देश के पिछड़ा वर्ग को खुश करने की कवायद

देश के पिछड़ा वर्ग को खुश करने की कवायद

-दिव्य उत्कर्ष


राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए लाये गये विधेयक का लोकसभा में सर्वसम्मति से पारित होना इस बात का संकेत है कि नरेंद्र मोदी सरकार को अपन चुनावी वादे को पूरा करने में कोई परेशानी होने वाली नहीं है। देश में ओबीसी आरक्षण लागू हुए 25 साल से अधिक का समय होने वाला है, लेकिन इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि अभी तक इससे संबंधित आयोग को संवैधानिक दर्जा देने नहीं मिल सका था। अब लोकसभा में इस विधेयक के सर्वसम्मति से पारित होने के बाद इस बात को लेकर सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा हासिल हो जायेगा। लोकसभा में जिस तरह से प्रत्येक दलों ने इस विधेयक का समर्थन किया, उससे इस बात की संभावना भी बन गयी है कि राज्यसभा में भी विपक्ष का उसे भरपूर समर्थन मिलेगा।

नए संशोधनों के साथ पेश किये गये इस विधेयक को सभी दलों ने हाथों हाथ लिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि किसी जाति विशेष अथवा जाति समूह के हित में किये गये काम को राजनीतिक चश्मे से देखने की एक रवायत बन गयी है। इसलिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने संबंधी विधेयक को मिले समर्थन को भी इसी नजरिये से देखा जा सकता है। लोकसभा में इस विधेयक को जिस तरह से 406 सांसदों का समर्थन मिला और इसके खिलाफ एक भी सांसद का वोट नहीं गया, उससे स्पष्ट है कि कोई भी दल इसके खिलाफ नहीं है। वैसे भी चुनावी वर्ष में कोई भी दल देश के एक बड़े मतदाता वर्ग को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा।

इस बात में भी कोई शक नहीं है कि देश में पिछड़ी जातियों से संबद्ध लोगों की इतनी विशाल आबादी है कि उनकी नाराजगी किसी भी चुनाव पर असर डाल सकती है। यही कारण है कि जहां केंद्र की मोदी सरकार अपने वायदे के मुताबिक जातीय संतुलन साधने का काम कर रही है, वहीं विपक्षी पार्टियां भी इसके समर्थन में खड़ी हैं। यहां विपक्षी पार्टियों खासकर कांग्रेस से यह अवश्य पूछा जाना जा सकता है कि पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू होने के इतने साल बाद भी अपनी सरकार में उसने पहले कभी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की कोशिश क्यों नहीं की

निश्चित रूप से संवैधानिक दर्जा हासिल हो जाने के बाद राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम हो जायेगा, लेकिन अभी इस बाबत यह कह पाना कठिन है कि आयोग आरक्षण संबंधी समस्याओं का पूरी तरह से समाधान कर पाने में कितना समर्थ होगा। इसके बावजूद ये कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना वास्तव में देश के पिछड़े समाज को अधिकार संपन्न करने की दिशा में उठाया गया एक कदम है। आंकड़ों के लिहाज से देश में पिछड़ी जातियों की आबादी लगभग पचास फीसदी है। इतनी बड़ी आबादी का विकास करना है तो उन्हें सामाजिक सुरक्षा देने के साथ ही उनकी आर्थिक और शैक्षणिक सुविधाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर नयी शक्तियों से लैस करने की तैयारी की है।

संवैधानिक दर्जा मिल जाने के बाद आयोग सिविल कोर्ट की तरह आरोपियों को समन कर सकेगा और उन्हें सजा भी दे सकेगा। अभी तक यह सुविधा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग को मिली हुई है। परंतु अब अन्य पिछड़ी जातियों के लोग भी अपने ऊपर होने वाले अत्याचार या अपने साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आयोग का दरवाजा खटखटा सकेंगे। ये आयोग केवल अत्याचार संबंधी मामले ही नहीं देखेगा, बल्कि ये उन जातियों के सामाजिक और आर्थिक विकास के उपाय भी सुझायेगा। आयोग ये भी देखेगा कि किन जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका है और कौन जातियां आरक्षण का अधिकतम लगातार लाभ लेती रही हैं। निश्चित रूप से इस आयोग को पहले से अधिक युक्तिसंगत बनाने की जरूरत है। केंद्र सरकार की कोशिश भी यही है। 'सबका साथ, सबका विकास' के लक्ष्य को लेकर चल रही केंद्र सरकार ने आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की कोशिश कर एक महत्वपूर्ण पहल की है। लेकिन इसके साथ ही एक अहम सवाल ये भी उठ रहा है कि अभी देश के अलग अलग हिस्सों में आरक्षण की मांग को लेकर जो आंदोलन चल रहे हैं, उनको लेकर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का क्या नजरिया होगा।

देश में के विभिन्न हिस्सों में हाल के कुछ वर्षों में जाट आरक्षण, गुर्जर आरक्षण, पाटिदार आरक्षण, मराठा आरक्षण की गूंज सुनाई देती रही है। ये जातीय समूह ओबीसी दायरे में खुद को शामिल किये जाने की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं। संवैधानिक बाध्यताओं के तहत एक निश्चित सीमा से अधिक आरक्षण का दायरा बढ़ाया भी नहीं जा सकता। ऐसे में ओबीसी के नाम पर पहले से ही आरक्षण की सुविधा प्राप्त कर रही जातियां नये जातीय समूहों को इस दायरे में लाये जाने का विरोध कर रही हैं। कारण स्पष्ट है कि अभी तक आरक्षण के नाम पर जिन जातियों को फायदा मिलता रहा था उसमें अगर और जातियां शामिल हो गयीं तो पहले से शामिल जातियों की हिस्सेदारी घट सकती है। सच तो ये है कि आरक्षण की मांग को लेकर चल रहे आंदोलनों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिल जाने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों की परेशानी कम हो जायेगी।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। लोकसभा में आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक पर चर्चा के दौरान जिस तरह कई राजनीतिक दलों ने क्रीमी लेयर की व्यवस्था खत्म करने और आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग की, उससे भी यही संकेत मिलता है कि आरक्षण को लेकर निकट भविष्य में शांति की स्थिति बनने वाली नहीं है। इसमें कोई शक नहीं है कि अगर किसी एक जातीय समूह को ओबीसी के दायरे में लाने का फैसला किया गया, तो निश्चित रुप से कुछ दिन बाद दूसरे समूह भी खुद को ओबीसी में लाये जाने की मांग करने लगेंगे।

इसमें कोई शक नहीं है कि आर्थिक असमानता समाज के हर वर्ग में है। सवर्णों में भी एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर है। वहीं पिछड़ा वर्ग में भी ऐसी कुछ जातियां हैं, जो आर्थिक व सामाजिक तौर पर संपन्न मानी जाती हैं। बिहार और यूपी में ही देखा जाए तो पिछड़े वर्ग में यादव और कुर्मी सामाजिक और आर्थिक तौर पर अन्य पिछड़ी जातियों से अधिक संपन्न हैं। ओबीसी आरक्षण का सबसे अधिक फायदा भी संपन्नता और पहुंच की वजह से इन्हीं जातियों को अभी तक ज्यादा मिलता रहा है।

निश्चित रूप से अब आरक्षण का भी वर्गीकरण करने की जरूरत है। ऐसा करके ही ओबीसी में शामिल हर जाति समूह को आनुपातिक रूप से आरक्षण का फायदा दे पाना सुनिश्चित हो सकेगा। बेहतर तो यह होगा कि आरक्षण व्यवस्था को इस तरीके से वर्गीकृत करने की जरूरत है, जिससे कि इसका फायदा उन्हीं लोगों को मिल सके जिनको इसकी जरूरत है। अभी की व्यवस्था में आरक्षण का सबसे अधिक फायदा वही लोग ले रहे हैं, जो पिछड़ी कही जाने वाली लेकिन संपन्न और प्रभावशाली जातियों से संबद्ध हैं। आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में एक दोष यह भी है कि आरक्षण का लाभ ले चुके लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस लाभ को हासिल कर रहे हैं। जबकि अशिक्षा और सामाजिक दुरावस्था की वजह से आरक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद कई जातियों को आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है।

आरक्षण की व्यवस्था पिछड़े तबकों, शोषितों और वंचितों के उत्थान के लिए की गयी थी, लेकिन इस पर भी कुछ जाति विशेष का कब्जा होता गया। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि कोई भी दल आरक्षण की व्यवस्था को संकुचित या खत्म करने के लिए कभी भी तैयार नहीं होगा। इसी कारण शुरुआती दौर में 10 वर्षों के लिए शुरू हुई आरक्षण व्यवस्था संभवतः भारत में अनंतकाल तक जारी रहे, इसके बावजूद इस बात पर विचार करना बहुत जरूरी है कि आरक्षण का लाभ उनको ही मिले, जिन्हें इसकी जरूरत है। सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि गरीबों और वंचितों के हिस्से का आरक्षण ओबीसी में शामिल संपन्न और प्रभावशाली लोग ही न लेते रहें। अन्यथा आरक्षण की पूरी अवधारणा ही ध्वस्त हो जायेगी। आजादी के बाद के 70 सालों में अभी तक यही होता रहा है और अब इसमें सुधार किये जाने की जरूरत है।


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