मीरा-कोविंद की जंग का चैप्टर खत्म, कयासों का बाजार गर्म

मीरा-कोविंद की जंग का चैप्टर खत्म, कयासों का बाजार गर्म

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रथम नागरिक का चुनाव हो गया। सांसदों और विधायकों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर अपने पसंद के राष्ट्रपति के नाम पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी। इसी के साथ रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार की चुनावी जंग का चैप्टर खत्म हो गया है और तेज हो गया है कयासों का बाजार। राष्ट्रपति पद के मतदान की समाप्ति के साथ ही भाजपा ने अपने सहयोगी दलों से विमर्श कर उपराष्ट्रपति पद के लिए देश के संसदीय कार्य मंत्री एम.वेकैया नायडू का नाम घोषित कर दिया। इसी के साथ राजग प्रत्याशी नायडू और यूपीए प्रत्याशी गोपालकृष्ण गांधी के बीच भी हार-जीत की जंग शुरू हो गई है। ऐसे में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद राजग की झोली में जाने के आसार प्रबल हो गए हैं। गोपालकृष्ण गांधी पर जिस तरह आतंकवादी याकूब मेनन के बचाव में पैरवी करने के आरोप लग रहे हैं, उससे उनका पक्ष बेहद कमजोर माना जा रहा है। जहां तक राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव का सवाल है तो अपने प्रचार अभियान में संप्रग प्रत्याशी मीरा कुमार ने सभी सांसदों और विधायकों से अपील की थी कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट करें और उत्तर प्रदेश में एक कांग्रेस नेता ने कहा है कि राज्य में भाजपा नेता अपनी अंतरात्मा की आवाज पर मीरा कुमार को वोट कर रहे हैं। आत्मा की आवाज पर वोट हुआ या पार्टी की गाइड लाइन पर, यह तो मतगणना के बाद ही तय होगा लेकिन इस चुनाव ने देश के सामने कई सवाल छोड़ दिए हैं। विपक्ष की मोदी विरोधी एकजुटता पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। मुलायम परिवार की कलह तो उजागर हुई ही है, राजद और जद-यू की राजनीतिक एकता में भी दरार पड़ी है। सपा को तो स्पष्टीकरण देने तक को विवश होना पड़ा है। मीडिया को यह बताना पड़ा कि वोट देने की बात कहना और बात है तथा वोट देना और बात है। मतदान के दौरान अपने लोगों की गलती छिपाने का भी माहौल रहा और उन्हें घटिया बताने-जताने का भी। बागियों को अच्छा कहने की कभी परंपरा नहीं रही है लेकिन उनके प्रति अप्रिय टिप्पणी से बचा तो जाना ही चाहिए। चुनाव तो होते रहते हैं परंतु व्यावहारिक कटुता हमेशा दुख देती है। वाणी का अनुशासन तो होना ही चाहिए।
इस चुनाव में तीन राज्यों में क्राॅस वोटिंग की भी खबरें मिल रही हैं। उत्तर प्रदेश में सपा नेता शिवपाल यादव ने तो ट्विट कर यह बात कही है कि उन्होंने नेताजी मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर राजग प्रत्याशी रामनाथ कोविंद के समर्थन में मतदान किया है। सपा के कुछ सांसदों और 15 विधायकों ने भी कोविंद के समर्थन में वोट किया है। विकथ्य है कि 403 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में सपा के 47 विधायक हैं। सपा के कद्दावर नेता पहले तो इस बात को ही नकारने में जुटे रहे कि सपा ने कोविंद को वोट भी किया है लेकिन जब उन्हें शिवपाल के दावे का हवाला दिया गया तो अपने बिगड़े बोल बोलने से भी वे बाज नहीं आए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि राष्ट्रपति चुनाव में जो भी क्रास वोटिंग करेंगे, घटिया लोग होंगे। मुलायम सिंह यादव को वे किस कोटि में रखेंगे, यह तो वही जानें। अलबत्ते उन्होंने यहां तक कह दिया है कि मुलायम सिंह यादव ने संप्रग प्रत्याशी मीरा कुमार को वोट दिया है लेकिन जिस तरह लोकसभा में मुलायम सिंह यादव ने एक बार पुनश्च प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, उनके कान में बात की, उससे तो हरगिज नहीं लगता कि आजम खान के दावे में कोई दम है।
बसपा प्रमुख मायावती ने पहले ही अपना स्टैंड साफ कर दिया था कि वे विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार का ही समर्थन करेंगी और उनकी पार्टी ने इस पर अमल किया भी लेकिन जीत-हार को लेकर आया उनका बयान उनकी हताशा और बेचैनी का ही इजहार करता है। बकौल मायावती, दोनों ओर से दलित उम्मीदवार हैं। कोई भी जीते, मुझे खुशी होगी। दलित उम्मीदवार बसपा की ही देन है। उनकी इस बात में दम हो सकता है लेकिन कोविंद अंबेडकरवादी दलित नहीं हैं। वे भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता हैं। ऐसे में उनकी जीत पर संतोष करने में भी मायावती को अंदरूनी तकलीफ ही होगी। दलित होना और अपनी विचारधार का होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मायावती या उन सरीखी सोच के लोगों के लिए कोविंद की जीत भी संतोषप्रद हो सकती है लेकिन उनका यह संतोष भी दिखावे का और अपने आंसू खुद पोंछने वाला होगा। खैर, मायावती को इतना पता तो चल ही गया है कि राष्ट्रपति चुनाव में पलड़ा किसका भारी है? राजग प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को भाजपा समेत देश के 22 दलों का समर्थन हासिल है जबकि मीरा कुमार को कांग्रेस समेत 18 दलों का। कोविंद के पास अगर 63 प्रतिशत वोट होने का अनुमान है तो मीरा कुमार के पास 27 प्रतिशत का। असल स्थिति तो 20 जुलाई को मतगणना के बाद ही तय होगी लेकिन आंकड़े तो अभी से रामनाथ कोविंद की जीत के नगाड़े बजाते नजर आ रहे हैं। कोविंद की जीत लगभग तय मानी जा रही है, राजग के लिए प्रतिष्ठा इस बात की है कि जीत का अंतर क्या होगा?
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अगर विपक्ष से एकजुट संघर्ष की अपील करती नजर आई हैं तो इसका मतलब उन्हें भी हवा के रुख का आभास हो गया है। त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और गुजरात में क्रॉस वोटिंग का की सूचना मिली है। त्रिपुरा में तृणमूल के 6 और कांग्रेस के 1 विधायक ने पार्टी लाइन से अलग हटकर कोविंद को वोट दिया। गुजरात में भी भाजपा के एक बागी ने मीरा कुमार के पक्ष में वोट डाला है। इस बार राष्ट्रपति चुनाव देश के लिए कई मायने में महत्वपूर्ण है। पहली बात तो यह कि केआर नारायणन के बाद देश को दूसरा दलित राष्ट्रपति मिलेगा। कोविंद के चुनाव जीतने के बाद वे राजग की पसंद के दूसरे राष्ट्रपति होंगे। राजग की पसंद के पहले राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम थे। मीरा कुमार की जीत हालांकि मौजूदा समीकरणों को देखते हुए संभव नहीं है,फिर भी अगर उनके पक्ष में कोई चमत्कार हो जाए तो संप्रग को प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के बाद देश में दूसरी महिला राष्ट्रपति बनवाने का गौरव हासिल होगा। कोविंद की जीत के बाद उत्तर प्रदेश का गौरव सहज ही बढ़ जाएगा। अभी तक उसे देश को नौ प्रधानमंत्री देने का रुतबा हासिल है। पहली बार उसे यह कहने का मौका मिलेगा कि देश का राष्ट्रपति उसके अपने प्रदेश से है।
संभावना तो यह भी है कि कोविंद राजग के बाहर से मिले वोटों के दम पर प्रणब मुखर्जी से ज्यादा मतों के साथ चुनाव जीत सकते हैं। साल 2012 के चुनाव में प्रणब मुखर्जी ने 69 फीसद वोट हासिल कर अपने प्रतिद्वंद्वी पीए संगमा को हराया था। इस बार का राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव कई मायने में खास है। चुनाव परिणाम के बाद इन दोनों ही पदों पर आसीन लोग राष्ट्रवादी विचारधारा के होंगे। भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए यह बेहद सुकूनदेह स्थिति होगी। ऐसा होता है तो राज्यसभा में अटकने वाले बिल लोकसभा में पास कर सीधे राष्ट्रपति को भेजे जा सकेंगे। ऐसे में विकास के रास्ते की बहुत बड़ी बाधा राजग सरकार के सिर से टल गई लगती है। उम्मीद की जा सकती है कि इस चुनाव के बाद देश के अच्छे दिन बेरोक-टोक आ सकेंगे। संसद में विपक्ष का वर्चस्व कम होगा और उसकी मनमानी से भी निजात मिल सकेगी।
सियाराम पांडेय 'शांत'

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