कहां तक जाएगी अधिकार की यह प्रक्रिया

कहां तक जाएगी अधिकार की यह प्रक्रिया

डॉ. प्रभात ओझा

हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद अपने बारे में एक फैसला देते हुए कहा है कि उसकी कार्यविधि और उससे सम्बंधित कोई जानकारी देश का हर नागरिक ले सकता है। दरअसल, यह सवाल लंबे समय से लंबित था कि सर्वोच्च न्यायालय को आरटीआई (सूचना का अधिकार) के अंतर्गत आना चाहिए अथवा नहीं। आरटीआई का मकसद सरकारी महकमों की जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता लाना है। वर्ष 2005 में आये आरटीआई के जरिये भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना ही इसका मकसद है। कानून कहता है कि जो जानकारी संसद या विधानमंडल के सदस्यों को दी जा सकती है, वह आम नागरिक को भी देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अभी तक इसके दायरे में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री के कार्यालय, संसद और विधानमंडल, चुनाव आयोग, तमाम सरकारी कार्यालय, सरकारी बैंक, सरकारी अस्पताल, पुलिस, सेना, पीएसयू, सरकारी बीमा कंपनियां, सरकारी फोन कंपनियां, सरकार से मदद पाने वाले एनजीओ और सर्वोच्च न्यायालय को छोड़कर सभी अदालतें भी आती थीं। अब सर्वोच्च न्यायालय ने खुद को इस सूची में शामिल कर लिया है।

इस कानून के दायरे में सुप्रीम कोर्ट को भी लाने की कोशिश उस समय हुई जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने यह जानने का प्रयास किया कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी सम्पत्ति की घोषणा की है अथवा नहीं। जानकारी नहीं मिलने पर वह सूचना आयोग गए। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को ऐसा कार्यालय माना, जो सूचना देने के लिए बाध्य है। इस पर भी बात नहीं बनी तो अग्रवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की। कोर्ट ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय (सुप्रीम कोर्ट) को इस कानून के दायरे में बताया। रोचक यह है कि अब सुप्रीम कोर्ट के महासचिव जनवरी 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे। हाईकोर्ट फिर अपने फैसले पर अटल रहा तो सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपने यहां अपील की। इतनी कवायद के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय पीठ ने 3/2 के बहुमत से यह फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि वह 'ट्रांसपेरेंसी ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंसी' को कमतर नहीं आंकती है। एक समय मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा था कि पारदर्शिता के नाम पर एक संस्था को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। पूरे फैसले अथवा अब सूचना के अधिकार से यह जानना भी रोचक होगा कि जस्टिस गोगोई फैसले के किस कोण पर थे। बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट भी इस दायरे में आ गया है। ऐसे में फिर से कानून का वह पक्ष जानना ठीक होगा कि कौन-सी सूचनाएं हासिल नहीं की जा सकतीं अथवा कौन-से संगठन इसके दायरे में नहीं आते। कानून में कुछ अपवादों को छोड़कर इसे सभी पर लागू होने की बात कही गयी है। अपवाद के तौर पर किसी भी खुफिया एजेंसी की वैसी जानकारियां, जिनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा हो, इसमें नहीं आतीं। इसी तरह दूसरे देशों के साथ भारत से जुड़े मामले और थर्ड पार्टी यानी निजी संस्थानों संबंधी जानकारी इस कानून से अलग हैं। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि थर्ड पार्टी की भी ऐसी जानकारी ली जा सकती है, जो सरकारी विभाग के पास मौजूद है। परन्तु ऐसी जानकारी भी हासिल नहीं की जा सकती, जिससे कोई जांच प्रभावित हो।

सही मायनों में यह अधिकार नागरिक को बहुत ताकतवर बनाता है। लोकतंत्र में नागरिक ही तो सर्वोच्च है। फिर भी यह देखना होगा कि इस कानून का मतलब यह न हो जाए कि इसकी सीमा विस्तार के नाम पर अराजकता फैले। अभी तो सूचना देने के लिए हर कार्यालय में एक अधिकारी मौजूद है। तय समय के अंदर जानकारी नहीं मिलने पर अपील और राज्य तथा केंद्रीय सूचना आयोग जाने का प्रावधान है।

इस तरह का कानून सबसे पहले स्वीडन में 1766 में लागू किया गया था। फ्रांस में यह 1978 और कनाडा में 1982 में आया था। स्वीडन में तत्काल सूचना पाने का अधिकार है, जबकि भारत में इसके लिए एक महीने का समय तय है। वैसे स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार के तहत यह सूचना पाने का समय भी 48 घंटे का है। सुप्रीम कोर्ट से सूचना मांगते समय स्वभाविक है कि लोग जजों की नियुक्ति, उनको नियुक्त करने के लिए गठित कॉलेजियम, कॉलेजियम की सिफारिश और उस पर सरकार के फैसले आदि के बारे में जानना चाहेंगे। खुद किसी जज की सम्पत्ति तो जानने के अधिकार में होगी ही। कुल मिलाकर अब सर्वोच्च न्यायालय भी आरटीआई कानून की धारा-2 (एच) के तहत आ गया है। देखना है कि अपने इस अधिकार की लड़ाई में लोग कहां तक जाते हैं।


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