पित्रोदा ने कांग्रेस को मुश्किल में डाला

पित्रोदा ने कांग्रेस को मुश्किल में डाला

सुरेश हिन्दुस्थानी

भारत में सूचना क्रांति के अग्रदूत माने जाते रहे सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा उर्फ सैम पित्रोदा ने अपने बड़बोलेपन के कारण कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया है। राजीव गांधी के करीबी रहे पित्रोदा आजकल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सलाहकार बने हुए हैं। पित्रोदा के बयान से कांग्रेस बैकफुट पर आती दिखाई दे रही है। इसलिए राहुल गांधी ने पंजाब में चुनाव प्रचार के दौरान सैम पित्रोदा के बयान को शर्मनाक बताते हुए उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा है। पित्रोदा के बयान से कांग्रेस एक बार फिर कठघरे में खड़ी हो गई है। सिखों के पुराने जख्म हरे हो गए हैं। इसी बीच 19 मई को पंजाब में सभी 13 सीटों पर लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। सियासी लाभ के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे चुनावी हथियार बना लिया है और वे तलवार भांज रहे हैं।

कांग्रेस जानती थी कि पित्रोदा का बयान पार्टी की सेहत के लिए घातक है। इसलिए बिना समय गंवाये उसने पित्रोदा के बयान से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि यह पार्टी का मत नहीं है। कांग्रेस पहले से ऐसा करती रही है। उधर, पित्रोदा ने भी सफाई दी कि हिन्दी नहीं आने के कारण उनके मुंह से यह बात निकल गई। उनके कहने का यह आशय नहीं था ...। पित्रोदा इंग्लैंड या अमेरिका में नहीं जन्में हैं। उनका जन्म ओडिशा में एक गुजराती परिवार में हुआ था। भले ही वह पढ़ाई के लिए अमेरिका गए थे। इसलिए पित्रोदा की सफाई पर भला कौन यकीन करेगा कि ओडिशा में जन्में और गुजराती मूल के व्यक्ति को हिन्दी बिल्कुल ही नहीं आती? सवाल यह कि पित्रोदा ने तो केवल बयान ही दिया है, दोषी तो पूरी कांग्रेस रही है। पहली बात तो यह है कि सिखों को जिन्दा जला देने वाला वीभत्स हत्याकांड कांग्रेस के शासनकाल में हुआ और इसमें कांग्रेस के बड़े नेताओं के हाथ खून से सने रहे हैं। लगभग छह महीने पहले कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को इस मामले में सजा भी मिल चुकी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी सिख दंगों में आरोपित हैं। जगदीश टाइटलर 35 वर्षों से मुकदमा झेल रहे हैं।

ओवरसीज कांग्रेस प्रमुख सैम पित्रोदा के 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर बयान 'हुआ तो हुआ' बहुत ही शर्मनाक है। राहुल गांधी ने पित्रोदा के बयान को शर्मनाक बताकर उनसे सार्वजनिक रुप से माफी मांगने के लिए कहा है, लेकिन सवाल यह भी है कि जब सिखों को जलाया जा रहा था, तो उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कुछ इसी प्रकार की बात कही थी। राजीव गांधी ने कहा था कि 'जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।' राजीव गांधी का यह बयान भी 'हुआ तो हुआ' जैसा ही कहा जा सकता है, जिसमें न तो पीड़ितों के प्रति कोई सहानुभूति थी और न ही उन्हें रोकने जैसी कोई भाषा ही थी। प्रश्न इस बात है कि राजीव गांधी उस समय कांग्रेस के मुखिया भी थे तो कांग्रेस की ओर से आज माफी कौन मांगेगा?

पित्रोदा ने 'हुआ तो हुआ' कहकर एक बार फिर पीड़ितों के घाव पर नमक ही छिड़का है। दिल्ली, पंजाब सहित पूरे देश में हुए सिख विरोधी दंगों में जिस प्रकार से नरसंहार किया गया, वह हृदय दहलाने वाला था। कांग्रेस नेता ने उन घावों को फिर से कुरेदने का कृत्य किया है। कांग्रेस आज कितनी भी सफाई दे, परंतु दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद इस बात की गुंजाइश बिलकुल भी नहीं बची है कि कांग्रेस के नेता इस मामले में निर्दोष हैं। एक समय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच से यह घोषणा की थी कि सिख नरसंहार में कांग्रेस का किसी भी प्रकार का हाथ नहीं है। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि किसी के कहने भर मात्र से कांग्रेस के नेता दोषी हो जाएं, यह संभव नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत का निर्णय बदलते हुए कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुनाई है। इससे पूर्व केन्द्र में संप्रग की सरकार के समय निचली अदालत ने सज्जन कुमार को 2013 में बरी कर दिया था। सीबीआई ने इस मामले में कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को बरी किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय के निर्णय में सज्जन कुमार को आपराधिक षडयंत्र रचने, हिंसा कराने और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया। इसमें पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर, कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और दो अन्य लोग शामिल थे।

यह सही है कि सिखों का नरसंहार केवल इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्पन्न हालातों का परिणाम था। यह प्रतिक्रिया किसने की, यह एक अलग सवाल है, लेकिन बिना किसी की संलिप्तता के इतना बड़ा हादसा हो ही नहीं सकता। इसलिए भारतीय जनता इस मामले में कांग्रेस को सदैव कठघरे में खड़ा करती रही है। हत्याकांड के बाद कांग्रेस के नामचीन नेताओं के नाम भी सामने आए थे। उन नेताओं को कांग्रेस ने बचाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि वे हमेशा पार्टी और सत्ता के उच्च पदों पर भी विराजमान रहे। इसे क्या कहा जाएगा?

देशभर में सिखों के घरों और उनकी दुकानों को लगातार हिंसा का निशाना बनाया गया। तीन दिन तक सिखों का नरसंहार चलता रहा। नरसंहार करने वालों को कौन हवा दे रहा था, यह 34 साल बाद भी साफ नहीं हो पाया है, लेकिन जिन कांग्रेस नेताओं पर इन दंगों में शामिल होने के आरोप लगे थे, कांग्रेस ने उनके विरोध में किसी भी प्रकार की कार्रवाई भी नहीं की। सबसे विचारणीय बात तो यह है कि सिखों को जिन्दा जलाने वाले लोगों को ऐसा करने के लिए संकेत कौन दे रहा था। इसमें परदे के पीछे किसकी भूमिका थी। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि सिखों के नरसंहार मामले में कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार रही है?

हम जानते हैं कि सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सरेआम सिख दंगों के लिए कांग्रेस की ओर से आम जनता से माफी मांगी थी। क्या कांग्रेस के प्रमुख नेताओं द्वारा माफी मांगने का कृत्य यह संकेत नहीं करता कि सिख दंगों में कांग्रेस का ही हाथ था। वास्तव में माफी वही मांगता है, जिसने गलती की हो। तो क्या सिख दंगा कांग्रेस द्वारा की गई गलती थी। सिख दंगा हृदय विदारक था। उसमें माफी नहीं दी जा सकती। आज भी उस दृश्य को याद करके हृदय छलनी हो जाता है। रेलवे स्टेशनों के दृश्य याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सिख समुदाय के लोग भी कांग्रेस के नेताओं को दोषी मानते रहे हैं।


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