कोविंद-मीरा की जंग में हारेगा रिश्ता

कोविंद-मीरा की जंग में हारेगा रिश्ता

राष्ट्रपति पद के चुनाव में महागठबंधन बनाने की कवायद धराशायी होती नजर आ रही है। बिहार में अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजग प्रत्याशी रामनाथ कोविंद की तरफदारी कर कांग्रेस और राजद का खेल बिगाड़ दिया है तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का सबसे बड़ा सियासी कुनबा भी इस मुद्दे पर पूरी तरह बंटा नजर आ रहा है। अखिलेश यादव जहां सपा के सभी विधायकों का मत मीरा कुमार की ओर जाने की बात कर रहे हैं, वहीं शिवपाल यादव ने राजग प्रत्याशी रामनाथ कोविंद के प्रति आस्था जताई है। सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव बहुत पहले ही इस बात का एलान कर चुके हैं कि वे यूपी के बेटे रामनाथ कोविंद का समर्थन करेंगे। मुलायम और शिवपाल अगर कोविंद के पक्ष में मतदान करते हैं तो उनके समर्थक विधायक मीरा कुमार के पक्ष में मतदान तो नहीं ही करेंगे। ऐसे में सपा के सभी विधायकों का मत मीरा कुमार को मिलना दूर की कौड़ी ही है।
समझा तो यह जा रहा था कि वर्ष 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद इस परिवार की छठी इंद्री जाग जाएगी। वह एक हो जाएगा। ठोकर लगने पर व्यक्ति वैसे भी सचेत हो जाता है। संभल कर चलने लगता है लेकिन मुलायम सिंह यादव का परिवार इसका अपवाद है। राष्ट्रपति पद की संप्रग प्रत्याशी मीरा कुमार ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अपनी जीत की संभावना तलाशी। वे बसपा प्रमुख मायावती से पहले मिलीं और अखिलेश यादव से बाद में। जाहिर तौर पर उन्होंने राजनीतिक वरिष्ठता का पूरा ध्यान रखा। यह जानते हुए भी कि सपा के पास ज्यादा विधायक हैं और मायावती के पास बहुत कम, उन्होंने मिलने में प्रथम वरीयता अगर मायावती को दी तो इसके पीछे भी एक बड़ा मनोविज्ञान है। पहली बात तो मीरा कुमार भी दलित हैं और मायावती भी। जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी झोली से रामनाथ कोविंद की प्रत्याशिता के रूप में अपना दलित कार्ड निकाला था, तो उसे देखकर सभी राजनीतिक दल सकते में आ गए थे। उस समय भाजपा की धुर विरोधी मायावती ने भी भाजपा अध्यक्ष के इस निर्णय का स्वागत किया था और कहा था कि उनकी पार्टी दलित होने के नाते कोविंद का समर्थन करेगीे लेकिन अगर विपक्ष कोविंद से बड़ा कोई दलित चेहरा राष्ट्रपति पद के लिए सामने लाता है तो बसपा अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेगी। उस समय दलितों में यह संदेश गया था कि मायावती दलितों के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।
जब कांग्रेस ने प्रत्याशी के रूप में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार का नाम प्रस्तावित किया तो मायावती ने पाला बदलने में एक क्षण भी जाया नहीं किया। मीरा कुमार के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि एक दलित नेत्री दूसरे दलित नेता के मुकाबले उन्हें तरजीह दे रही है। ऐसे में नीतिगत तरीके से भी पहले मिलने का हक मायावती को ही जाता है, लेकिन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार से यह अपेक्षा तो नहीं की जाती कि वह मिलने में भी जातीय नजरिए को अहमियत दे। अखिलेश यादव का कलेजा बड़ा है कि उन्होंने इसके बाद भी मीरा कुमार को सभी सपा विधायकों के समर्थन का आश्वासन दिया। अन्यथा बुआ और बबुआ के बीच की राजनीतिक नूराकुश्ती किसी से छिपी नहीं है। भाजपा के विजयरथ को बढ़ने से रोकना है, इसलिए महागठबंधन का राग अलापना दोनों की मजबूरी हैं। कविवर रहीम ने लिखा है कि 'कह रहीम कैसे निभै केर-बेर को संग। वे डोलत रस आपनो इनके फाटत अंग।' मजबूरी में कुछ भी किया जा सकता है। सपा और बसपा इस नियम का अपवाद नहीं हो सकती।
मुलायम सिंह यादव ने रामनाथ कोविंद को यूपी का बेटा कहा था। इसके सापेक्ष लालू प्रसाद यादव ने मीरा कुमार को बिहार की बेटी कहा था। मतलब पूरा राष्ट्रपति चुनाव यूपी और बिहार के बीच केंद्रित हो गया था। लालू प्रसाद यादव की योजना बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड का इस बहाने माइंड वाश करने की थी, लेकिन नीतीश कुमार ने यह कहकर उनके इस दावे की हवा निकाल दी थी कि क्या बिहार की बेटी को हारने के लिए राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया गया है। तब से लेकर आज तक नीतीश कुमार को मनाने के कई उताजोग हो रहे हैं। राहुल गांधी के बाद सोनिया गांधी नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच वार्ता करा रही हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही है। मीरा कुमार को भी नीतीश कुमार के अड़ियल रुख से लग रहा है कि वहां उनकी दाल नहीं गलने वाली।
जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव के लालू प्रेम और मीरा यादव के प्रति समर्थन के भाव से उन्हें थोड़ी उम्मीद भी है। उन्हें लगता है कि देर-सबेर नीतीश मान जाएंगे और बाजी उनके हाथ आ जाएगी। उत्तर प्रदेश में चलते-चलते उन्होंने यूपी कार्ड खेल दिया है। रामनाथ कोविंद जिस कानपुर से आते हैं और अपने को यूपी का बेटा बताते हैं, कानपुर का बेटा बताते हैं, मीरा कुमार ने भी खुद को कानपुर की बेटी बता दिया है। उन्होंने कहा है कि कानपुर में उनकी ननिहाल है। मतलब उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर के बेटा-बेटी आमने-सामने हैं। रामनाथ कोविंद का बिहार से भी रिश्ता रहा है। वहां के राज्यपाल के रूप में और मीरा कुमार का यूपी से रिश्ता है ननिहाल के रूप में। दोनों ही एक दूसरे को शिकस्त देने के लिए अलग-अलग राज्यों का भ्रमण कर रहे हैं। रामनाथ कोविंद अगर महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मिलने वाले हैं और उनसे अपने समर्थन की अपील करने वाले हैं तो मीरा कुमार भी विभिन्न राज्यों में गैर भाजपाई दलों के प्रमुखों से मिल रही हैं।
ज्यों-ज्यों राष्ट्रपति चुनाव की तिथियां नजदीक आ रही हैं, चुनाव रोमांचक होता जा रहा है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल महागठबंधन की सफलता को लेकर एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं, जबकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नजर भी रामनाथ कोविंद की जीत पर है। नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे का साथ मिला तो कोविंद का जीतना लगभग तय है लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगी दल अंतिम क्षणों तक भाजपा का खेल बिगाड़ने का प्रयास करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। इस चुनाव में राजग और संप्रग दोनों ही की प्रतिष्ठा दांव पर है। संप्रग को पता है कि जीत का समीकरण राजग के साथ है। देश के तेरह राज्यों और केंद्र में उसकी सरकार है, लेकिन 'खेलब न खेलय देब खेलवय बिगारब' की रणनीति पर काम करने में बुराई क्या है? लगा तो तीर नहीं तो तुक्का।
उपराष्ट्रपति चुनाव में भी केंद्र को घेरने की मुकम्मल तैयारी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने कर रखी है। गांधी जी के पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी को उम्मीदवार बनाकर उसने केंद्र की मुश्किलें बढ़ा दी है, लेकिन याकूब मेमन के क्षमादान की सिफारिश मामले में गांधी पहले ही घिरे हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस का चेहरा एक बार फिर बेनकाब हुआ है। मीरा कुमार और रामनाथ कोविंद की जंग निर्णायक दौर में हैं। उत्तर प्रदेश के नेताओं के लिए बेहद पसोपेश की स्थिति है कि वह दलित बेटे और दलित बेटी में से किसे अपनाएं। बेटे को या नतिनी को। जीत-हार तो पूरे देश के वोट से तय होनी है लेकिन उत्तर प्रदेश में हारेगा भी रिश्ता और जीतेगा भी रिश्ता। कोविंद और मीरा को लेकर भी और मुलायम परिवार को लेकर भी। जीते कोई भी, हारना तो रिश्ते को ही है।

-सियाराम पांडेय 'शांत'

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