शाजापुर में निभाई जाएगी 270 साल पुरानी परंपरा, ऐतिहासिक कंस वधोत्सव की तैयारियां हुई शुरू

शाजापुर में निभाई जाएगी 270 साल पुरानी परंपरा, ऐतिहासिक कंस वधोत्सव की तैयारियां हुई शुरू


शाजापुर। कंस वधोत्सव की लगभग 270 वर्ष पुरानी परंपरा इस बार आगामी सात नवम्बर को निभाई जाएगी। देश में मथुरा (उप्र) और फिर शाजापुर में बड़े व भव्य पैमाने पर मनने वाले इस अनूठे प्राचीन व ऐतिहासिक आयोजन को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। कंस वधोत्सव वाले दिन शहर की सडक़ों पर श्रीकृष्ण और मामा कंस के बीच जमकर वाकयुद्ध होगा। फिर श्रीकृष्ण कंस का वध करेंगे। सोमवारिया बाजार स्थित कंस चौराहे पर गत देर रात कंस का पुतला बैठाया गया है।

उल्लेखनीय है कि मथुरा एवं शाजापुर में बड़े पैमाने पर मनाए जाने वाले कंस वधोत्सव के आयोजन का अपना अलग ही उत्साह है। शाजापुर ही नहीं बल्कि प्रदेश के कई जिलों से लोग इस आयोजन को देखने के लिए आते हैं। इस बार भी यह आयोजन बड़े पैमाने पर मनेगा। कंस वधोत्सव समिति के अनुसार 7 नवम्बर को कंस एवं श्रीकृष्ण तथा उनकी सेना के बीच जर्बदस्त वाकयुद्ध होगा। रात 8 बजे पुराना अस्पताल स्थित बालवीर हनुमान मंदिर से चल समारोह शुरू होगा। चल समारोह में युवकों व वरिष्ठजनों को श्रीकृष्ण व कंस के रूप में सजाया जाएगा। साथ में दोनों की सेना भी होगी, जिसमें कृष्ण, कंस के अलावा बलराम, मनसुखा आदि शामिल होंगे। आजाद चौक में जमकर वाकयुद्ध होगा। फिर चल समारोह नई सडक़, मगरिया होता हुआ सोमवारिया पहुंचेगा। यहां कंस के वध के पूर्व वाद-संवाद होगा। रात 12 बजे कंस के पुतले को नीचे गिराया जाएगा। फिर यादव समाज के लोग पुतले को घसीटते हुए अपने साथ ले जाएंगे।

270 साल पुराना है इतिहास

आयोजन समिति के अनुसार सोमवारिया बाजार स्थित पुष्टिïमार्गीय गोवर्धननाथ मंदिर के मुखिया स्व. मोतीरामजी मेहता (गेबीजी) द्वारा कंस वधोत्सव कार्यक्रम की स्थापना की गई थी। लगभग 270 वर्ष पूर्व मुखिया स्व. मेहता ने मथुरा में उक्त कार्यक्रम आयोजित होते हुए देखा और कंस के वधोत्सव कार्यक्रम को शाजापुर में आयोजित कराने की ठानी। इसके बाद से मेहता परिवार द्वारा कंस वधोत्सव की व्यापक तैयारियां की जाने लगीं। करीब 125 साल तक मंदिर में कंस लीला का आयोजन होने लगा। बाद में इस ऐतिहासिक कंस वधोत्सव कार्यक्रम ने सार्वजनिक रूप ले लिया। तभी से यह कार्यक्रम कंस चौराहे पर आयोजित हो रहा है। यह कार्यक्रम दीपावली के पश्चात आने वाली दशमी को मनाया जाता है, जिसे कंस दशमी के नाम से जाना जाता है।


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