक्षण की तरफदारी करती हैं लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि दलितों के कंधे से आरक्षण की वैशाखी कब हटेगी। कब वे आत्मनिर्भर होंगे?
-सियाराम पांडेय 'शांत'

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