मंत्रिमंडल विस्तार में संतुलन साधने का प्रयास

मंत्रिमंडल विस्तार में संतुलन साधने का प्रयास


-सियाराम पांडेय 'शांत'

सरकारें मंत्रिमंडल का विस्तार करती रहती हैं। यह प्रक्रियागत मामला है लेकिन उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल का विस्तार अहम इसलिए है कि इसमें उत्तर प्रदेश के तीनों ही भूभाग पूर्वांचल, पश्चिमांचल और बुन्देलखंड के बीच क्षेत्रीय और जातीय संतुलन स्थापित करने की कोशिश की गई है। अपने बहुप्रतीक्षित मंत्रिमंडल विस्तार में बुधवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 21 और राजनीतिक सूरमाओं के नाम जोड़े हैं। इनमें 18 नये चेहरे हैं। इस मंत्रिमंडल के विस्तार में प्यार और नकार के दोनों ही रूप देखने को मिले हैं। राज्य के वित्तमंत्री राजेश अग्रवाल, सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह, वित्त राज्यमंत्री अनुपमा जायसवाल और अर्चना पांडेय को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने एक व्यक्ति-एक पद के सिद्धांत पर अमल करते हुए पहले ही इस्तीफा दे दिया था। मंत्रिमण्डल विस्तार से एक दिन पूर्व उनके इस्तीफे मंजूर भी हो गए थे। राजेश अग्रवाल के इस्तीफे की वजह यह रही कि वे 75 साल के हो चुके हैं। एक अपर सचिव से उनकी तनातनी भी मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते तल्ख करने में सहायक बनी। अपने बगावती तेवर की वजह से ओम प्रकाश राजभर पहले ही योगी कैबिनेट से बर्खास्त किए जा चुके थे। तीन मंत्री सांसद चुने जा चुके हैं।

अभी तक योगी सरकार में 20 कैबिनेट, 9 स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री और 13 राज्यमंत्री थे। मौजूदा कैबिनेट विस्तार में 6 कैबिनेट मंत्री, 6 स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री और 11 राज्यमंत्री बनाए गए हैं। कयासों में दिमाग खपा रहे राजनीतिक विश्लेषकों और योगी सरकार में अपनी जगह बनाने में जुटे कुछ नेताओं को फिर हताशा ही हाथ लगी है। कुछ नेताओं की लॉटरी भी लगी है। जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह मिली है, उनका पूरा इतिवृत्त और उनके काम का लेखा-जोखा मंगा लिया गया था। इस मंत्रिमण्डल विस्तार से राजनीतिक संतुलन बनाने और सामाजिक संदेश देने की भी कोशिश की गई है। पूर्वांचल, पश्चिमांचल और बुंदेलखंड को पर्याप्त महत्व दिया गया है। नीलकंठ तिवारी को राज्यमंत्री से प्रमोट कर स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बनाया गया है। साथ ही स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री के रूप में पांच नए चेहरों कपिलदेव अग्रवाल, सतीश द्विवेदी, अशोक कटियार, राम चौहान और रविन्द्र जायसवाल को अहमियत देकर सवर्णों, दलितों और पिछड़ों को साधने की कोशिश की गई है। महेंद्र सिंह, सुरेश राणा, अनिल राजभर को स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री के पद से प्रोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। जबकि पहली बार कमला रानी और रामनरेश अग्निहोत्री को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।

अनिल शर्मा, महेश गुप्ता, आनंद स्वरूप शुक्ला, जीएस धर्मेश, लाखन सिंह राजपूत, नीलिमा कटियार, चौधरी उदयभान सिंह, चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय, रामशंकर पटेल, अजित पटेल और विजय कश्यप को राज्यमंत्री बनाकर योगी सरकार ने समाज के सभी वर्गों को साधने की कोशिश की है। पंकज सिंह, अशोक कटारिया और विजय बहादुर पाठक के नाम भी मंत्री बनने की दौड़ में शामिल थे, लेकिन वे किन्हीं कारणों से शामिल नहीं किये जा सके। अगड़ा -पिछड़ा समीकरण को इस मंत्रिमंडल के विस्तार से मजबूती तो मिली ही है, पूरे राजनीतिक परिक्षेत्र में साफ-सुथरी सरकार के लिए बड़ी सर्जरी का संदेश भी गया है। कुछ चर्चित छवि के मंत्रियों को हटाकर मुख्यमंत्री ने अपने सहयोगियों को इस बात का संदेश भी दिया है कि पब्लिक परसेप्शन उनके लिए ज्यादा मायने रखता है। अनुपमा जायसवाल, धर्मपाल सिंह या फिर अर्चना पांडेय अपनी निष्क्रियता और कार्यशैली के लिए मुख्यमंत्री के लिए सिरदर्द बनी हुई थीं। स्वतंत्रदेव सिंह के इस्तीफे के बाद कुर्मी समाज की नीलिमा कटियार और अपना दल के आशीष पटेल तथा रामशंकर पटेल को मंत्रिमंण्डल में शामिल कर कुर्मी समाज को साधने की कोशिश इस विस्तार में साफ नजर आई है। गौरतलब है कि मंत्रिमंण्डल का विस्तार पहले ही होना था। लेकिन अरुण जेटली की गम्भीर हालात और कुछ नामों को लेकर खींचतान के चलते मंत्रिमण्डल विस्तार की तिथि टाल दी गयी थी। सरकार और संगठन के बीच हुई समन्वय बैठक में ही मंत्रिमण्डल में शामिल होने वाले नाम तय हो सके लेकिन विस्तार से पहले तक पत्तों का न खुलना इस बात का परिचायक है कि सरकार अपने काम से चौंकाने में कभी पीछे नहीं रहती। देर से ही सही, लेकिन सटीक चयन है। मंत्रियों को संदेश भी है कि काम न करने वाले और मनमानी चलाने वाले लोग कितने ही महत्वपूर्ण पद पर क्यों न हों, वे सरकार के प्रिय नहीं हो सकते। यहां जो काम करेगा, वही राज करेगा।


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