कांग्रेस की नैतिक पराजय

कांग्रेस की नैतिक पराजय

-दिव्य उत्कर्ष

खबर है की केंद्र से बीजेपी की सरकार को हटाने के लिए कांग्रेस प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी छोड़ सकती है। मतलब साफ है कि कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले ही अपनी नैतिक पराजय स्वीकार कर ली है और इससे ये भी साफ हो गया है कि राहुल गांधी एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में पिछड़ गये हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से ही राहुल गांधी पीएम इन वेटिंग बने हुए थे। कुछ समय पहले गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने खुलकर प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को स्वीकार भी किया था। अभी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में भी यही बात प्रमुखता से उठाई गयी थी कि बीजेपी के विरोध में बनने वाले प्रस्तावित विपक्षी गठबंधन के केंद्र में कांग्रेस ही होनी चाहिए और उसका नेतृत्व राहुल गांधी के हाथ में ही होना चाहिए, लेकिन लगता है कि विपक्षी एकता की मजबूरी, बीजेपी का डर और कांग्रेस की आंतरिक कमजोरी ने कांग्रेसियों की और खासकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इस दिली इच्छा को दम तोड़ने के लिए विवश कर दिया है।
कांग्रेस की शुरू से यही कोशिश थी कि वह सभी बीजेपी विरोधी दलों को एकजुट कर अपने पाले में ले आये और उसकी अगुवाई खुद करे। अगर ऐसा होता तो राहुल गांधी निश्चित रूप से उस गठबंधन की अगुवाई करते और स्वाभाविक तौर पर अगले लोकसभा चुनाव में आवश्यक संख्या में सांसद जुट जाने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद पर उनका दावा भी मजबूत होता। लेकिन विपक्षी गठबंधन की कोशिशें शुरू हुई, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि राहुल गांधी को इक्के-दुक्के क्षेत्रीय दलों के अलावा और कोई भी गठबंधन के नेता के तौर पर नहीं देखना चाहता है।
यह ठीक है कि लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव शुरू से ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का सबसे बेहतर दावेदार मानते रहे हैं। लेकिन विपक्षी एकता की केंद्र फिलहाल ममता बनर्जी बनी हुई हैं। और उनके रहते राहुल गांधी की दावेदारी आसान होने वाली नहीं थी। ये वही ममता बनर्जी हैं, जिनका पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ 36 का आंकड़ा है। ममता बनर्जी लगातार कांग्रेस के विधायकों और नेताओं को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल करा रही हैं। अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने कांग्रेस के चार विधायकों को भी अपनी पार्टी में मिला लिया। बीजेपी विरोधी क्षेत्रीय दलों की नजर में ममता बनर्जी ही फिलहाल एक ऐसी नेता हैं, जो कड़वा कड़वा बोल कर मोदी पर चोट करने में सबसे आगे रहती हैं।
यही कारण है कि कांग्रेस की ओर से इस बात का भी संकेत दिया जा रहा है कि अगर विपक्षी गठबंधन के नेता के तौर पर राहुल गांधी के नाम पर सहमति नहीं बन सकी, तो कांग्रेस किसी क्षेत्रीय दल के नेता को भी गठबंधन की अगुवाई करने के लिए सहमत हो सकती है। इन नेताओं में ममता बनर्जी का नाम भी हो सकता हैं। ये हाल तब है जबकि ममता बनर्जी पहले ही कह चुकी हैं की अगर बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए विपक्षी पार्टियां गठबंधन बनाती हैं और कांग्रेस भी उस गठबंधन में शामिल होना चाहती है, तो उसकी स्थिति भी अन्य दलों के समान ही होगी। उसे यह नहीं समझना चाहिए कि राष्ट्रीय दल होने के नाते उसे गठबंधन की अगुवाई करने का मौका मिलेगा। गठबंधन की अगुवाई के बारे में कोई भी फैसला प्रस्तावित गठबंधन की समन्वय समिति द्वारा ही किया जाएगा।
स्पष्ट है की ममता बनर्जी किसी भी हालत में राहुल गांधी का के नाम का समर्थन नहीं करने वाली हैं। ऐसे भी बीजेपी विरोधी दलों में अधिकांश नेता राहुल गांधी को अपने से काफी जूनियर मानते हैं। उनका यह भी मानना है कि राहुल गांधी में अभी तक इतनी परिपक्वता नहीं आ सकी है कि वह किसी बीजेपी विरोधी दलों के गठबंधन का नेतृत्व कर सकें। यह एक ऐसी बात है, जो कांग्रेस के लिए बड़े झटके के समान है। अभी तक जब भी कांग्रेस ने विपक्षी गठबंधनों को सहारा दिया है, तब कांग्रेस एक बड़ी पार्टी हुआ करती थी या वो खुद गठबंधन के केंद्र में हुआ करती थी। मतलब या तो कांग्रेस बाहर से गठबंधन का समर्थन करती थी या सरकार के केंद्र में होती थी। ऐसा शायद पहली बार होगा कि कांग्रेस गठबंधन में भी शामिल हो और उसकी हैसियत सामान्य क्षेत्रीय दलों की जैसी ही हो।
दरअसल, कभी देश की इकलौती सबसे बड़ी पार्टी समझी जाने वाली कांग्रेस का जनाधार देश के हर हिस्से में काफी तेजी से कम हुआ है। दुर्भाग्य से उसके पास शीर्ष स्तर पर ऐसा कोई नेता भी नहीं है, जो कांग्रेस से छिटक गये मतदाताओं को वापस जोड़ सके। ऐसा करने के लिए जिस करिश्माई चेहरे की जरूरत होती है वैसा करिश्माई चेहरा फिलहाल कांग्रेस के पास नहीं है। पारिवारिक परंपरा की वजह से राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष अवश्य बन गए हैं, लेकिन उनके पास अपनी दादी या अपने पिता जैसा करिश्मा नहीं है कि वे बिखरे हुए कांग्रेसियों को फिर से एक साथ जोड़ सकें।
कांग्रेस की ओर से संकेत दिया जा रहा है कि वह विपक्षी गठबंधन के नेता के तौर पर किसी महिला नेता के नाम पर सहमत हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो स्वाभाविक रूप से ममता बनर्जी और मायावती इन दोनों के नाम की चर्चा की जा सकती है। ममता बनर्जी की कांग्रेस से बुरी तरह ठनी हुई है। सोनिया गांधी से नाराजगी की वजह से ही उन्होंने यूपीए से अलग होने का फैसला किया था और अब वह लगातार कांग्रेस को चोट पहुंचाने में ही लगी हुई हैं। दूसरा नाम मायावती का है, लेकिन मायावती ने इसी सप्ताह यह कह कर कांग्रेसी खेमे में हलचल मचा दी है कि वह कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए तभी तैयार होगी, जब तीन राज्यों की विधानसभा के चुनावों में भी उसे सम्मानजनक संख्या में सीटें दी जाए।
मायावती जानती हैं कि कांग्रेस अभी इतनी मजबूर हो गई है कि वह बीजेपी विरोधी गठबंधन करने के लिए घुटनों पर चलने के लिए भी तैयार हो सकती है। लेकिन कांग्रेस के लिए किसी के भी सामने झुकने का मतलब उसके कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव और बढ़ना ही होगा। सच्चाई तो यह है कि कांग्रेस कार्यकर्ता निराश हैं। अपने पार्टी आलाकमान से उसे आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही और जब उन्हें इस बात का एहसास होगा है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के आगे समर्पण कर देगी, तो उनकी निराशा की भावना और बढ़ सकती है। और अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस की स्थिति आने वाले दिनों में और भी खराब हो सकती है। कांग्रेस के आला नेताओं को इस पर विचार करना चाहिए।

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