देवबंद में सज गया है श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी का दरबार, मेला शुरू


देवबंद का श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मेला है देश की एकता और सौहार्द का प्रतीक

आदि-अनादिकाल से देवबंद में स्थित है श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी शक्तिपीठ

पौराणिक एवं विश्व प्रसिद्ध है देवबंद का श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी शक्तिपीठ

मंदिर में गर्भगृह के कपाट और नेत्र बंद कर पुजारी रोजाना मां को कराता है स्नान और शयन

देवबंद (गौरव सिंघल)। भारत अपनी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परम्पराओं के परिचय के लिए किसी का मोहताज नहीं हैं। विभिन्न धर्मो और संप्रदायों के धार्मिक और पारंपरिक त्यौहार एवं मेले देश की एकता और सौहार्द के प्रतीक हैं उन्ही में से उत्तरी भारत के ऐतिहासिक, पौराणिक एवं विश्व प्रसिद्ध लाखों लोगाें की आस्था एवं श्रद्धा का प्रतीक देवबंद का श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी शक्तिपीठ और यहां पर हर वर्ष देवीकुंड के मैदान पर लगने वाला विशाल मेला सांप्रदायिक सौहार्द की बरसों से मिसाल बना हुआ है। बुधवार 17 अप्रैल को मेले का विधिवत् रुप से उद्घाटन सहारनपुर के डीएम आलोक पाड़ेेेे ने फीता काटकर और शांति के प्रतीक सफेद कबूतर और गुब्बारें आसमान में उडाकर किया।

देवी शक्तिपीठ पर श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी का दरबार, खेल-तमाशे, झूले और सर्कस आदि दुकानें भी अब पूरी तरह से सज गई है। मंदिर के पास प्रसाद और खेल-खिलौनों की दुकानों पर भारी भीड़ उमडनें लगी है। इस बार भारतीय शक-संवत के अनुसार 18 अप्रैल 'चैत्र चतुदर्शी चौदस' देवी की पूजा का मुख्य दिन है। पूजा के मुख्य दिन एक लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के देश के कोने-कोने, दूरस्थ इलाकों और आस-पास के नगरों, गांवों से यहां पहुंचकर देवी का दर्शन कर आर्शीवाद प्राप्त करने और प्रसाद चढाकर मन्नतें मांगने की संभावना है। मंदिर पर वैसे तो पूजा की परंपरा तीन दिनों की है लेकिन मुख्य पूजा के दिन मेले में सबसे ज्यादा भीड़ रहती है। देवबंद शक्तिपीठ पर विराजमान देवी मां के दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में ऐसा अटूट विश्वास है कि मां बाला सुंदरी अपने सभी भक्तों द्वारा मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूरी करती है। चौदस की रात्रि में यहां मेलापंडाल में विशाल भगवती जागरण का आयोजन किया जाएगा। देवबंद शक्तिपीठ की एक खासियत यह भी हैं कि देश के प्राचीन समय में छूआ-छूत के चलते समय भी इस पीठ के द्वार कभी दलितों के लिए बंद नहीं हुए और मां का आंचल हमेशा उनके लिए खुला रहा। जिसका उदाहरण यह हैं कि गर्भगृह के समक्ष स्थापित मां के वाहन (सिंह) की प्रतिमा की सेवा एक बाल्मीकि परिवार द्वारा की जाती हैं वहीं यहां नगाड़े बजाने की परंपरा में अक्सर मुस्लिम धर्म के लोगों का सहयोग रहता हैं। नगरपालिका परिषद देवबंद के तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस मेले में मां भगवती जागरण, बेबी शो, आल इंडिया मुशायरा, कव्वाली, कवि सम्मेलन समेत अनेकों भव्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है। यह मेला यहां करीब 20 दिन तक चलेगा। इस बार मेला चेयरमैन सभासद मनोज सिंघल को बनाया गया है।

मां भवानी राज राजेश्वरी श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी महाशक्ति जगदंबा का रूप है। ब्रहा-विष्णु और महेश तीन पुर (शरीर) जिनमें है, वह त्रिपुर बाला है। तंत्रसार के मुताबिक मां राजेश्वरी त्रिपुर बाला सुंदरी प्रातः कालीन सूर्य मंडल की आभा वाली है। इनकी चार भुजा एवं तीन नेत्र है। वह अपने हाथ में पाश, धनुष-बाण और अंकुश लिए हुए है तथा उनके मस्तक पर बालचंद्र सुशोभित है। मां त्रिपुर बाला सुंदरी ने 105 ब्रहमांडों के अधिपति भंडासुर का वध किया जबकि चौदह भुवन का एक ब्रहमांड होता है और एक ब्रहमांड में चौदह लोक होते है। मां श्री त्रिपुर बाला सुंदरी देवी की उपासना करने वालो को भोग और मोक्ष दोनो प्राप्त होेते है। मां त्रिपुर बाला सुंदरी ने भगवती लक्ष्मी की आराधना की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवती लक्ष्मी ने अपना उपनाम 'श्री' मां त्रिपुर बाला सुंदरी को अपने नाम से पहले धारण करने को कहा। इसीलिए उन्हें श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी कहा जाता है।

देवबंद की वर्तमान स्थिति से उसके गौरवशाली अतीत का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है लेकिन देवबंद एक प्राचीन एवं महत्वपूर्ण नगर है इसका प्रमाण यहां के ऐतिहासिक एवं प्रसिद्ध श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी शक्तिपीठ से जरूर मिलता है। कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां के गहन वन में देवी दुर्गा के निवास के कारण यह नगर कभी 'देवीवन' के नाम से प्रसिद्ध था। कालांतर में जो 'देवी बंद' और फिर देवबंद कहा जाने लगा। एक अन्य मतानुसार 'दुर्ग' नाम के असुर का इसी स्थान पर संहार करने के कारण दुर्गा देवी की देवताओं द्वारा वंदना करने के कारण यहां का नाम 'देवी वन्दना' स्थल पड़ा जो बाद में 'देवीवन्दन' और फिर देवबंद हो गया। पौराणिक मत है कि देवताओं के बहुत अधिक संख्या में निवास करने के कारण इस स्थान को देववृन्द कहा जाता था, जो बाद में देवबंद हो गया। देवी का यह शक्तिपीठ वर्तमान में किसने बनवाया इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है लेकिन राजा रामचंद्र मराठा द्वारा मंदिर के अंतिम जीणोद्धार की बात कही जाती है। गर्भगृह के तीन चौथाई भित्ति चित्र नष्ट हो चुके है। नगर का यह शक्तिपीठ कितना प्राचीन है यह तो निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता किंतु यह कम से कम 200 वर्ष पुराना अवश्य है। महाभारत काल में पवित्र गंगा के यहां से होकर प्रवाहित होने का विवरण मिलता है। घने जंगलों के बीच प्रकृति की सुरम्य गोद में पतित पावनी गंगा के तट की इस मनोरम जगह पर पाण्डवों ने द्रौपदी के साथ अज्ञातवास के कुछ दिन यहां बिताए थे। उसी दौरान अर्जुन ने इस शक्तिपीठ की साधना भी की थी। समय के साथ अनेक साम्राज्य और धार्मिक संप्रदाय आये किंतु इस शक्तिपीठ की मान्यता लगातार बढ़ती ही चली गई। ऐसी मान्यता है कि यहां स्थापित प्रतिमा एकाएक प्रकट हुई थी। यह प्राकृतिक रूप में है और हमेशा चांदी के गिलासनुमा बर्तन से ढकी रहती है। पुजारी प्रतिदिन आंखे व कपाट बंद करके मां को स्नान आदि कराकर पुनः उसी बर्तन से ढक देते है और कहीं पर किसी भी शक्तिपीठ में देवी मां का ऐसा रूप देखने को नहीं मिलता है।

कहा जाता है 40 वर्ष पूर्व नेत्र बंद न करने पर शक्तिपीठ के तत्कालीन पुजारी पं. ज्योति प्रसाद की नेत्र ज्योति चली गई थी। एक पुरानी मान्यता के मुताबिक इस शक्तिपीठ का संबंध उस घटना से जुड़ा है जब भगवान शंकर सती को कंधे पर उठाए लिए जा रहे थे तब जिन स्थानों पर विभिन्न अंग गिरे वहीं विभिन्न पीठ स्थापित हुए जिनमें से देवबंद का श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी शक्तिपीठ भी एक है। मंदिर की स्थापना के विषय में मार्कण्डेय पुराण में लिखा है कि एक बार भंडासुर राक्षस से त्रस्त जनता के प्राणो की रक्षा के लिए इस स्थान पर देवताओं ने महामाया से अनुनय की थी। लोगों की प्रगाढ़ आस्था का केंद्र बना यह शक्तिपीठ अपने भक्तों और श्रद्धालुओं की संख्या को गंगा की अविरल धारा की भांति लगातार बढ़ाता ही जा रहा है। देवबंद शक्तिपीठ की हमेशा से ही यह एक रहस्यपूर्ण बात रही है कि शक्तिपीठ पर चैत्र सुदी (चौदस) जो की देवी की मुख्य पूजा का दिन है उससे एक दिन पूर्व एवं एक दिन बाद तेज हवाऐं, आंधी-तूफान एवं तेज वर्षा होती है तथा जबरदस्त बिजलियां भी कड़कती है। क्षेत्र के बड़े-बूढों का कहना है कि देवी मां के शक्तिपीठ में आने और जाने के समय ऐसा सदियों से होता चला आ रहा है। जबकि नगर के बुद्धिजीवी लोगों का कहना है कि आंधी एवं वर्षा श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी के आगमन पर नहीं बल्कि इस दिन उनकी बहनों के यहां के शक्तिपीठ में आने और फिर वापस जाने के समय आती है। उनका कहना है कि देवी श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी तो हमेशा ही शक्तिपीठ में विराजमान रहती है। शक्तिपीठ में देवी का स्वरूप लगभग सात सेमी ऊंची प्रतिमा के प्राकृत रूप में विराजमान हैं। इन दिनों दस गुणा पंद्रहा सेमी की चांदी की शिवलिंगाकार आकृति (पिंडी) से आवृत है। मंदिर के सिंह द्वार के बाहर 18 बीघे भूमि में एक प्राचीन एवं मनोरम सरोवर है। जो 'देवीकुंड' के नाम से विख्यात है। श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी शक्तिपीठ की पौराणिकता का एक प्रमाण मंदिर के निकासी द्वार पर लगे पत्थर के लेख से भी मिलता है। इस पत्थर पर अज्ञात भाषा में कुछ उत्कीर्ण है। पुरातत्व विभाग के बड़े से बडे़ वैज्ञानिक यहां आए लेकिन आज तक भी इस पत्थर पर लिखा कोई नहीं पढ सका। अगर इस पत्थर पर लिखा कोई पढ पाता तो शायद इस शक्तिपीठ की पौराणिकता के बारे में और कुछ भी पता चल सकता।

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