स्मृतिशेष : पत्रकारिता का 'सूर्य' अस्त

सियाराम पांडेय 'शांत'

वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह सूर्य नहीं रहे। 82 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। जाते-जाते अपने साथी पत्रकारों और पत्रकारिता की नई खेप को एक संदेश भी देते गए- 'कर चले हम फिदा जाने तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।' उन्होंने लंबी जिंदगी पाई। अच्छा होता कि वे शतायु होते। तो 18 साल और उनके अनुभवों का लाभ उनकी लेखनी के जरिए इस देश को मिलता। वे सही मायने में शानदार पत्रकार थे। संघ की विचारधारा से जुड़े जरूर थे लेकिन सभी दलों के बीच उनका समान आदर था। अपनी बेबाक लेखनी के लिए वे हमेशा याद किए गए। उनके लिखे लेख और संपादकीय लंबे समय तक पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करेंगे। जीते-जी तो उन्होंने समाज का काम किया ही, मरने के बाद यह काम अब उनका पार्थिव शरीर करेगा। किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के चिकित्सा छात्र उनके पार्थिव शरीर पर शोध करेंगे और विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित करेंगे। अच्छे डॉक्टर बनेंगे। लोकमंगल का यह भाव ही किसी पत्रकार का धन होता है। उन्होंने 82 साल के अपने सुदीर्घ जीवनकाल में अपने विचारों की थाती इस देश को सौंपने का काम अनवरत किया। वे अंतिम समय तक देश के अधिकांश बड़े-छोटे अखबारों में स्तंभ लेखन करते रहे। बुजुर्गों का घर के दरवाजे पर बैठना भी सहारा देता है। उनके निधन से पत्रकारिता जगत को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई तो संभव नहीं है लेकिन उनके विचार इस देश की सोच-समझ में निरंतर इजाफा करते रहेंगे।

राजनाथ सिंह 'सूर्य' को याद करने की चार प्रमुख वजहें हैं। एक तो यह कि वे राज्यसभा सांसद रहे और वहां रहते हुए उन्होंने पत्रकारिता की गौरव-गरिमा बढ़ाने में मील के पत्थर की भूमिका अदा की। वह 1996 से 2002 तक राज्यसभा सांसद रहे। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री का भी दायित्व निभाया। वे अच्छे नेता, बेहतर संगठक और किसी संस्थान के सुयोग्य संचालक थे। लेकिन उनकी पत्रकारीय छवि उनके नेता वाले गुण पर हमेशा भारी रही। वे जीवन के अंतिम समय तक पत्रकार थे। राजनीति कभी उनके अंदर के पत्रकार पर हावी नहीं हो पाई।

राजनाथ सिंह 'सूर्य' के शरीर में कंपन की शिकायत थी जिससे वे हमेशा जूझते रहे। लेकिन उनके विचारों और कार्य व्यवहार में कंपन कभी नहीं देखा गया। हर अवसर पर वे अपनी बात पूरी दृढ़ता से रखते रहे। सही मायने में वे जनसरोकारों के पत्रकार थे। जनहित और समाज हित से जुड़े मुद्दों को निर्भीकता और निष्पक्षता से अभिव्यक्त करना उनकी विशेषता थी। राजनाथ सिंह 'सूर्य' ने पत्रकार के तौर पर विभिन्न समाचार पत्रों में कार्य किया। स्तंभकार के रूप में उनकी विशिष्ट पहचान थी। 3 मई 1937 को अयोध्या से छह किलोमीटर दूर ग्राम जनवौरा के एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे राजनाथ सिंह 'सूर्य' की प्रारम्भिक शिक्षा आर्यसमाज के विद्यालय में हुई। बाल्यकाल में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आ गए थे। संघ परिवार से मिले दायित्व उन्होंने प्रमुखता से निभाए। गोरखपुर विश्वविद्यालय से 1960 में एम.ए. करने के बाद वह तत्कालीन प्रान्त प्रचारक मुरलीधर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य भाऊराव देवरस की प्रेरणा से संघ के प्रचारक बने। राजनीतिक सोच और वैचारिक स्पष्टता की पूंजी की बदौलत उन्होंने न केवल पत्रकारिता क्षेत्र में बल्कि राजनीति में भी देश को अपनी प्रतिभा व क्षमता का लोहा मनवाया। हिन्दी पत्रकारिता क्षेत्र में सुदीर्घ अनुभव के कारण उनका नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहा।

राजनाथ सिंह 'सूर्य' ने पत्रकारिता की शुरुआत हिन्दुस्थान समाचार से की थी। वह लखनऊ के ब्यूरो प्रमुख रहे। इसके बाद कई साल तक वे 'आज' समाचार पत्र में बतौर ब्यूरो प्रमुख अपनी सेवाएं देते रहे। 1988 में वह 'दैनिक जागरण' के सहायक सम्पादक बने और बाद में 'स्वतंत्र भारत' के सम्पादक भी रहे। स्वतंत्र भारत के बाद उन्होंने स्वतंत्र रहकर ही पत्रकारिता की। उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से समसामयिक मुद्दों पर अपनी लेखनी को धार दिया। राजनाथ सिंह 'सूर्य' के दो बेटे और एक बेटी हैं। उनकी पुस्तक 'अपना भारत' सहज ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इसमें उन्होंने 'मजहबी उन्माद में वोट देना यानी आत्मघात', 'चुनाव आस्था बनाम मोल भाव के बीच', 'राम मंदिर बनाम राम जन्मभूमि मंदिर', 'मुस्लिम मतदाता किधर और क्यों', 'डॉक्टर लोहिया ने कहा था गोली चलाने वाली सरकार इस्तीफा दे' जैसे अहम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी है। संप्रति वे हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक के रूप में समाचार एजेंसी को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे। राजनाथ सिंह 'सूर्य' का निधन पत्रकारिता जगत की बहुत बड़ी क्षति है।

नानाजी देशमुख के करीबी रहे राजनाथ सिंह 'सूर्य' ने नानाजी के देहदान से प्रभावित होकर उसी समय अपना देहदान कर दिया था। श्रद्धांजलि की औपचारिकता के बाद उनकी पार्थिव देह किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी को सौंप दी गई है जहां चिकित्सा विज्ञान के छात्र उनके शरीर को चीर-फाड़ कर मानव देह की संरचना को समझेंगे और जन स्वास्थ्य के लिए कुछ अच्छा सोच और कर सकेंगे। 'सूर्य' अपनी वैचारिक और सैद्धांतिक अवधारणाओं के धरातल पर तो अमर थे ही, देहदान कर वे पूरे अमर हो गए। राजनाथ सिंह का जाना महज एक पत्रकार का निधन भर नहीं है। वह जितने अच्छे पत्रकार थे, उतने ही अच्छे वक्ता और उससे भी अच्छे इंसान थे। उनमें गजब का सेंस आफ ह्यूमर था। जो भी उनके संपर्क में आया, उनका हो गया।


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