कौन देखेगा भूख से मरते इन मासूमों को

कौन देखेगा भूख से मरते इन मासूमों को

-आर.के. सिन्हा


अभी कुछ दिन पहले की बात है, जब एक सुबह राजधानी दिल्ली से ही एक खबर आयी कि एक ही परिवार की तीन अबोध बच्चियों की भूख के कारण मौत हो गयी है। जाहिर है, इस खबर ने दिल्ली की सत्ता के गलियारों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। आज के समय में जब देश के खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का दावा किया जा रहा है, तब भूख के कारण राजधानी में तीन अबोध बालिकाओं के संसार से कूच कर जाने की बात अविश्वसनीय, अप्रत्याशित और शर्मनाक तो अवश्य ही थी। चूंकि डाक्टरों के हवाले से ही मौत का कारण भूख को ही बताया जा रहा था, इसलिए सबको यकीन करना पड़ा। हालांकि, यह भी कहा जा रहा है कि उन अभागी बच्चियों के दुष्ट पिता ने ही उन्हें जहर देकर मार डाला था। वह उस हृदय विदारक घटना के बाद से ही गायब है। अगर ऐसा भी है तो इस घटना का अप्रत्यक्ष कारण भूख ही रहा होगा, क्योंकि उसके पास खिलाने को कुछ था ही नहीं। यह खबर एक उदाहरण भर थी। देश के कई भागों से भूख के कारण लोगों के मरने की खबरें हाल के दौर में आती ही रहती हैं।

निश्चय ही इस घटना से दो बातें तो सामने आ रही हैं। पहली, कहीं ना कहीं लगता यह है कि कुछ भड़काऊ शक्तियां भूख से होने वाली कथित मौत की खबरों को सोशल मीडिया और अन्य मीडिया प्लेटफॉर्म पर जरूरत से ज्यादा फैलाकर देश की छवि को धूमिल करने में लगी हैं। निश्चित तौर पर इस तरह की हरकतें किसी बड़े षड्यंत्र के तहत ही की जा रही हैं। दूसरी बात यह लगती है कि दिल्ली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी राशन की दुकानों से राशन लेना अब भी चुनौती बना हुआ है। पता तो यह भी चला है कि इन कन्याओं के परिवार के पास राशन कार्ड तक नहीं था। हालांकि दिल्ली में फर्जी राशन कार्ड से राशन लेने वाले बांग्लादेशी भी कम नहीं हैं।

पर भूख से होने वाली कथित मौतों को लेकर अब भारत सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। उसका दावा है कि देश में किसी भी राज्‍य या संघ शासित प्रदेश में भूख से किसी की मौत होने की कोई खबर नहीं है। कुछ राज्‍यों में भूख से मौत की खबरें मीडिया में आयी हैं, लेकिन जांच में ऐसे आरोपों की पुष्टि नही हो पायी है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग का यह दावा सही साबित हो जाये, यही कामना है। परन्तु, ये यह दावा सही होता तो भूख से मौत की खबरें आती कहां से हैं ?

महत्वपूर्ण यह है कि केन्‍द्र सरकार राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 और अन्‍य कल्‍याणकारी योजनाओं के तहत राज्‍य सरकारों और केन्‍द्र शासित प्रदेशों के माध्‍यम से गरीबी की रेखा से नीचे रहनी वाली आबादी के लिए काफी रियायती दर पर खाद्यान्‍न उपलब्‍ध कराने का वादा करती है।आपको बता दें कि राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में 75 फीसदी ग्रामीण और 25 फीसदी शहरी आबादी आती है, जो देश की कुल आबादी का करीब दो तिहाई हिस्‍सा है। इन लोगों को चावल, गेंहू और मोटे अनाज क्रमश: 3, 2, और 1 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से दिये जा रहे हैं। अब आप समझ सकते हैं कि इतनी सस्ती दरों पर अनाज के मिलने के बाद भी किसी इंसान के भूख से मरने की खबरें आना यकीन से परे ही मानी जायेगी। यद्यपि देश में आर्थिक असमानता है, पर लगभग हरेक इंसान के पास चाहे वह दिहाड़ी मजदूर ही क्यों न हो, उसके पास इतना पैसा तो रहता ही है कि वह चावल, गेंहू व मोटा अनाज तो सस्ती दरों पर प्राप्त कर सकता है। राजधानी में जिन तीन लड़कियों के भूख से मारे जाने की घटना से सनसनी मच गई थी, उस संबंध में सच का पता लगाने के लिए तो जांच हो रही है। पर इतना तो माना जा ही सकता है कि अभी हमारा समाज इतना संवेदनहीन और असामाजिक नहीं हुआ है कि कोई अपने भूख से तड़पते पड़ोसी को रोटी नहीं देगा। यह अकल्पनीय सा लगता है।

पर इसी पृष्ठभूमि में इतना तो कहना ही होगा कि दिल्ली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से चुस्त नहीं है। विगत अप्रैल में आईकैग की रिपोर्ट में दिल्ली में राशन घोटाले का पर्दाफाश हुआ था। अनियमितताओं में गोदाम से दुकानों तक अनाज की सप्लाई से जुड़ा मामला सबसे अहम है। रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि राशन की ढुलाई स्कूटर और बाइक पर हुई। तो क्या राशन की ढुलाई इन छोटे वाहनों पर होती रही? क्या यह व्यावहारिक और संभव है? और तो और जनता में राशन का वितरण किये बगैर ही उसकी फर्जी ढुलाई दिखा दी गयी।

इस रिपोर्ट के आने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कहा था कि इस मामले में सख्त कार्रवाई की जायेगी। इस बाबत उन्होंने क्या कार्रवाई की, यह अभी तक किसी को ज्ञात नहीं है। इस रिपोर्ट को आये तीन माह से अधिक का वक्त हो गया है, जरा केजरीवाल बतायें तो सही कि उन्होंने गरीबों का अनाज हड़पने वालों पर क्या एक्शन लिया? सबको पता है कि दिल्ली में फर्जी राशन कार्ड भी धड़ल्ले से बनते रहे हैं। कहने वाले कहते हैं कि नकली राशन कार्डों के जरिए हर महीने करोड़ों रुपये के राशन का घोटाला होता रहा है। यानी फर्जी लोगों और घुसपैठी बांग्लादेशियों के लिए गरीब नागरिकों का हक मारा जा रहा है। सिर्फ दोषारोपण करने से तो बात नहीं बनेगी। अरविंद केजरीवाल को समझना होगा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली उसी स्थिति में सफल हो सकती है, जब केन्द्र और राज्य मिलकर काम करें। समझ में नहीं आ रहा तो छत्तीसगढ़ से सिख लें। यह समवर्ती सूची के अंतर्गत आती है। इसीलिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली का क्रियान्वयन केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ही करना होता है। केंद्र सरकार को आवश्यक वस्तुओं का अधिग्रहण, भंडारण तथा वितरण करना होता है, वहीं राज्य सरकारों को आवश्यक वस्तुओं को राशन की दुकानों तक पहुंचाना तथा उपभोक्ताओं में बांटना होता है। यानी सारे दायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। केजरीवाल उपर्युक्त घोटाले के सामने आने के बाद ज्यादा नहीं बोले, क्योंकि कमी तो उनकी सरकार की ही पकड़ी गई थी। बोलने को कुछ बचा हो तब तो बोलें। अब तीन मासूम बहनों के मारे जाने के बाद भी वे चुप ही रहे, क्योंकि यह घटना उनके परम प्रिय उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के विधानसभा क्षेत्र में ही घटित हुई थी।

दरअसल, अपने यहां समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्तियों को सस्ते दामों पर चावल, गेहूं, चीनी और केरोसिन जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने के लिए ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली शुरू की गयी थी। इससे अब तक करोड़ों नागरिकों को लाभ भी पहुंचता रहा है। यह भी सच है, पर अगर इसके माध्यम से मिलने वाले सामान का वितरण सही ढंग से नहीं होगा, तो फिर यह अपने आप में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। जिन तीन बहनों की मौत हुई उस परिवार के पास भी राशन कार्ड नहीं था। सरकार जवाब दे कि उन्हें राशन कार्ड किस कारण से नहीं मिल सका था? इन तीन कन्याओं की मौत का जिम्मा समाज से अधिक दिल्ली सरकार का है,जो गरीबों को राशन तक पहुंचाने में फेल हुई है।


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