बंगाल को लहूलुहान होने से कोई तो रोके

बंगाल को लहूलुहान होने से कोई तो रोके

आर.के. सिन्हा

प्रख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर धर को एक बार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मिल गई थीं। कहने लगीं कि आजकल आप हमें अपनी कार्टूनों में जगह नहीं दे रहे। इसके विपरीत पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मॉर्फ्ड फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाली भाजपा यूथ विंग की कार्यकर्ता प्रियंका शर्मा से तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) की नेता इतनी खफा हो गईं कि उन्होंने पुलिस में प्रियंका शर्मा के खिलाफ रिपोर्ट तक दर्ज करा दी। प्राथमिक जांच के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने प्रियंका को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भी भिजवा दिया था। बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिल गई। जाहिर है कि टीएमसी के नेताओं ने प्रियंका के खिलाफ ममता बनर्जी से बिना पूछे पुलिस में केस तो दर्ज नहीं ही करवाई होगी? क्या ममता बनर्जी जैसी वरिष्ठ नेता को शोभा देता है कि वह भाजपा की एक मामूली-सी कार्यकर्ता के खिलाफ पुलिस में शिकायत करें? और, ऊपर से उसे प्रताड़ित करने के लिए पुलिस को आदेश दें। आखिर प्रियंका ने किया ही क्या था? यह वास्तव में अत्यंत ही गंभीर मसला है। इसने साफ संकेत दे दिए हैं कि अब राजनीति में वैचारिक मतभेदों को निजी खुंदक के रूप में लिया जाएगा। इस बीच, पश्चिम बंगाल में इस लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह की भयंकर हिंसा देखी गई है, उससे देश दहल गया है। देशभर के शांतिप्रिय नागरिक हतप्रभ हैं। जहां सारे देश में चुनाव की प्रक्रिया कमोबेश शांति से संपन्न होती रही, वहीं महर्षि अरविन्दो, स्वामी विवेकानंद, अनुकूल चन्द्र ठाकुर, गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सत्यजीत राय का पश्चिम बंगाल ही जलता रहा। इस बार की चुनावी हिंसा ने पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। बंगाल की सियासत में इतनी हिंसा कैसे प्रवेश कर गई, इस पर गहन विचार करने की आवश्यकता है। वहां की हिंसा देश के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। वहां पर हो रही हिंसा किसी से छिपी भी नहीं है। बेशक हिंसा का शिकार तो गरीब ही हो रहा है। आप कह सकते हैं कि वहां की एक बड़ी आबादी के पास करने को कुछ नहीं है तो वो चंद पैसे के लालच में हिंसा पर उतारू हो जाती है। जिन बांग्लादेशी घुसपैठियों को ममता दीदी ने पद का दुरुपयोग करके भारत का वोटर बनवा दिया है वे ममता के इशारे पर कुछ भी करने को बेताब हैं।

दरअसल राज्य में भाजपा के बढ़ते असर के कारण ममता बनर्जी की नींद हराम हो गई है। उनके हाथ-पैर फूल चुके हैं। उन्हें अब समझ आ गया है कि 2019 लोकसभा चुनाव तृणमूल कांग्रेस के कफन में आखिरी कील साबित होंगे। जो ममता बनर्जी कुछ समय पहले तक देश की प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रही थीं वो आज अपने ही घर में घिर गई लगती हैं। वहां भाजपा के पक्ष में एक जबरदस्त जन जागृति का माहौल बन चुका है। सभी शांति-व्यवस्था चाहने वाले भाजपा के पक्षधर हो चुके हैं। भाजपा मजबूत होती जा रही है और ममता की पार्टी का ग्राफ रसातल में चला जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी की चाहत है कि वो पश्चिम बंगाल में इस बार 20-25 सीटें जीत ले। उसके नेताओं की सभाओं को वहां पर भारी जनसमर्थन मिल रहा है। वहां का आम अवाम अब ममता बनर्जी की तानाशाही से आजिज आ चुका है।

हैरानी तो यह हो रही है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर निर्वाचन आयोग का रवैया सही नहीं रहा। वहां पर भाजपा के पोस्टर टीएमसी के कैडर फाड़ते रहे, पर निर्वाचन आयोग देखता रहा। उन पोस्टरों को फाड़ने के तमाम सुबूत सारे देश ने सोशल मीडिया पर देखे। फिर भी निर्वाचन आयोग मूक दर्शक बना रहा। निर्वाचन आयोग की अकर्मण्यता देखकर जनता कहने लगी है कि काश, आज टी. एन. शेषन जैसा कोई मुख्य चुनाव आयुक्त होता। कहने की जरूरत नहीं है कि ममता बनर्जी ने देश की राजनीति में एक भयंकर नजीर रख दी है। वे अपने राजनीतिक विरोधियों को खुलेआम अपशब्द कह रही हैं। बदला लेने की धमकी दे रही हैं। दरअसल, ममता बनर्जी को भाजपा की बंगाल में बढ़ती ताकत डराने लगी है। वहां पर तृणमूल सरकार की नीतियां और कार्यक्रमों से जनता त्रस्त है। इन हालातों में प्रदेश की जनता को भाजपा में ही उम्मीद दिखाई देती है। उस जनता को पहले कांग्रेस और उसके बाद लेफ्ट दलों ने जमकर निचोड़ा है। उनका शोषण किया है। उस बंगाल की भोली-भाली जनता के सामने अब भाजपा ही विकल्प के रूप में बची है।

इसके साथ ही सवाल यह भी है कि पश्चिम बंगाल बार-बार क्यों जलने लगता है? वहां की कानून-व्यवस्था कहां है? लोकतंत्र कहां है? ममता बनर्जी इस हिंसा की आंच पर सियासत की रोटी क्यों सेंक रही हैं? वह तो कभी मां, माटी, मानुष का नारा बुलंद करती थीं। आज मां की ममता भूल गईं। माटी को खून से लाल कर रही हैं और जो मानुष उनसे प्रसन्न नहीं हैं उन्हें कटवाने का काम कर रही हैं। क्या हो गया है ममता दीदी को?

जरा गौर कीजिए कि ममता बनर्जी के इशारों पर देश का लोकतंत्र लहूलुहान हो रहा है। पर मजाल है कि सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल, चंद्रबाबू नायडू, अखिलेश, मायावती, राहुल गांधी और सीताराम येचुरी जैसे विपक्ष के नेता उनसे सवाल करें कि ये हिंसा बंद क्यों नहीं होती। कहा जा सकता है कि इन सबकी जुबानें सिल गई हैं।

अगर बात इस लोकसभा चुनाव से हटकर करें तो भी हम देखते हैं कि विगत कुछ समय से पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग से लेकर 24 परगना जिला तक अशांत रहे। लेकिन ममता बनर्जी इससे बिलकुल बेपरवाह हैं। ममता बनर्जी ने दार्जिलिंग के सीधे-सरल लोगों की एक नहीं सुनी। दार्जिलिंग के लोग अपने हकों के लिए सड़कों पर उतरे थे, पर उन्हें दीदी ने तुरंत कह दिया कि दार्जिलिंग में हिंसक प्रदर्शन बर्दाशत नहीं किए जाएंगे। लेकिन, उन्होंने यह चेतावनी 24 परगना में हंगामा करने वालों को नहीं दी। आपको याद होगा कि दो साल पहले 24 परगना में एक आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट से नाराज होकर एक खास समुदाय के लोगों ने जमकर बवाल काटा था। वहां पर जमकर दंगे हुए। लेकिन ममता बनर्जी सरकार की पुलिस दंगाइयों पर नरम रवैया अपनाती रही। ममता बनर्जी के नरम रवैये के कारण उनका राज्य कठमुल्ला मुसलमानों का गढ़ बन गया है। वह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर खुलकर चल रही हैं। कोलकाता की एक मस्जिद के इमाम, जो ममता बनर्जी के करीबी हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। क्या यह वे बिना ममता दीदी से पूछे कर रहे हैं?

सच पूछा जाए तो ममता बनर्जी चिर असंतुष्ट प्राणी हैं। वो नोटबंदी से लेकर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर केन्द्र सरकार पर हल्ला बोलती रही हैं। वो देश के संघीय ढांचे के चरित्र को समझ ही नहीं रही हैं। वो लगातार केन्द्र के खिलाफ मोर्चा खोले रखती हैं। यह आज से नहीं है। मुझे वह दिन भी याद है जब वे युवा कांग्रेस की अध्यक्ष होकर भी कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ बोलती रहती थीं। अब देश को ममता बनर्जी के आचरण को गंभीरता से लेना होगा। फिलहाल पश्चिम बंगाल में जिस तरह की हिंसा टीएमसी के लोग कर रहे हैं, उससे उनकी झुंझलाहट को समझा जा सकता है। उन्हें समझ आ रहा है कि आगामी 23 मई से टीएमसी का पतन शुरू हो जाएगा।

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