महाराष्ट्र की सियासत में उलझ गई भाजपा

महाराष्ट्र की सियासत में उलझ गई भाजपा

प्रभुनाथ शुक्ल

सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद अंततः महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणनवीस सरकार की दूसरी पारी महज 80 घंटों में खत्म हो गई। सरकार को 24 घंटे में सदन में बहुमत सिद्ध करना था लेकिन इस सारे खेल के तमाशाई मोहरे उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के त्यागपत्र देने के बाद मुख्यमंत्री के पास इस्तीफा देने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा। राजनीतिक रुप से भाजपा की यह नैतिक पराजय है। भाजपा को सरकार बनाने में जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए थी। उसे देखो और इंतजार करो की नीति पर आगे बढ़ना चाहिए था। महाराष्ट्र में सरकार बनाने में केंद्रीय नेतृत्व को भी संयम बरतना चाहिए था। लेकिन भाजपा ने अजीत पवार पर भरोसा कर चौंकाने वाला फैसला लिया। जिसकी सजा उसे भुगतनी पड़ी। अमित शाह की 'चाणक्य राजनीति' को शरद पवार ने जो पटखनी दिया उसे भाजपा शायद कभी भूल नहीं सकती है। शरद पवार ने भाजपा के खिलाफ असंभव एकजुटता को संभव कर दिखाया।

मराठा राजनीति की साख बचाने में पवार पूरी तरफ कामयाब हुए। जबकि सत्ता की चाहत में भाजपा खुद के बुने जाल में उलझ गई। गोवा, मणिपुर की तरह उसकी चाल सफल नहीं हो पाई। भाजपा को भरोसा था कि अजीत पवार एनसीपी को दो फाड़ कराने में कामयाब हो सकते हैं। लेकिन उसकी यह सोच उसी पर भारी पड़ी। बहुमत नहीं मिला था तो भाजपा को अपनी सियासी महत्वाकांक्षा किनारे कर चुप बैठ जाना चाहिए था। लेकिन सरकार बनाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व के इशारे पर फडणवीस ने जो कदम उठाया वह आत्मघाती साबित हुआ। भाजपा निश्चित रुप से इस घटनाक्रम से सबक लेगी।

महाराष्ट्र में अब एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनेगी। उद्धव बालासाहब ठाकरे महाविकास अघाड़ी सरकार के मुखिया बनाये गए हैं। तीनों दलों के विधायक दल की मीटिंग में उन्हें इस गठबंधन का नेता चुना गया है। इससे पहले तीनों दलों के नेताओं ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति दी। ठाकरे की अगुवाई वाली सरकार उसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर चलेगी। राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने उद्धव बालासाहब ठाकरे को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया है। वह बृहस्पतिवार 28 नवम्बर को शाम 6.40 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। राज्यपाल ने उन्हें 3 दिसम्बर तक बहुमत साबित करने को कहा है।

महाराष्ट्र में एक बार फिर हिंदुत्व का परचम लहराएगा। यह दीगर बात है इस बार सरकार भाजपा-शिवसेना की बजाय महाविकास अघाड़ी की होगी। उद्धव के नेता चुने जाने पर यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि शिवसेना के प्रखर हिंदुत्व का क्या होगा? आम तौर पर मुसलमानों को लेकर शिवसेना काफी उग्र रहती है। ऐसे में कांग्रेस-एनसीपी के साथ शिवसेना की कैसे निभेगी? कई तरह के सवाल हैं, जिसका उत्तर फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं। उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में एक उदारवादी नेता रहे हैं। उनकी पार्टी पर प्रखर हिंदुत्व का आरोप भले लगता रहा हो, लेकिन उनकी तरफ से कभी ऐसी बातें सामने नहीं आई जिसकी वजह से किसी को गहरा घाव लगे। शिवसेना ने भाजपा सरकार में रहते हुए भी अपनी एक अलग छवि बनाए रखी। शिवसेना के मुखपत्र सामना में ठाकरे ने भाजपा की नीतियों का खुलकर विरोध किया। विश्लेषक मानते रहे हैं कि शिवसेना सत्ता में रहते हुए भी प्रतिपक्ष की भूमिका निभाती रही और सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ मुखर रही। ठाकरे परिवार से उद्धव पहले ऐसे व्यक्ति होंगे जो मुख्यमंत्री की कमान संभालेंगे।

उद्धव ठाकरे ने साफ कर दिया है कि उनकी पहली प्राथमिकता किसानों की समस्या होगी। वहां असमय बारिश की वजह से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि किसानों के आंसू नहीं छलकने देंगे। हिंदुत्व को लेकर उन्होंने साफ कर दिया है कि मेरा हिंदुत्व कभी गलत कार्यों का समर्थन नहीं करता है। उद्धव ने यह भी कहा कि भाजपा की घृणित राजनीति की वजह से दोस्ती टूटी। उन्होंने शरद पवार के साथ सोनिया गांधी को भी धन्यवाद दिया। शिवसेना की इस पूरी राजनीति में संजय राउत बड़ी भूमिका में उभरे हैं। राउत की रणनीति की वजह से कांग्रेस और एनसीपी एक मंच पर आने में कामयाब हुई हैं। कांग्रेस और एनसीपी की विचारधारा शिवसेना के एकदम उलट थी, लेकिन तीनों दलों को एक साथ लाने में संजय राउत ने खास भूमिका निभाई। भाजपा-शिवसेना के सियासी झगड़े में संजय राउत पूरी तरह अडिग रहे और बार-बार कहते रहे कि मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। हिंदू ह्दय सम्राट बालासाहब ठाकरे के बाद 'मातोश्री' एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति का पावर सेंटर बनेगा। शिवसेना और उसके कार्यकर्ताओं पर सरकार चालाने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।

महाराष्ट्र की राजनीति में एनसीपी मुखिया शरद पवार मराठा छत्रप के रुप में उभरे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति का पावर रिमोट शरद पवार के पास होगा। शरद पवार खुद को मराठा छत्रप साबित करने में कामयाब हुए हैं। उन्होंने बेहद चालाकी से भतीजे अजीत पवार का पंख काटने का काम किया। नतीजतन अजीत पवार को थक-हारकर घर लौटना पड़ा। शरद ने भतीजे अजीत को उनकी लक्ष्मण रेखा का ख्याल कराया।

निवर्तमान मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कहा है कि तीन पहियों की सरकार बहुत दिन नहीं चलेगी। सियासत में हर नेता दूसरे को खोटा बताता रहा है। सरकार के कार्यकाल पर टिप्पणी करना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

भाजपा ने जिस तरह मणिपुर, गोवा और हरियाणा में सरकार बनाई, उसी राजनीति को वह महाराष्ट्र में भी कामयाब करने का मंसूबा पाले थी। इसे लेकर कांग्रेस और दूसरे दलों की चिंता बढ़ती जा रही थी। अंततः विचारधारा को खूंटी पर टांग सभी को एक मंच पर आना पड़ा। इससे सबक मिलता है कि राजनीति में कोई अछूत नहीं होता। अगर भाजपा कश्मीर में पीडीपी और बिहार में नीतीश की जनता दल (यू) के साथ सरकार बना सकती है तो महाराष्ट्र में अलग-अलग विचारधारा के बाद भी एकजुटता क्यों नहीं हो सकती? इसे केवल महाराष्ट्र की राजनीति तक सीमित रखकर नहीं देखना चाहिए। इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी दूरगामी होगा। भाजपा ने जिस चालाकी से अजीत पवार को अपने पाले में लेकर पवार परिवार में फूट डालने की साजिश रची उसे मराठा छत्रप ने ध्वस्त कर दिया। अजीत पवार के भाजपा खेमे में जाने के बाद शरद पवार पर यह आरोप भी लगे कि इसमें उनकी साजिश हो सकती है। लेकिन अततः उद्धव को गठबंधन का नेता चुन बड़े पवार ने अपना स्टैंड साफ कर दिया।

महाराष्ट्र के पूरे घटनाक्रम में राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी की छवि को भी गहरा धक्का लगा है। राजभवन ने संविधान को ताक पर रख कर जिस तरह की जल्दबाजी दिखाई उससे राज्यपाल पद की गरिमा को ठेस लगी है। सत्ता के लिए राजनीतिक दलों को ऐसी राजनीति से बचाना होगा। हमें हर हाल में लोकतांत्रिक और संविधानिक मान्यताओं को अक्षुण्य रखना होगा।


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