सिद्धू ने वही किया जो कांग्रेस की फितरत है

सिद्धू ने वही किया जो कांग्रेस की फितरत है

- दिव्य उत्कर्ष


इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में नवजोत सिंह सिद्धू के शामिल होने को लेकर राजनीतिक विवाद की स्थिति बनी हुई है। सिद्धू का कहना है कि उनकी रात्रा राजनीतिक नहीं थी और उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जिसके लिए उनकी आलोचना की जाये। सिद्धू यह भी कह रहे हैं कि उन्होंने वहीै, जो पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी भी कर चुके हैं। सिद्धू की इस यात्रा को लेकर विवाद इसलिए भी हुआ है, क्योंकि वहां जाकर उन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के साथ गलबहियां की।

पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली के चुनाव परिणाम आने के बाद से सिद्धू वहां जाने को लेकर काफी उत्सुक थे। इमरान ने अपने शपथ ग्रहण के लिए भारत से सिद्धू के अलावा कपिल देव और सुनील गावस्कर को भी बुलाया था, लेकिन इन दोनों ने विभिन्न वजहों से वहां जाने से इनकार कर दिया। परंतु सिद्धू ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि यदि उन्हें औपचारिक निमंत्रण मिला तो वे जरूर जायेंगे। शपथ ग्रहण समारोह में उनके जनरल बाजवा के साथ गले मिलने को खुद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी सही नहीं माना। उन्होंने साफ कहा कि जनरल बाजवा की वर्दी पर नेम प्लेट भी लगा हुआ था, इसलिए अनजाने में गले मिलने की बात नहीं कही जा सकती।

पंजाब कांग्रेस की राजनीति में अमरिंदर सिंह और सिद्धू अलग-अलग खेमे के माने जाते हैं। सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होने का भी अमरिंदर सिंह ने विरोध किया था लेकिन राहुल गांधी के दबाव की वजह से वे कांग्रेस में सिद्धू की इंट्री को रोक नहीं सके, लेकिन अमरिंदर सिंह के विरोध की वजह से ही जो सिद्धू पंजाब सरकार में उप मुख्यमंत्री पद पाने का दावा कर रहे थे, वे एक कैबिनेट मंत्री बनकर ही रह गये। अपनी पाकिस्तान यात्रा और जनरल बाजवा के साथ गले मिलने को लेकर उठे विवाद के बाद सिद्धू ने जिस तरह की सफाई दी, वह भी दुर्भाग्यपूर्ण है। सिद्धू का कहना था कि 'वे इस बात को दोनों देशों का दुर्भाग्य मानते हैं कि वह विभाजन के बाद आपसी रिश्तो में सुधार नहीं हो सका है। ऐसी कटुता दोनों देश के लोगों के लिए अभिशाप है। ऐसे में दोनों देशों के बीच फिर से बातचीत की शुरुआत होनी चाहिए, ताकि समस्याओं का समाधान हो सके।' सिद्धू ने खुद को शांति का पक्षधर बताया है और उनका यह भी कहना रहा है कि दोनों देशों के बीच तनाव को खत्म करने के इरादे से ही वे अपने एक मित्र के स्नेह भरे निमंत्रण को स्वीकार कर पाकिस्तान गये थे।

सिद्धू के तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन ये भी याद रखना चाहिए भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी शांति वार्ता की पहल हुई है, तो हमेशा ही पाकिस्तान ने अपनी नापाक हरकतों से शांति वार्ता को बाधित करने का काम किया है। पाकिस्तान कि आतंकी हरकतों की वजह से ही भारत ने बातचीत बंद करने की बात तय की थी। उड़ी हमले के बाद भारत ने साफ-साफ कहा था कि बातचीत और आतंकी वारदातें एक साथ नहीं हो सकती। इसके बावजूद पाकिस्तान ने कभी भी अपनी ओर से आतंकी वारदातों पर लगाम लगाने की बात नहीं कही। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान दावा करता रहा है कि वह तो शांतिवार्ता का पक्षधर है, लेकिन भारत बात करने के लिए तैयार नहीं है। पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अपने ट्वीट में कहा है कि वह भारत और पाकिस्तान को कश्मीर सहित सभी विवादों को बातचीत के जरिए समझाना चाहते हैं। परंतु इमरान खान ने भी आतंकवाद पर लगाम लगाने का कोई भी संकेत नहीं किया है।

आज के समय में जबकि पाकिस्तान पूरी दुनिया में आतंकवाद की फैक्ट्री के रूप में पहचाना जाने लगा है और भारत में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की खबरें पूरी दुनिया के सामने साफ हो चुकी हैं, तब भी पाकिस्तानी हुक्मरानों द्वारा इस बाबत चुप्पी साधे रहना इस बात का संकेत है कि आतंकवाद पर लगाम लगाने का उनका कोई इरादा नहीं है। वह सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए बातचीत करते का दावा करते रहती है। ऐसे में नवजोत सिद्धू ने अपनी सफाई में जो कुछ भी कहा है उसने भारत को ही कठघरे में खड़ा करने का काम किया है। उनकी बातों से इसी बात का एहसास होता है कि पाकिस्तान तो भारत के साथ संबंध ठीक करने का इच्छुक है, लेकिन भारत ही ऐसा करना नहीं चाहता है। सिद्धू का यह कहना कि दो दिन में पाकिस्तान ने उन्हें इतना प्यार दिया है, उतना प्यार उन्हें पूरी उम्र में भी नहीं मिला था। ऐसे में उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या भारत में एक क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में या बाद के दिनों में एक राजनेता के रूप में उन्हें लोगों ने अपने सिर-आंखों पर बैठा कर नहीं रखा। अमृतसर में बाहरी होने के बावजूद वहां की जनता ने उन्हें लगातार सांसद बनाया, उन्हें और उनकी पत्नी को विधायक बनाया। ऐसे में क्या वे पाकिस्तान से मिले प्यार की तुलना भारत में जिंदगी भर मिले प्यार से कर भारत का अपमान नहीं कर रहे हैं।

सिद्धू दरअसल उसी कांग्रेसी सोच को आगे बढ़ा रहे हैं, जो पहले सैफुद्दीन सोज, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, सलमान खुर्शीद या गुलाम नबी आजाद जैसे लोग अपने बयानों में व्यक्त करते रहते हैं। इन सभी नेताओं ने अपने बयानों में बार-बार भारत-पाक संबंधों के बारे में भारत सरकार के पक्ष को ही गलत ठहराने और पाकिस्तान सरकार के पक्ष को सही ठहराने की का प्रयास किया है। इन नेताओं के पाकिस्तान के पक्ष में दिये गये बयान दरअसल कांग्रेस के पाकिस्तान-परस्त रुख का ही प्रदर्शन करते हैं। इसलिए सिद्धू के पाकिस्तान जाने और वहां के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा को गले लगाने की बात में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसको लेकर आश्चर्य किया जाये। यही कांग्रेस की सोच है और यही कांग्रेस की संस्कृति रही है। बीजेपी से अलग होकर कांग्रेस पहुंचे नवजोत सिंह सिद्धू भी अब उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।


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