लालफीताशाही में कहीं खो न जाएं पहाड़ी मैना के मीठे बोल

लालफीताशाही में कहीं खो न जाएं पहाड़ी मैना के मीठे बोल


खाली हाथ : दस करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी सरकार को न संख्या पता न संवर्धन का कारगर तरीका
रायपुर (संजय दुबे)। बस्तर के जंगलों में केवल गोलियों की आवाजें ही नहीं आती बल्कि घनघोर जंगलों में कभी कभी कुछ ऐसी इंसानी आवाजें भी आती हैं जो इंसानों जैसी लगती जरूर हैं मगर इंसानों की नहीं होती। यह आवाज किसी भूत-प्रेत की नहीं, बल्कि बस्तर की खूबसूरत वादियों में सदियों से गूंजते चले आ रहे प्यारी चिड़िया के हैं, जिसे पहाड़ी मैना या बस्तर की मैना के नाम से जाना जाता है।
बस्‍तर की दुर्लभ पहाड़ी मैना छत्‍तीसगढ़ की राजकीय पक्षी भी है। बोलती हैं तो ऐसा लगता नहीं कि कोई पक्षी बोल रहा हो बल्कि इंसानी आवज की हुबहू नकल करती हैं। ऐसा लगता है जैसे रिकार्ड की हुई आवाज चल रही हो, आप जो बोलिए आपकी बोली की हू-ब-हू नकल हाजिर कर देती हैं। खुले आसमान में चहचहाती, उड़ती, स्‍वच्‍छंद पीली चोंच वाली काली मैना की खुबसूरती ही उसकी सबसे बड़ी दुश्‍मन बन गई। बड़े पैमाने पर तस्करी और शिकार की वजह से उसकी संख्‍या लगातार घट रही है और आज इस दुर्लभ पक्षी का अस्तित्व खतरे में है। हालांकि उसके विलुप्‍त होने का खतरा भांपकर सरकार ने पहाड़ी मैना का प्रजनन बढ़ाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है| इसके लिए जगदलपुर स्थित वन विद्यालय में एक बड़ा पिंजरा बनवाकर उसमें मैना के चंद जोड़ों को रखा गया है। दुर्भाग्य यह कि वन विभाग के प्राणी विशेषज्ञ आज तक यह तय नहीं कर पाए कि इनमें से नर कौन है और मादा कौन। बीते पांच साल में पचास लाख रुपये से ज्यादा की राशि खर्च करने के बाद भी संरक्षित की गई पांच मैना में से केवल दो ही जिंदा हैं।
राजकीय पक्षी का दर्जा मिलने के 16 साल से अधिक का समय बीतने के बाद भी बस्तर की पहाड़ी मैना का संवर्धन नहीं हो पाया है। अब तो यह पहले की तरह जंगलों में भी नजर नहीं आतीं। ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ी मैना अब कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, कोलेंग, तीरिया प्रक्षेत्र के अलावा बैलाडीला की पहाड़ियों और गंगालूर इलाके तक सिमट कर रह गई हैं। तेजी से विलुप्त हो रही पहाड़ी मैना इन इलाकों में भी यदा-कदा ही दिखाई देती हैं। करीब चार वर्ष पहले तक वन विभाग के अधिकारी यह दावा करते थे कि बस्तर के जंगलों में 400 से अधिक पहाड़ी मैना हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासियों का कहना है कि अब यहां 40 से अधिक मैना नहीं होगी। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी मैना की संख्या को लेकर कोई दावा करने से बचते नजर आ रहे हैं।
वन विभाग के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) शैलेन्द्र कुमार सिंह ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में स्वीकार किया कि बस्तर में पहाड़ी मैना की वास्तविक संख्या के बारे में विभाग को जानकारी नहीं है। इसकी वजह वे यह बताते हैं कि आज तक राज्य में पक्षियों की गणना नहीं हो पाई है। उन्होंने जानकारी दी कि पक्षियों की गणना के लिए मुंबई की एक कंपनी बर्ड काउंट इंडिया को काम सौंपा गया है| इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही पहाड़ी मैना की स्थिति के बारे में बताया जा सकता है। इस कंपनी को यह काम कब दिया गया, कितने में दिया गया और रिपोर्ट कब आएगी, इसकी जानकारी राज्य के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) को भी नहीं है। दूसरी ओर, बस्तर संभाग के मुख्य वन संरक्षक वी श्रीनिवास राव इस बात से साफ इनकार करते हैं कि पहाड़ी मैना की गणना के लिए किसी कंपनी को काम दिया गया है। उनके मुताबिक पक्षियों की गणना करना संभव नहीं है। उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि बस्तर में काफी तादाद में पहाड़ी मैना हैं और उनकी ​संख्या बढ़ रही है। लेकिन अगर इतनी संख्या में पहाड़ी मैना हैं तो दिखाई क्यों नहीं देतीं, इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वास्तव में पहाड़ी मैना घने जंगलों में बरगद, पीपल और गुलर जैसे विशालकाय वृक्षों की उंची टहनियों पर पत्तों के बीच छिपी रहती हैं। वन विभाग के अधिकारी यह दलील भी देते हैं कि कई बार पहाड़ी मैना आसपास के सीमावर्ती राज्यों के जंगलों में चली जाती हैं| उनके यदा-कदा दिखने की यह भी वजह हो सकती है।
बहरहाल, सवाल यह भी उठता है कि राजकीय पक्षी होने और उसका अस्तित्व खतरे में होने के बावजूद वन विभाग ने कभी इस पर वैज्ञानिक अध्ययन क्यों नहीं करवाया। पहाड़ी मैना को विलुप्त होने से बचाने के लिए 10 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च के बाद भी कोई योजना कारगर क्यों नहीं हो सकी, इसकी भी समीक्षा करने की आवश्यकता है। लालफीताशाही की अगर यही स्थिति बरकरार रही तो आने वाले कुछ वर्षों में पहाड़ी मैना केवल चित्रों में सिमट कर रह जाएगी।

Share it
Share it
Share it
Top