दिल्ली फिर बनी गैस चेम्बर

दिल्ली फिर बनी गैस चेम्बर

-योगेश कुमार सोनी

दीपावली के बाद से दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की वजह जीना दूभर हो रहा है। शासन-प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद लोगों ने पटाखे चलाने में कमी नहीं छोड़ी और न ही किसानों ने पराली जलाने में रियायत बरती। नतीजतन दिल्ली के आसमान पर प्रदूषण खतरनाक स्तर को पार कर गया है। हालांकि सरकारी नुमाइंदे आंकड़ों की बाजीगरी कर यह बताने में लगे हुए हैं कि इस बार दीपावली में पिछले तीन सालों की बनिस्पत कम पटाखे फोड़े गए हैं।

बेशक, दिल्ली में प्रदूषण को लेकर पहले भी बुरी हालत रही है। दिल्ली की गिनती दुनिया के प्रदूषित शहरों में की जाती रही है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायालय (एनजीटी) ने समय-समय पर केंद्र-राज्य सरकारों को प्रदूषण रोकने के लिए कठोर से कठोर कदम उठाने को कहा है। सरकारें अपनी ओर से इस बाबत प्रयास भी करती रही हैं। फिर भी समस्या सुलझने की बजाय उलझती ही जा रही है। इसका आंकलन करें तो एक ही बात समझ में आती है कि जब तक दिल्ली-एनसीआर के आमलोग इसकी गंभीरता नहीं समझेंगे तब तक सुधार संभव नहीं है। दीपावली से पहले सोशल मीडिया पर लोगों के उपदेश इतने देखने को मिले थे कि मानो इस बार भारी बदलाव के साथ दिवाली मनाई जाएगी। लेकिन दीपावली के दिन धरातल पर दावा असरहीन नजर आया। हद तो तब हो गई जब दिवाली के बाद भी लगातार आतिशबाजी जारी है। ऐसा करके हम खुद अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।

हाल ही में जारी एक आंकड़े के मुताबिक इस समय अस्पताल में सांस के मरीजों की संख्या 30 से 40 प्रतिशत बढ़ चुकी है। अभी इसका बढ़ना लगातार जारी है। एनसीआर के ताजा एयर इंडेक्स की बात करें तो फरीदाबाद में 402, गाजियाबाद में 482, नोएडा में 452, ग्रेटर नोएडा में 473 और गुरुग्राम में 341 है। नतीजतन कभी अचानक गर्मी लगती है तो कभी ठंड, जिससे लोग समझ ही नहीं पा रहे कि कितने तापमान में रहें। कभी एसी चलाते हैं तो कभी पंखा तक बंद कर देते हैं।

अब वह बीमारियां सामने आ रही हैं जिनका नाम कभी सुना भी नहीं गया था। कम उम्र में मुधमेह, कैंसर व हार्टअटैक जैसी बीमारियों ने हमें आईना दिखाना शुरु कर दिया। लेकिन विचारणीय बात यह कि हम समझने को तैयार नहीं हैं। पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली को गैस चेम्बर तक कह दिया था। पिछले कुछ वर्षों से हम देखते आ रहे हैं कि दिवाली के बाद प्रदूषण बहुत परेशान करता है। आखों में जलन होना, गले में खराश रहने के अलावा थोड़ी दूर तक स्पष्ट दिखाई तक नहीं देता। बच्चों, बुजुर्गों व अस्थमा के मरीजों की तो मानों जान आफत आ गई है। इस खतरनाक प्रदूषण की वजह से बच्चों की स्कूलों की छुट्टी पड़ने लगी। हमें पता है कि हम अपनी ऐसी हरकतों से अपना जीवन तो खत्म कर रहे हैं। साथ ही आने वाली पीढ़ी को अपने हाथों से मारने जैसा काम कर रहे हैं।

अब प्रदूषण फैलने के दूसरे पहलू की बात करें तो केंद्र व राज्य सरकारों ने पराली न जलाने के लिए किसानों को लगातार जागरूक किया। साथ में पराली को नष्ट करने के लिए मुआवजे के अंतर्गत मशीनें भी दी जिसके लिए करोड़ों का बजट भी पारित किया गया था। लेकिन किसानों ने मशीनें नहीं खरीदी। हरियाणा में इसकी रोक के लिए तमाम आईएएस व आईपीएस की ड्यूटी भी लगाई गई थी। लेकिन आखिर कोई कब तक निगरानी रखेगा? जब हम ही सुधरने को तैयार नहीं हैं। बताया तो जाता है कि इस बार बढ़ते प्रदूषण का अहम कारण पराली जलाया जाना ही है।

दिल्ली-एनसीआर का मौजूदा हालत इतनी बुरी है कि यहां सांस लेने में इस कदर तकलीफ हो रही है जैसे किसी बड़ी फैक्ट्री के अंदर दम घुटता है। यदि आज यहां के किसी भी स्वस्थ व्यक्ति की जांच कराई जाए तो निश्चित तौर पर उसको फेफड़ों से संबंधित बीमारी निकलेगी। डॉक्टरों के अनुसार इन दिनों प्रदूषण की मात्रा बढ़ने के कारण ऑक्सीजन कम हो जाता है। जिस वजह अस्थमा के मरीजों की मौत तक हो जाती है। इसके अलावा जो प्रदूषण हमारी सांस में जाता है उससे पूरे शरीर का सिस्टम बेहद प्रभावित हो जाता है। पिछले वर्ष केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की ओर से एक रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमें 'ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स' के अनुसार गंभीर वायु प्रदूषण के चलते दिल्ली स्वास्थ के हिसाब से 65वें स्थान पर आ चुकी है। रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि अब यह शहर रहने योग्य नहीं बचा है। दिल्ली सरकार प्रदूषण पर नियंत्रण करने के लिए पहले दो बार वाहनों पर ऑड-ईवन का फार्मूला लागू कर चुकी है। इस बार भी 4 नवम्बर से 15 नवम्बर तक इसे लागू किया जाएगा। स्कूलों में मॉस्क बांटे जा रहे हैं। लेकिन निश्चत रूप से यह समस्या का स्थाई निदान नहीं है। सवाल वही कि जब तक हम मामले की गंभीरता को नहीं समझेंगे तब तक दिल्ली की आबोहवा कैसे सुधरेगी? बहरहाल, स्वास्थ जैसे मामलों में लापरवाही बरतना या हल्के में लेना हमें ही नुकसान पहुंचाता है। यदि हम अब भी नहीं सुधरे तो आने वाले समय में हालात और भी बुरे होने वाले हैं।


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