अयोध्या और राम राज की संभावना

अयोध्या और राम राज की संभावना


-गिरीश्वर मिश्र

उच्चतम न्यायालय के ताजे निर्णय से जन-जन में और विशेषत: राम भक्तों और संत समाज में प्रसन्नता व्याप्त है। अयोध्या और भगवान राम के बीच अभिन्न सम्बन्ध के कारण मंदिर निर्माण के साथ बहुतों का गहरा लगाव है। लेकिन तथ्य यह भी है कि अंतर्यामी हमारे राम निश्चय ही एक मंदिर में नहीं समा सकते, मंदिर चाहे जितना विशाल और भव्य क्यों न हो। कोई भी मानवीय रचना स्वभावत: परिसीमित ही होगी क्योंकि वह तो ठहरी सिर्फ एक मूर्त प्रतीक या संकेत। यह जरूर है कि वह प्रतीक परमात्मा राम की और राम-भाव की अनुभूति का एक सिलसिला शुरू कर सकता है जिसके सहारे हम खुद को राम जी की याद दिलाते रहते हैं। इस अर्थ में मंदिर ही क्यों, पूरी अयोध्या नगरी ही राममय है।

सदियों से भारतीय समाज की पीढ़ी-दर-पीढ़ी अब तक इसी स्मृति में डुबकियां लगाती रही है कि राम का जन्म यहीं हुआ और बचपन भी यहीं बीता। उनके जीवन से जुड़े बहुत से ठांव-ठिकाने भी हमने बना रखे हैं। सीता की रसोई, हनुमान गढ़ी और भी जानें क्या-क्या। पावन सरयू नदी यहीं बहती है। चैत महीने की राम नवमी को हमारे राम प्रति वर्ष जन्म लेते हैं (साल गिरह मना कर हम उन्हें हर साल और बूढे नहीं करते।) और राम-जन्म की स्मृति फिर-फिर जीवंततर और पहले से और ज्यादा सुदृढ़ होती जाती है। अंतत: स्मृति ही सत्य को प्रमाणित करती है। स्मृति के अभाव में उस व्यक्ति (या समाज) के लिए सत्य के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आज भी अयोध्या नगरी के पास राम के स्मरण के अनेक प्रयोजन हैं और नाम के साथ रूप का जुड़ जाना प्रतीक को पूरी अर्थवत्ता और समग्रता प्रदान करता है।

वेद पुराण और रामायण में अयोध्या को पावन नगरी के रूप में कई तरह से स्मरण किया गया है। मोक्षदायिनी सात नगरियों में अयोध्या का नाम सबसे पहले आता है। जैन और बौद्ध मतावलम्बियों के लिए पूजनीय धार्मिक स्थल के रूप में भी अयोध्या की बड़ी लंबी परम्परा के प्रमाण उपलब्ध हैं। भारत के बाहर थाईलैंड में भी एक 'अजुध्या' है। कछ वर्ष पूर्व जब मेरा इंडोनेशिया जाना हुआ था तो वहां भी योग्यकार्ता नगर और परम्बनम परिसर में रामायण और रामलीला की परम्परा जीवित मिली। अयोध्या वहां भी जगी थी। कोसल जनपद और अयोध्या स्कंदगुप्त, कनिष्क और जाने किन-किन ग्रीक योद्धाओं और राजाओं से जुड़ा है। पुरातात्विक उत्खनन भी बताता है कि यह नगरी सुदीर्घ काल से व्यापार, राजनीति और धर्म की गतिविधियों का एक सक्रिय केंद्र थी। वहां मंदिर की उपस्थिति भी थी।

राम और अयोध्या दोनों भारतीय समाज में आदर्श और नैतिक प्रगति की आकांक्षा को रूपायित करते हैं। निश्चय ही अयोध्या के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भारत की सामाजिक स्मृति के अभिन्न अंश है। भारत का आम आदमी जिससे लोक का निर्माण होता है। जो ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है। राम को अपने बड़े नजदीक पाता है। तुलसीदास और कम्बन आदि महाकवियों के प्रयास से उनका चरित एक आदर्श के रूप में सब के हृदय में बसा हुआ है। उनका राम-राज शासन की उस संकल्पना का खाका पेश करता है जिसमें दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तरह के ताप अर्थात कष्ट नहीं होते हैं। राममय होना आत्म के विस्तार और समष्टि के लिए समर्पण मांगता है। संत कबीर, गोस्वामी तुलसीदास और महात्मा गांधी आदि ने ऐसे ही व्यापक राम की आराधना की है।

अयोध्या के बहाने राम का स्मरण यही व्यक्त करता है कि मनुष्य जीवन एक सतत परीक्षा की श्रृंखला है। समाज की कसौटी पर खरे उतरने की चुनौती, अपने वचन की रक्षा की प्रतिज्ञा, गुरुजनों की सेवा और प्रजा-वत्सलता आदि सभी दायित्वों के प्रति रामचंद्र जी जीवनभर सतर्क और सक्रिय बने रहे। वे जीवन में बार-बार दंश झेलते हैं। राम एक कठोर साधनामय जीवन की प्रतीति कराते हैं। उनका पूरा जीवन जगत के हित के लिए समर्पित और सबका साथ लेने वाले समष्टि भाव से अनुप्राणित है।

आज रामलला की दिव्य मूर्ति के साथ एक भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित होने को लेकर लोगों में उत्साह है। इसके लिए सबकी सहमति बनती भी दिख रही है। यह निश्चय ही देश के लिए एक शुभ लक्षण है। पूरे माहौल को देख आम आदमी को यही लग रहा है कि कलियुग में लम्बे वनवास की अवधि बीतने के बाद अयोध्यापति रामचंद्र जी का अयोध्या में पधारना हो रहा है। यह आशा भी बलवती हो रही है कि भारत में राम-राज की स्थापना की दिशा में हम आगे बढ़ सकेंगे और सुशासन के अच्छे दिन का दौर आ सकेगा। आशा है हमारे जन प्रतिनिधि भी निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर लोक-संग्रह की ओर ध्यान देंगे।


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