उमंग का महोत्सव है होली

उमंग का महोत्सव है होली


-हृदयनारायण दीक्षित

उमंग और संयम साथ-साथ नहीं चलते। होली भारत में उमंग और रंग तरंग का महोत्सव है। इसकी उमंग का केन्द्र प्रकृति की नवयौवनता ऋतु है। इस उमंग में मस्ती है। बसंत पहले से ही मदनगंध उड़ेल रहे हैं। आम बौरा गए हैं। तुलसीदास के बंसत वर्णन की याद आ रही है। वे लिख गए हैं - 'जागे मनोभव मुए हुमन वन सुमगता न परे कही।' मुर्दे भी मस्ती में हैं। इसी मस्ती और उल्लास में लोकतंत्र का उत्सव चुनाव भी आ गया है। 'चुनाव आचार संहिता' नायिका की तरह बीच में फंस गई है। वाक् संयम टूट रहे हैं। आचार संहिता का चीरहरण कोई कृष्ण ही बचा सकता है। महाभारत की द्रौपदी का चीरहरण सभा में ही हुआ था। लेकिन तब होली नहीं थी। होली होती तो कृष्ण गोपियों पर पिचकारी चला रहे होते। वे रस, रंग, गीत, नृत्य में व्यस्त होते। द्रौपदी की पुकार उन तक कैसे पहुंचती। होली और चुनाव चीरहरण की ऋतु हैं। भारत की मन तंरग अभिव्यक्ति का उल्लास पर्व। होली में भक्ति और प्रेम की गल मिलौवल। प्रकाश के सप्तरंग, ध्वनि के सप्त सुर साथ-साथ।

होली के उत्सव बंसत पंचमी से ही आ चुके हैं। कलियां मुस्कराईं। फूल खिले, आम बौरा गये। केवल आम ही नहीं, खास भी बौरा गये। लोकसभा में एक खास नेता सांसद ने आंख मारी। बसंत और आंख मारू घटना आगे-पीछे। इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यमों ने आंख मारने की व्याख्या में ही सारी बुद्धि लगा दी। नेता सांसद ने लोकसभा की आचार संहिता भंग की। वे प्रधानमंत्री के गले पड़ गए।

आचार संहिता सुंदर नायिका है। उदात्त है। मृदु भाषिणी है। सबके प्रति प्रेम पगी है। चाहती है कि सब उसे प्यार दें। अखबार प्यार करें। इलेक्ट्रॉनिक चैनल उसे दिल दें। सरकार उसकी बात माने, विपक्ष उसके अनुसार चले। उसकी मांगे बुरी नहीं। समाज और राष्ट्र मर्यादा-संहिता में ही चले हैं। लेकिन इस दफा बसंत, होली और चुनाव की त्रिमूर्ति में फंसी इस नायिका की सुरक्षा खतरे में है। दल उसके साथ थोड़े समय के लिए 'लिव इन' हो सकते हैं। लेकिन होली में मस्त लोग कोई आचार नहीं मानते। समस्या बड़ी है। आप लाल रंग डालो तो आरोप लगेगा कि यह कृत्य वामपंथी है। नीले रंग का उपयोग वर्जित है। अगला कहेगा कि इस रंग पर एक दल का अधिकार है। उनकी नजर में भगवा रंग साम्प्रदायिक है। आचार संहिता ने साम्प्रदायिक प्रतीकों को गैरकानूनी माना है।

वात्स्यायन ने अपने ग्रंथ कामसूत्र में मदनोत्सव का उल्लेख किया है। होली, होली है। अब 'अंग से अंग लगा ले सजन' के साथ 'बलम तरसे रंग बरसे' के अलावा कोई आचार संहिता नहीं चलती। बसंत की मदन अभिलाषा और चुनाव की सत्ता अभिलाषा के बीच 'आचार संहिता' का आ जाना दिलचस्प है।

होली आई भी नहीं कि आंख मारू लोग चौकीदार को चोर बताने लगे। आचार संहिता का सरगम तार-तार हो गया। मैं उम्र से वरिष्ठ नागरिक हूं। पद से विधानसभा का अध्यक्ष हूं। लेकिन मन से बसंत, होली और चुनाव वाला हूं। संशय में हूं। क्या बसंत की मस्ती में रंगूं? 'रमैय्या वस्ता वइया, मैने दिल तुमको दिया' गाऊं? या होली की रंग तरंग और उमंग में दिल घोलकर गीत फाग गाऊं? क्या चुनाव में प्रतिपक्षी को चोर कहूं? मैं आचार संहिता के प्रति निष्ठावान हूं लेकिन करूं तो क्या करूं? अगला मुझ पर कीचड़ डाले तब मैं कौन-सा रंग डालूं? अब बाजार ही ब्रह्म है। वही कर्ता, धर्ता, विधाता है। हरेक सामान 'ऑनलाइन' उपलब्ध है। मैं मोबाइल पर बाजार देखता हूं। कोई रंग निरपेक्ष नहीं दिखाई पड़ता। साम्प्रदायिकता के आरोप से बचना चाहता हूं। अफसर भी आचार संहिता का दुपट्टा ओढ़कर कुछ भी करने को तैयार हैं। इधर होली। उधर आचार संहिता नायिका। इधर चुनाव, उधर नायिका के तेवर। छाप तिलक सब छीनी रे, मो से नैना लड़ाइके। पोस्टर, बैनर उखड़ गए। कैसी बेरूखी? ऐसी बेरूखी से खुदा जान बख्शे।

उत्सव मनुष्य जीवन के सामूहिक उल्लास हैं। सामूहिकता का विकास मन मिलौवल से होता है। वास्तविक सामूहिकता अपनी इकाइयों का जोड़ मात्र नहीं होती। तमाम इकाइयों की साझा प्रीति से सामूहिकता का विकास होता है। इकाइयां तो भी अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं। लेकिन होली में इकाइयां घुल जाती हैं। होली का रस रंग सबको घोल देता है। सब एक रस। एक राग। एक सुर। एक गीत। सारी गंध, पृथ्वी गंध। फूल अनेक, सौन्दर्य एक। न कोई अगड़ा न कोई पिछड़ा। न ब्राह्मण, न शूद्र और न ही कोई क्षत्रिय या वैश्य। न गोरा, न काला। अम्मा, मम्मी होती हैं तब आन्टी, चाची में फर्क नहीं रह जाते। जन गण मन की शीर्ष निष्ठा भारत ही है। भारत विश्व को परिवार जानने वाली राष्ट्रीयता है। होली भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की सरस अभिव्यक्ति है। बसंत इसके आगमन की सूचना लेकर आता है। प्रकृति नवयौवन में विस्तृत होती है। मरूद्गण फूलों की गंध ले उड़ते हैं। वायु गंध आपूरित होती है। गंध आपूरण का यह कर्तव्य वायु देवता न जाने कब से निभा रहे हैं। लाखों बरस से संभवतः। सदा से कहना ज्यादा अच्छा लगता है।

लेकिन ऐसा कहने में ढिठाई होगी। ऋग्वेद के ऋषि बता गए हैं कि सृष्टि सृजन के पूर्व वायु भी नहीं थी। प्रकृति रसपूर्ण है। यहां गंध आपूरण है ही। रस गंध आपूरण से घिरा कोई भी जीव गीत नृत्य को विवश होगा। तब परिपूर्ण रसवन्ता नियमों का अतिक्रमण करती है। व्रत, जप, यम, नियम, आसन, प्राणायाम धरे रह जाते हैं। बसंत पंचमी में मैं महाप्राण निराला के गांव गढ़ाकोला उन्नाव में था। निराला जी पर एक समारोह था। मैं उसी क्षेत्र से विधायक हूं। रूप, रस, गंध की अनुभूति से भरे-पूरे निराला ने प्रकृति की तरूणाई का शब्द चित्र बनाया था- 'वर्ण गंध भर/मन मरंद भर। तरू उर की अरूणिमा तरूणतर/खुली रूप कलिया पर भर/स्तर स्तर सुपरिसरा/रंग गई पग पग धन्य धरा।' मुझे निराला का बसंत स्मरण आ रहा था। हम लोग बसंत पंचमी को ही उनका जन्म दिवस मनाते हैं। मैंने लक्ष्य किया कि बसंत अब पहले की तरह नहीं आता। बसंत प्रकृति की तरूण अभिव्यक्ति है। मेरा मन कहता है कि प्रकृति की तरह बसंत को भी सदा तरूण होना चाहिए। लेकिन मेरे लेखे, मेरे देखे, बसंत भी बूढ़ा हो गया है। हमारे साथ-साथ संभवतः।

अब बसंत के आगमन की सूचना गंध आपूरित वायु नहीं देती। औद्योगिक सभ्यता ने वायु में तमाम विष घोल दिया है। आम्रवन कट गए हैं। होली आ गई, लेकिन 'महुआ मदन रस' नहीं टपका। गांव-गांव ढोलक नहीं बजती। मुझे बसंत की सूचना मोबाइल पर एसएमएस से मिली। होली की सूचना टीवी से मिली। चुनाव की सूचना पहले से थी। चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता लागू होने की सूचना आयोग की औपचारिक गतिविधि है। आचार संहिता का प्रभाव सरकारी कर्मचारियों पर दिखाई पड़ा है। उन्होंने अति उत्साह दिखाया। तमाम दलों के पदाधिकारियों के घरों पर पहले से लगे झंडे भी उतरवाए गए। लेकिन दलतंत्र में शब्द- अपशब्द की पहचान मुश्किल है।


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