पी. चिदंबरम : जैसी करनी-वैसा फल

पी. चिदंबरम : जैसी करनी-वैसा फल

सियाराम पांडेय ' शांत'

'जैसी करनी, वैसा फल, आज नहीं तो निश्चय कल।' भारत के पूर्व वित्तमंत्री एवं गृहमंत्री पी. चिदंबरम के मामले में अक्षरश: सही साबित हुई है। गिरफ्तारी से बचने के लिए 73 वर्षीय पी. चिदंबरम ने जितनी मशक्कत की, उतना ही वे सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के जाल में फंसते चले गए। वे गिरफ्तार भी किए गए और चार दिन की सीबीआई हिरासत में भेजे भी गए। जिस कोर्ट परिसर का उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री रहते उदघाटन किया था, उसी कोर्ट के कटघरे में उन्हें खड़ा होना पड़ा। इसीलिए कहते हैं कि व्यक्ति नहीं, समय बलवान होता है। पुत्र मोह हमेशा भारी पड़ता है। 'सब दिन होत न एक समान। ' पी. चिदंबरम उसके अपवाद नहीं हो सकते।

न्याय और कानून की दुहाई देना आसान है लेकिन कानून की चिंता अपराध करते करते वक्त क्यों नहीं की जाती, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। पी. चिदंबरम ने देश के वित्त और गृहमंत्री रहते कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें कठघरे में भी खड़ा होना पड़ सकता है। जिस कोर्ट रूम का उन्होंने उद्घाटन किया था, वही कोर्ट रूम गिरफ्तारी के बाद छोटा नजर आया। कोर्ट रूम छोटा हो सकता है लेकिन असल मूल्य तो वहां होने वाले निर्णयों से है। अगर चिदंबरम ने उचित निर्णय लिए होते तो शायद उन्हें यह दिन न देखने पड़ते।

सार्वजनिक जीवन का आधार सादगी, शुचिता और सद्व्यवहार ही होता है। ईमानदारी, बहादुरी, जिम्मेदारी ही पदस्थापित व्यक्ति की गरिमा में चार चांद लगाते हैं। जितना बड़ा पद होता है, वह उसपर बैठने वाले से उतनी ही जिम्मेदारी की अपेक्षा करता है। राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से पहले किसी राजा को उससे जुड़ी 32 पुतलियों के जवाब देने होते हैं। 32वीं पुतली जब राजा के सवालों से असंतुष्ट नहीं होती तो वह सिंहासन ही लेकर उड़ जाती है। ' न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। 'पूर्व वित्तमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को बचाने के लिए उनके वकीलों ने खूब दलील दी लेकिन वे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश पर प्रभाव नहीं डाल पाए। जिस तरह गिरफ्तारी से बचने की तमाम कोशिशों के बाद भी चिदंबरम खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो के चंगुल से बचा नहीं पाए, कुछ वैसा ही उनके साथ कोर्ट में भी हुआ। कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और विवेक तन्खा जैसे दिग्गज वकीलों के तर्क भी उन्हें सीबीआई की हिरासत में जाने से रोक नहीं पाए। 305 करोड़ के आईएनएक्स मीडिया भ्रष्टाचार मामले में पूर्व वित्त एवं गृहमंत्री पी चिदंबरम चार दिन की सीबीआई हिरासत में भेज दिए गए। हिरासत में सीबीआई द्वारा की जाने वाली पूछताछ कोे भी विशेष न्यायाधीश ने उचित ठहरा दिया लेकिन साथ ही सीबीआई को इस बात की सलाह भी दी कि वह चिदंबरम की गरिमा का हनन न होने दे। हिरासत के दौरान उनकी नियमित स्वास्थ्य जांच करवाए और रोज आधे घंटे तक उन्हें उनके परिजनों और वकीलों से मिलने दे। यह अदालत का मानवीय पक्ष है लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि जो अपनी नजर में ही गिर जाए, उसके लिए व्यक्तिगत गरिमा के हनन का कोई मतलब नहीं रहता। सीबीआई की ओर से सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि जांच एजेंसी चिदंबरम को इकबालिया बयान देने के लिए बाध्य नहीं कर रही लेेकिन उसे मामले की तह तक जाने का हक है। उनका तर्क था कि पी . चिदंबरम बहुत ज्यादा होशियार हैं। उनमें जांच में सहयोग नहीं करने की क्षमता है।

पी. चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे तब 2007 में आईएनएक्स मीडिया समूह को विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड की मंजूरी दिलाने में बरती गई कथित अनियमितताओं को लेकर सीबीआई ने 15 मई 2017 को एक प्राथमिकी दर्ज की थी। यह मंजूरी 305 करोड़ रुपये विदेशी धन प्राप्त करने के लिए दी गई थी। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने इस संबंध में धन शोधन मामला दर्ज किया। 16 फरवरी 2018 को सीबीआई ने पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को चेन्नई हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया था। 23 मार्च 2018 को कार्ति को दिल्ली उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई। 30 मई 2018 को पी. चिदंबरम ने दिल्ली उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत मांगी। 23 जुलाई 2018 को वह ईडी द्वारा दर्ज धन शोधन मामले में अग्रिम जमानत के लिए उच्च न्यायालय पहुंचे। 25 जुलाई 2018 को अदालत ने उन्हें दोनों प्रकरणों में गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दे दिया। 25 जनवरी 2019 को अदालत ने दोनों मामलों में उनकी अग्रिम जमानत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा। 11 जुलाई 2019 को शीना बोरा हत्या मामले में आरोपी और आईएनएक्स मीडिया की कर्ताधर्ता इंद्राणी मुखर्जी मामले में सरकारी गवाह बन गईं। 20 अगस्त 2019 को उच्च न्यायालय ने पी. चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए तीन दिनों तक आदेश पर रोक लगाने के उनके अनुरोध को भी ठुकरा दिया। 21 अगस्त 2019 को पी. चिदंबरम ने हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनके वकीलों ने उसी दिन मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कराने की कोशिश की लेकिन उच्चतम न्यायालय ने तुरंत सुनवाई से इनकार किया और मामले को 23 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। सीबीआई ने रात में कांग्रेस नेता को गिरफ्तार कर लिया। सीबीआई की इस सक्रियता पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए। 22 अगस्त 2019 को पी. चिदंबरम को दिल्ली में सीबीआई की विशेष अदालत के समक्ष पेश किया गया, जिसने उन्हें चार दिनों की सीबीआई हिरासत में भेज दिया।

कांग्रेस का तर्क है कि भाजपा ने सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को बदला लेने वाला विभाग बना दिया है जबकि भाजपा का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है। भाजपा तो भ्रष्टाचार के खिलाफ है लेकिन कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपी का बचाव कर रही है। कांग्रेसी कह रहे हैं कि अमित शाह बतौर गृहमंत्री पी. चिदंबरम से बदला ले रहे हैं। सोराबुद्दीन मामले में जिस समय अमित शाह को गिरफ्तार किया गया था तब देश के गृहमंत्री पी. चिदंबरम ही थे। इसे विधि की विडंबना ही कहा जाएगा कि जब चिदंबरम पकड़ेे गए तो गृहमंत्री अमित शाह हैं। किसने किसको फंसाया, यह ज्यादा अहमियत नहीं रखता लेकिन चर्चा तो इस बिंदु पर होनी चाहिए कि कांग्रेस राज में कितने घोटाले हुए। दूरसंचार घोटाला, हवाला कांड, हर्षद मेहता कांड, सेंट किट्स कांड, शेयर घोटाला, सांसद खरीद कांड, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, लक्खूू भाई पाठक रिश्वत कांड, अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर रिश्वत मामला, यूरिया घोटाला जैसे कई घोटाले आज भी चर्चा के केंद्र में हैं। 900 करोड़ रुपये से अधिक के चारा घोटाले में लालू यादव आज भी जेल में हैं। चिदंबरम चाहते तो कार्रवाई कर सकते थे लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। आज जब खुद उनपर भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के आरोप लग रहे हैं तो वे खुद को दूध का धुला बता रहे हैं। वे जिस तरह पैंतरे पर थे, उसे देखते हुए तो नहीं लगता कि उन्हें अपने कृत्य पर कोई मलाल भी है। कांग्रेस जिस तरह भ्रष्टाचार के आरोपी का साथ दे रही है। देशभर में धरना-प्रदर्शन कर रही है, उसे भ्रष्टाचार का समर्थन और पृष्ठपोषण नहीं तो और क्या कहा जाएगा? कांग्रेस दरअसल मुद्दों की तलाश में कीचड़ से कीचड़ साफ करने की कवायद कर रही है और कीचड़ उछालने व छवि खराब का आरोप दूसरे पर लगा रही है। यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है।


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