तीन तलाक बिल पर कांग्रेसी अड़ंगा

तीन तलाक बिल पर कांग्रेसी अड़ंगा

-डॉ. कविता सारस्वत


तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस की अड़ंगेबाजी के कारण एक बार फिर मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज) बिल- 2017 (तीन तलाक विधेयक) राज्यसभा में अटक गया। दलितों और पिछड़ों को हितों को साधने वाले विधेयकों को पारित कराने के बाद मानसून सत्र में सरकार काफी उत्साहित थी। उसे लगता था कि वह तीन तलाक विधेयक को भी राज्यसभा से पारित करा लेगी। लेकिन विपक्ष ने सरकार के इस इरादे पर पानी फेर दिया। सरकार इस विधेयक को पारित कराने को लेकर किस हद तक उत्सुक थी, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि गुरुवार को ही केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक में तीन संशोधनों को भी मंजूर कर लिया था। ये तीनों संशोधन उन्हीं बिंदुओं पर आधारित हैं, जिस पर पहले विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस ने आपत्ति जताई थी और जिसकी वजह से पिछले सत्र में यह विधेयक राज्यसभा में अटक गया था।

विधेयक में संशोधन शामिवल करने के बावजूद पिछले शुक्रवार को सरकार अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद इसे राज्यसभा में नहीं पारित करा सकी। कांग्रेस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग को लेकर अड़ी रही, जिसके कारण सदन में इसको पेश करने पर सहमति नहीं बन सकी। अब इस विधेयक को संसद के शीतकालीन सत्र में लाया जा सकता है। यह एक तथ्य है कि राज्यसभा में एनडीए सरकार के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसलिए राज्यसभा में कोई भी विधेयक तभी पारित कराया जा सकता है, जब विपक्ष भी उसके प्रति सहमत हो। लेकिन कांग्रेस शुरू से ही तीन तलाक विधेयक का विरोध करती रही है। बजट सत्र में भी इस विधेयक के लोकसभा में पारित हो जाने के बावजूद कांग्रेस ने राज्यसभा में अड़ंगा लगा दिया था और अपनी ओर से संशोधन करने की शर्त रखी थी।

उम्मीद की जा रही थी कि मानसून सत्र में इन संशोधनों को शामिल कर लेने पर कांग्रेस इस विधेयक को पारित कराने में सरकार की मदद कर सकती है। इसीलिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कांग्रेस की शर्त के मुताबिक संशोधन को मंजूर भी कर लिया था, लेकिन इस बार कांग्रेस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की बात को लेकर अड़ गई। राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए हुए चुनाव में मिली करारी हार के बाद विपक्ष के पास सरकार को चोट पहुंचाने का यह एक बड़ा मौका था और इसे कांग्रेस ने आसानी से लपक भी लिया। और विधेयक को राज्यसभा में अटकाने में सफल रही।

तीन तलाक विधेयक के राज्यसभा में अटकने का मुद्दा एक बार फिर राजनीति को गर्मी दे सकता है। इस बात के संकेत राजसभा की बैठक स्थगित होने के तुरंत बाद ही तब मिले, जब केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर तीखे शब्दबाण छोड़े। उन्होंने कहा कि शाहबानो से लेकर सायरा बानो के तत्काल तीन तलाक के मसले तक कांग्रेस की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। मुस्लिम पुरुषों के तुष्टीकरण के लिए उसे मुस्लिम महिलाओं का शोषण भी मंजूर है। बीजेपी का यह भी आरोप है कि कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं के हित के बारे में कभी परवाह नहीं करती। उसकी सोच सिर्फ मुस्लिम पुरुषों को खुश रखने की है, ताकि चुनाव के दौरान मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नियों को डरा-धमकाकर कांग्रेस के पक्ष में वोट करवा सकें। बीजेपी का यह भी आरोप है इस विधेयक पर पहले भी कांग्रेस ने ही अड़ंगा लगाया था और अब कांग्रेस की शर्ताबिक संशोधन करने के बावजूद वह विधेयक प्रवर समिति के पास भेजकर हटाने की कोशिश करती रही।

निश्चित रूप से बीजेपी इस मसले को भुनाने का प्रयास करेगी। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर संसद में सरकार अध्यादेश भी ला सकती है और पूरी तैयारी के साथ इसे शीतकालीन सत्र में भी पेश किया जा सकता है। माना जा रहा है कि शीतकालीन सत्र तक 2019 के चुनाव के मद्देनजर प्रस्तावित गठबंधनों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी। ऐसे में सरकार अपनी ओर से पूरी तैयारी करके इस विधेयक को राज्यसभा में पारित भी करा सकती है। हालांकि राज्यसभा की मंजूरी के बाद विधेयक को लोकसभा से फिर पारित कराना पड़ेगा। इसके बाद ही यह कानून की शक्ल ले सकेगा।

जहां तक कांग्रेस के सुझाव पर विधायक ने किए गए संशोधनों की बात है, तो पहला बड़ा बदलाव तो यही है कि भले ही तीन तलाक कानून पहले की तरह गैरजमानती बना रहेगा, लेकिन आरोपित जमानत मांगने के लिए सुनवाई से पहले भी मजिस्ट्रेट से गुहार लगा सकेगा। बीजेपी का कहना है कि यह प्रावधान इसलिए जोड़ा गया है, ताकि मजिस्ट्रेट पत्नी की बात को सुनने के बाद जमानत देने की बात पर विचार कर सकें। इसी तरह इस विधेयक में किए गए दूसरे संशोधन में स्पष्ट किया गया है कि पुलिस उसी हालत में प्राथमिकी दर्ज करेगी, जब पीड़ित पत्नी, उसके किसी संबंधी (मायके पक्ष के) या शादी के बाद रिश्तेदार बने किसी व्यक्ति (ससुराल पक्ष के) द्वारा पुलिस में शिकायत की जाती है। ऐसा होने से उन चिंताओं का निराकरण हो सकेगा कि कोई पड़ोसी अन्य संज्ञेय अपराधों की तरह इन मामलों में प्राथमिकी दर्ज न करा सके। इस संशोधन की वजह से कानून के दुरुपयोग की आशंका कम हो सकेगी। विधेयक में किया गया तीसरा संशोधन तीन तलाक के अपराध को समझौते के योग्य बनाता है। इस संशोधन के मुताबिक मजिस्ट्रेट पति और पत्नी के बीच विवाद सुलझाने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। समझौते के योग्य अपराध में दोनों पक्षों के पास मामले को वापस लेने की आजादी होती है।

निश्चित रूप से इन संशोधनों से तीन तलाक कानून को पहले की तुलना में कुछ नरम कर दिया गया है, लेकिन जिस तरह विपक्षी पार्टियां अड़ंगा लगा रही हैं, उससे यह भी स्पष्ट है कि शीतकालीन सत्र में भी सरकार के लिए इस विधेयक को पारित करा पाना बहुत आसान नहीं होगा। कांग्रेस के रवैये के कारण यह विधेयक भले ही एक बार फिर अटक गया है, लेकिन जानकारों का कहना है कि बीजेपी इसका राजनीतिक लाभ उठा सकती है। एक ओर तो अध्यादेश लाकर वह पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को यह संदेश देने में सफल हो सकती है कि वह तीन तलाक जैसी कुप्रथा को खत्म करने को लेकर प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही वह कांग्रेस पर मुस्लिम पुरुषों के तुष्टीकरण करने की बात को भी प्रचारित कर सकती है। अगर बीजेपी ऐसा करने में सफल हो गई, तो निश्चित रूप से आने वाले चुनावों में पार्टी को मुस्लिम महिलाओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन मिल सकता है। वहीं खुद कांग्रेस से मुस्लिम महिलाओं के वोट बिदक सकते हैं। हालांकि आगे क्या होगा, यह तो अध्यादेश जारी होने तथा शीतकालीन सत्र में विधेयक पेश किए जाने के बाद के हालात पर ही निर्भर करेगा।


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