गुलाम सोच से आजादी जरूरी

गुलाम सोच से आजादी जरूरी

- पूनम नेगी


देश के इतिहास में 15 अगस्त 1947 की तिथि अविस्मरणीय है। इस दिन ब्रिटिश राज की गुलामी से मुक्त होकर हमारे भारत में एक नये राष्ट्र जीवन की शुरुआत हुई थी। मगर इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हम गुलामी की बेड़ियों से मुक्त होकर राजनैतिक व भौगोलिक रूप से स्वतंत्र तो हुए किन्तु काले अंग्रेज बन कर। आजादी के सात दशक बाद भी हम पर गुलाम मानसिकता हावी है। हम अंग्रेजी बोलने में अपनी शान समझते हैं। मातृभाषा बोलने में हमें शर्म आती है। अंग्रेजी गाने सुनने और मोबाइल में इंग्लिश ट्यून लगाने में हमें गर्व होता है। हर देशवासी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना चाहता है। हमारे बच्चे अच्छी अंग्रेजी में बात करते हैं तो हम उन्हें स्मार्ट कहते हैं और अंग्रेजी न बोल पाने बच्चे गंवार कहलाते हैं। हमारे युवाओं में विदेशी वस्तुओं के प्रति कुछ अधिक ही आकर्षण दिखता है। देशी व्यंजनों के स्थान पर मैकडोनल्ड का पिज्जा-बर्गर-पास्ता व कोक-पेप्सी इन्हें लुभाता है। सांस्कृतिक आयोजनों के स्थान पर मॉल कल्चर, वसंत उत्सव व सरस्वती पूजा की जगह वैलेन्टाइन डे का जुनून। यह है आज के युवा भारत की गुलाम सोच की असलियत। जगद्गुरु की उपाधि से सुशोभित हमारा भारत, जो कभी दुनिया का सिरमौर हुआ करता था; आज अंग्रेजियत का पिट्ठू बन कर इतरा रहा है। हमारे बच्चे शक्ल से 'भारतीय' पर अकल से 'अंग्रेज' बनते जा रहे हैं।

इसकी मूल वजह है 200 सालों की अंग्रेजों की गुलामी के दौरान 1834 में गवर्नर-जनरल की एक्जीक्यूटिव कौंसिल के पहले कानून सदस्य नियुक्त होकर भारत आये पाश्चात्य शिक्षाशास्त्री लॉर्ड मैकाले का सुनियोजित षड्यंत्र। मैकाले ने हमारे देश की अमूल्य सांस्कृतिक सम्पदा को नष्ट करने का जो विष बीज बोया था, उसकी फलती-फूलती फसल आज समूचे देश में लहलहा रही है। मैकाले की इस साजिश का खुलासा 2 फरवरी 1836 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिये गये उसके उस वक्तव्य से होता है, जिसमें उसने भारत की शिक्षा व्यवस्था को बदलने की वकालत कहते हुए कहा था कि इस देश में अपार सम्पदा है। मैंने भारतवर्ष के कोने-कोने में भ्रमण किया किंतु पूरे देश में मुझे एक भी भिखारी व चोर नहीं मिला। यहां के लोग इतने उच्च नैतिक आदर्श वाले, इतने प्रतिभाशाली व साहसी हैं कि मुझे नहीं लगता कि हम इस देश को कभी भी जीत पायेंगे। भारत पर विजय तभी संभव है जब हम इस देश के मेरुदंड अर्थात इस देश की आध्यात्मिक सम्पदा व सांस्कृतिक परम्पराओं को नष्ट कर दें। इसके लिए हमें भारत में तत्काल नयी शिक्षा नीति लागू करनी होगी। अंग्रेजी शिक्षा ही एकमात्र वह अस्त्र है, जिसके माध्यम से हम उन्हें अपना गुलाम बनाये रख सकेंगे।

हम अंग्रेजों की इस कुटिल मंशा को नहीं समझ पाये। अंग्रेजों ने हमारे देश की भौगोलिक सीमाओं को ही नहीं तोड़ा, बल्कि जाते जाते वे बहुत ही चालाकी से हमारे देश की आत्मा, हमारी भारतीयता, हमारे संस्कार व संस्कृति भी खण्डित कर गये।

अंग्रेज यह जानते थे कि अगर भारत को ही कमजोर करना है तो उसके बाशिंदों का आत्मसम्मान नष्ट करना जरूरी है। फिर न वे उठेंगे और न ही प्रतिरोध करेंगे। मैकाले की सोच सारहीन शिक्षा के जरिये भारतीय युवाओं को क्लर्क बनने की थी। इस तंत्र ने स्वयं की सोच विकसित करने की बजाए अधिकारियों की जी हुजूरी कर हर महीने की सैलरी का इंतजार करने वाली भीड़ तैयार की। इसका नजारा आज भी हमें दफ्तरों और कॉर्पोरेट्स में कहीं भी सहज ही दिख सकता है। समझना होगा कि शिक्षा वो नहीं जो सिर्फ क्लर्क बनाए, वरन् शिक्षा वो है जो इंसान को काबिल बनाए। मैकाले प्रणीत शिक्षा प्रणाली में आर्यभट्ट और रामानुज के इस देश में गणित को बोरिंग विषय के रूप में प्रचारित किया गया था, ताकि इस विषय से भारत का एकाधिकार खत्म हो। बच्चों को रटना सिखाया गया। समय से पहले कैल्क्यूलेटर थमा दिये गये।

अपने भोजन, भजन, भाषा-भूषा और भेषज की सारी अच्छाइयों को भूलकर आज हम पश्चिम की नकल में पागल हो गए हैं। हम जितने मालदार और ताकतवर होते जा रहे हैं, उतने ही तगड़े नकलची भी बनते जा रहे हैं। हमने अंग्रेजों को भी मात कर दिया है। वे उपनिवेशों का खून चूसते थे। परायों को गुलाम बनाते थे। हम अपनों को ही अपना गुलाम बनाते हैं। हमने " भारत" को "इंडिया" का गुलाम बना दिया है। दीक्षांत समारोह के अवसर पर चोगा और टोपा पहनकर हम ऑक्सफोर्ड और कैंम्ब्रिज के स्नातकों की नकल करते हैं। बच्चों को स्कूल भेजते समय उनके गले में टाई लटका देते हैं। जन्मदिन मनाने के लिए दीपक जलाकर लड्डू खिलाने के स्थान पर मोमबत्ती बुझा कर केक काटते हैं। शादी समारोहों के निमंत्रण-पत्र अंग्रेजी में भेजना और हस्ताक्षर अंग्रेजी में करना अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं। हमने मां को "ममी" और पिता को "डैड" बना दिया है। प्रणाम व पैर छूने की आदर प्रदर्शित करने वाली भारतीय परम्पराएं आज दनियानूस रूढ़ियां बनती जा रही हैं। जब हमसे हमारा परिचय पूछा जाता है तो हम ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, मराठी, गुजराती, तमिल, मलयाली, बंगाली, कायस्थ, दलित कह कर अपना परिचय देते हैं, भारतीय कह कर नहीं। कभी विचार किया है इन पहलुओं पर!

आजादी के बाद देश की बागडोर संभालने वाले कांग्रेसी नेताओं ने अंग्रेजों के बोये गुलाम मानसिकता के इस बीज को खाद-पानी देकर वोट बैंक की जो राजनीति शुरू की थी उसके दुष्परिणाम किसी से छिपे नहीं है। आखिर हम भारत के लोग 15 अगस्त को किस आजादी का जश्न मनाते हैं! हमारी सोच आज भी गुलाम है। हम अंग्रेजी सभ्यता के गुलाम हैं जिसका अन्धानुकरण हमारी युवा पीढ़ी कर रही है। हम गुलाम हैं सरकार की उन नीतियों की जो इस देश के नागरिक को उसके धर्म और जाति के आधार पर आंकती हैं उसकी योग्यता के आधार पर नहीं। हम गुलाम हैं तथाकथित छद्म धर्मनिरपेक्षता के। हम गुलाम हैं हर उस सोच के जो हमारे समाज को तोड़ती है और हमें एक नहीं होने देती। हम आज भी गुलाम हैं अपने निज के स्वार्थों के जो देशहित पर हावी हो जाते हैं।

इस बाबत जाने माने विचारक वेदप्रताप वैदिक की यह टिप्पणी वाकई काबिलेगौर है कि हमारे देश का भद्रलोक आज भी अंग्रेजों का उत्तराधिकारी बना हुआ है। यह बगुलाभगत अपने स्वार्थ की माला जपना न जाने कब बंद करेगा! दिमागी गुलामी और नकल से भारत का छुटकारा पता नहीं कब होगा? गुलामी के खंडहरों को ढहाने का काम गांधी के बाद अकेले लोहिया ने किया। उनके बाद कोई भी राष्ट्र निर्माण के इस मौलिक रहस्य को नहीं समझ पाया कि चाकू चलाए बिना शल्यचिकित्सा नहीं हो सकती। उस्तरा चलाए बिना दाढ़ी नहीं बनती। भारत के सभी राजनीतिक दल गालों पर सिर्फ साबुन घिसने को दाढ़ी बनाना समझे बैठे हैं, इसीलिए आजाद भारत आज भी गुलाम है। अंग्रेजों के चले जाने से हमें सिर्फ संवैधानिक आजादी मिली है। क्या हम सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से आजाद हैं? संविधान कहता है कि हम आजाद हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हम गुलाम हैं। उदाहरण के लिए सबसे पहले हमारी संसद को लें। संसद हमारी संप्रभुता की प्रतीक है। मगर हमारे काम आज भी ब्रिटेन की भाषा में होते हैं। क्या आज तक एक भी कानून राष्ट्रभाषा में बना है? सारे कानून परभाषा में ही हैं। मगर किसी को इस पर शर्म नहीं आती। गनीमत है कि सांसदों को भारतीय भाषाओं में बोलने की इजाजत है लेकिन हास्यास्पद है कि वे भी भारतीय भाषाओं में इसीलिए बोलते हैं कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती। हम हिन्दी को आज तक राष्ट्रभाषा नहीं बना सके हैं। गुलाम मानसिकता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है!

अगर हमें वाकई में आजादी चाहिए तो सबसे पहले अपनी गुलाम सोच, अपने अहम से आजाद होना होगा। हमें आजाद होना पड़ेगा उन स्वार्थों से जो देशहित में रुकावट बनते हैं। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी आजादी को भौगोलिक अथवा राजनैतिक दृष्टि तक सीमित न रखें। हम आजादी अपनी सोच में लाएं। जो सोच और जो भौगोलिक सीमाएं हमें अंग्रेज दे गए हैं उनसे बाहर निकलें। चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, सुखदेव, महारानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाष चंद्र बोस, अशफाक उल्लाह खान जैसे अमर क्रांतिवीरों ने आजाद और गौरवशाली भारत के लिए अपनी जान न्योछावर की थी। जिस दिन हम भारतवासी इस गुलाम मानसिकता से आजाद हो सकेंगे तभी सही मायने में आजादी का उत्सव मनाना सार्थक होगा।

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