'पंचक' के सहारे मिली सीएम की कुर्सी

- डॉ. अजय खेमरिया

महाराष्ट्र की सियासी महाभारत में कांग्रेस को क्या हासिल हुआ है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना को तो सीएम की कुर्सी चाहिए थी, जो उसे मिल गई। शरद पवार 79 साल की उम्र में भी महाराष्ट्र की सियासत के असली खिलाड़ी साबित हुए। लगे हाथ अपनी बेटी सुप्रिया को मराठा राजनीति में अग्रणी रूप से स्थापित भी कर गए। कांग्रेस को स्पीकर के पद के अलावा क्या मिला है? मोदी-अमित शाह के अश्वमेघी रथ को रोकने के लिए क्या कांग्रेस ने फिर उसी तर्ज पर हथियार डाल दिये जैसा यूपी, बिहार में उसने लालू और अखिलेश के सामने समर्पण मुद्रा खुद ही अख्तियार कर ली थी। इस पूरे प्रहसन में आरंभिक तौर पर दो दल जमीनी तौर पर घाटे में रहनेवाले लगते हैं। पहला शिवसेना और दूसरा कांग्रेस। शिवसेना भले संजय राउत के अथक प्रयासों से मुख्यमंत्री पद हासिल करने में कामयाब रही लेकिन उसका वैचारिक धरातल और कैडर विशुद्ध रूप से दरक चुका है। राष्ट्रपति चुनाव में मराठी मानुष के नाम पर प्रतिभा पाटिल का समर्थन हो या प्रणब मुखर्जी को वोट करने का मामला, जमीनी राजनीति से इसका कोई सीधा रिश्ता नहीं है, क्योंकि राष्ट्रपति का चुनाव वोटरों और कार्यकर्ता के स्तर पर नहीं होता है। जाहिर है, जो लोग पुराने उदाहरण देकर इस युति के लिए तार्किकता खड़ी कर रहे हैं वह जमीन की राजनीतिक हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश के महागठबंधन प्रयोग का अध्ययन करना चाहिए जो मीडिया के अलावा बीजेपी के नेतृत्व को भी नतीजों से पहले वाटरलू का मैदान ही प्रतीत हो रहा था। उपचुनावों के नतीजों ने उस महागठबंधन की सार्थकता को कैमेस्ट्री की जगह अर्थमेटिक ज्यादा साबित किया था। लेकिन जब मुख्य चुनावी बिसात बिछी तो गठबंधन हवा हो गया। बिहार में तो कमोबेश विपक्ष का सफाया ही हो गया था।

जाहिर है, मराठा राजनीति के इस गढ़ को भी हमें गहराई से विश्लेषण करने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र में पहली बार गैर मराठा, गैर दलित मुख्यमंत्री मोदी ने बनाया था जिसने अपनी बेहतरीन स्ट्राइक रेट के साथ बीजेपी को 105 सीटें जिताई है। याद रखना होगा कि बीजेपी के 25.8 फीसदी के बाद सर्वाधिक मत इस राज्य में निर्दलीयों (18.6 फीसदी) को मिले हैं। उद्धव की शिवसेना तीसरी (16.7 फीसदी) बड़ी ताकत है। एनसीपी (16.4 फीसदी) और कांग्रेस (15.6 फीसदी) पर सिमट गई है। यानी बीजेपी गैर मराठा गैर दलित कार्ड के साथ हिंदुत्व की जमीन पर अभी भी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत है। उसे शिवसेना के परंपरागत हिंदू मानसिकता वाला समर्थन भी 105 सीटों पर तो मिला ही है और जिन 56 सीटों पर शिवसेना जीती है वहां उसे मोदी का कोर वोटर मिला होगा। इस युति ने मोदी और बाल ठाकरे के फोटो लगाकर वोट मांगे थे। सवाल यह है कि अब महाराष्ट्र में बाल ठाकरे ब्रांड हिंदुत्व का क्या होगा? जिसने पाकिस्तान, अयोध्या, तुष्टीकरण, सावरकर, गोडसे, कॉमन सिविल कोड जैसे मुद्दों पर बीजेपी से ज्यादा आक्रामक रुख अपना रखा है। बाल ठाकरे ने दशहरे की अंतिम रैली में शिवसैनिकों से आग्रह किया था कि वे भारत को 'पंचक' से मुक्त कराकर ही दम लें। पंचक भारतीय ज्योतिष गणना में सबसे अशुभ माने जाते हैं। बाल ठाकरे ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, रॉबर्ट वाड्रा और अहमद पटेल को पंचक कहा था। आज इसी पंचक के आशीर्वाद से उद्धव बाल ठाकरे की समाधि के सामने खड़े होकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं। बाल ठाकरे के इसी कट्टर कांग्रेस विरोधी धरातल पर हजारों शिवसैनिकों की फौज खड़ी हुई है। करीब 35 साल के इस वैचारिक और बूथ लेबल सियासी संघर्ष का कांग्रेस से समेकन होना भविष्य में असंभव इसलिए लगता है, क्योंकि यूपी, बिहार में महागठबंधन के बड़े नेताओं के पास खुद का जातिगत जनाधार मौजूद था। लेकिन महाराष्ट्र में उद्धव की जमीन तो विशुद्ध हिंदुत्व की है। उनका खुद का कोई जातिगत आधार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में त्रिदेव की इस युति में शिवसेना को वैसा ही नुकसान उठाना पड़ सकता है जैसा यूपी में अखिलेश यादव को। महाराष्ट्र में मराठा राजनीति के शिखर पुरुष अभी भी शरद पवार ही हैं। जाहिर है, सत्ता में भागीदारी हासिल कर एनसीपी अपने मराठा कोर जनाधार को बरकरार रखने में सफल होगी। कांग्रेस इस मामले में किसी भूमिका में नहीं दिखी। कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण और अशोक चव्हाण इस मामले में फिसड्डी ही हैं।

महाराष्ट्र के हालिया घटनाक्रम के जरिये शरद पवार अपनी राजनीतिक विरासत बेटी सुप्रिया सुले को हस्तांतरित करने में सफल रहे हैं। यही नहीं वे कांग्रेस पर भी भारी साबित हुए हैं। क्योंकि, इस सरकार के मौजूदा गठन में उन्हें ही चाणक्य कहा जा रहा है। मोदी-अमित शाह के तिलिस्म को तोड़ने का श्रेय भी कोई 10 जनपथ या राहुल गांधी को नहीं दे रहा है। समझा जा सकता है कि राष्ट्रीय परिदृश्य में भी मोदी से मुकाबिल होने की काबिलियत कांग्रेस नहीं, शरद पवार ने स्वयंसिद्ध की है। जिस समय ईडी, सीबीआई के डर से कांग्रेस या दूसरे दलों के नेता सहमे हुए हैं तब शरद पवार खुद मुम्बई के ईडी दफ्तर अपनी गिरफ्तारी के लिए पहुंचने को तैयार हो गए। इससे उनकी ब्रांड मराठा छवि तो मजबूत हुई ही, वे दिल्ली को चुनौती देते भी नजर आए। असल में यह चुनौती 79 साल के शरद पवार की जगह अविवाहित राहुल गांधी या कांग्रेस के नेताओं की तरफ से आनी चाहिए थी। क्योंकि, शरद पवार अधिकतम 60-65 असेम्बली सीट के नेता हैं। मुंबई के महाभारत ने कांग्रेस के लिए बगैर लड़े ही सरेंडर योद्धा की स्थिति निर्मित कर दी। पूरे चुनाव में पार्टी नेतृत्व कहीं नजर नही आया। जो 44 लोग अपनी दम और कांग्रेस की पहचान से जीतकर आ गए, उनके ऊपर केसी वेणुगोपाल, खड़गे और अहमद पटेल को बेताल की तरह लाद दिया गया। अनिर्णय का शिकार कोई कैसे होता है, यह इस प्रकरण में कांग्रेस आलाकमान को देखकर समझा जा सकता है।


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