अखिलेश पर भारी पड़ रही शिवपाल की नाराजगी

अखिलेश पर भारी पड़ रही शिवपाल की नाराजगी

- सियाराम पांडेय 'शांत'


समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष व संरक्षक मुलायम सिंह यादव के अनुज शिवपाल यादव ने समाजवादी सेकुलर मोर्चा का गठन कर लिया। इससे बीएसपी से तालमेल कर सियासी लाभ उठाने में जुटी समाजवादी पार्टी का जोर का झटका लगा है। अगर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने समय रहते यादव की नाराजगी दूर कर ली होती तो आज यह नौबत न आती। 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के हार की सबसे बड़ी वजह मुलायम कुनबे की कलह ही रही है। शिवपाल यादव भाई से नहीं, भतीजे से नाराज हैं। भतीजा भी चाचा से नाराज है। मतलब दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई।

राजनीति संतों का खेल नहीं है। यहां सत्ता के संघर्ष होते ही रहते हैं। शिवपाल यादव की मानें तो वे सबसे मिलकर रहना चाहते थे। इसीलिये दो साल इंतजार करते रहे लेकिन इंतजार की भी इंतहा होती है। अब वे गांव-गांव, जिले-जिले जाने वाले हैं। मोर्चे को मजबूत करने के लिए काम करने वाले हैं। समाजवादी पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव को उचित सम्मान खुद तो देंगे ही, दूसरों से भी ऐसा करने के लिए कहेंगे। शिवपाल यादव ने समाजवादी सेकुलर मोर्चा बना लिया है। यह भी कहा है कि दो साल से पार्टी में पूछ नहीं थी। घुटन हो रही थी, नाराज था, इसलिए मोर्चा बना लिया। समाजवादी पार्टी में बहुतेरे नाराज हैं। उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।

शिवपाल यादव ने कहा है कि वे पार्टी में उपेक्षित लोगों को अपने मोर्चे से जोड़ेंगे। छोटे दलों को भी अपने साथ लाएंगे। शिवपाल के नया मोर्चा बनाने पर अखिलेश यादव ने कहा कि 'नाराज तो मैं भी हूं, कहां चला जाऊं। इसके पीछे बीजेपी की साजिश है, यह तो नहीं कहता, पर आज और कल की बात शक तो पैदा करती ही है।' लीडर का धर्म है आगे बढ़ना। अखिलेश ने भी कुछ ऐसी ही बात कही है कि उनके दल का उत्साह बना रहे। उन्होंने कहा है कि समाजवादी पार्टी आगे बढ़ेगी, चाहे जो भी हो। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे लोकसभा चुनाव की तैयारी करें। बीजेपी की साजिशों से होशियार रहें। यह भी बताना नहीं भूले कि असल मुद्दों से ध्यान भटकाना बीजेपी की ताकत है। वे जब भी चाहते हैं कोई फिजूल का मुद्दा उठाकर लोगों का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटा देते हैं। आने वाले समय में राजनीतिक स्थितियां और मुद्दे बदलने जा रहे हैं। इसलिए सभी को किसी भी तरह के झूठे प्रचार के मुकाबले को तैयार रहना चाहिए। जहां तक भागने का सवाल है तो जिसके सिर पर जिम्मेदारियों का सेहरा बांध दिया जाता है, वह भागता नहीं है। अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाता है। दूसरी ओर शिवपाल यादव ने समाजवादी सेकुलर मोर्चा तो गठित कर लिया लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव मैदान में उतरने की सम्भावना पर चुप्पी साध ली। लेकिन, इतना तो तय है कि शिवपाल यादव सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं।

अखिलेश अपने पिता से चरखा दांव भले न सीख पाए हों लेकिन शिवपाल यह हुनर जानते हैं। वे कह रहे हैं कि दो साल तक इंतजार किया। मुझे न तो पार्टी के कार्यक्रमों की कोई सूचना दी जाती है और न ही कोई जिम्मेदारी मिलती है। हालांकि कुछ दिनों पहले ही उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर पार्टी में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी न मिली तो वे बड़ा निर्णय ले सकते हैं। वैसे यह निर्णय भी उन्होंने मुलायम सिंह यादव को विश्वास में लेकर किया है जैसा कि वे पहले करते रहे हैं। उन्होंने अब तक का कोई निर्णय मुलायम सिंह यादव को विश्वास में लिए बगैर नहीं किया है। इस निर्णय से पहले भी वे अपने अग्रज मुलायम सिंह यादव से मिलने गए थे। खुद मुलायम सिंह यादव भी इस बात की अभिव्यक्ति कर चुके हैं कि अब उनकी कद्र नहीं है। उन्हें कोई सम्मान नहीं देता। उनकी यह पीड़ा अखिलेश यादव पर भारी पड़ सकती है। मुलायम को कभी भी यह बात पसंद नहीं है कि जिस मायावती से उनके छत्तीस के आंकड़े हैं, उनकी गोद में उनका ही बेटा खेले। उनके बीच बुआ और बबुआ का रिश्ता कायम हो।

बीजेपी के साथ अपने सम्बन्धों के बारे में शिवपाल ने कहा कि उनके बीजेपी या किसी अन्य दल में शामिल होने की अटकलें निराधार हैं। शिवपाल बीजेपी में जाएंगे या नहीं, यह तो वक्त तय करेगा लेकिन अमर सिंह से उनकी नजदीकी किसी से छिपी नहीं है और यह नजदीकी कुछ नया गुल जरूर खिलाएगी। अमर सिंह भी इस बात का दावा कर चुके हैं कि वे समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता के साथ मिलकर एक नया दल बनाएंगे और यादवों और राजपूतों को एकजुटता प्रदान करेंगे। अगर ऐसा होता है तो इसका सीधा लाभ बीजेपी को होगा। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन कर बीजेपी ने पहले ही दलितों के बीच पैठ जमाने की कोशिश की है। अति दलितों और अति पिछड़ों को प्रोन्नति में आरक्षण देने का उसका निर्णय भी समाजवादी पार्टी और बीएसपी के लिए परेशानी उत्पन्न करने वाला है और जब चुनाव से कुछ माह पहले इन दलों को कमजोर करने वाली ताकतें सक्रिय हो जाएं तो यह बीजेपी के लिए सोने पर सुहागा वाली ही स्थिति है। बीच में खबर आ रही है कि उत्तर से ज्यादा दक्षिण के राज्यों पर बीजेपी का ध्यान है लेकिन वह उत्तर के मैदान में विपक्ष को खुला खेलने नहीं देना चाहती। शिवपाल भले ही बीजेपी में जाने से इनकार करें लेकिन अखिलेश इसे बीजेपी की साजिश के तौर पर ही देख रहे हैं। कुछ हद तक यह सही भी हो सकता है क्योंकि राजनीति, युद्ध और प्रेम में सब जायज होता है।


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