एनसीआर के तीन बड़े बिल्डर्स ने जीडीए को लगाया 450 करोड़ का चूना..भाजपा पार्षद ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

एनसीआर के तीन बड़े बिल्डर्स ने जीडीए को लगाया 450 करोड़ का चूना..भाजपा पार्षद ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र


सीबीआई जांच कराने की मांग

गाजियाबाद। एनसीआर के तीन नामचीन बिल्डर्स ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के तत्कालीन अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर करीब 450 करोड़ रुपये का चूना जीडीए को लगाया। इस पूरे खेल का रहस्योद्घाटन नगर निगम में भाजपा पार्षद दल के नेता सदन राजेंद्र त्यागी ने शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन में किया।

त्यागी ने मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को सबूतों के साथ एक पत्र भी लिखा है। प्रथम दृष्टया इस पूरे प्रकरण में एनसीआर के तीन प्रमुख बिल्डर शिप्रा ग्रुप, साया ग्रुप तथा रोज बेरी ग्रुप नाम उभर कर सामने आया है। त्यागी ने जीडीए से जुड़े सभी बड़े बिल्डर का ऑडिट कराने की मांग प्राधिकरण के उपाध्यक्ष से की है। उन्होंने कहा कि करीब बीस साल पहले शुरू हुआ यह खेल तीन साल पहले तक चला।

जीडीए ने कोर्ट के आदेश के बावजूद पहले शिप्रा को सस्ते में जमीन दी। शिप्रा ने उस जमीन को बिना मालिकाना हक के आगे बेच दिया। इस जमीन पर वर्तमान में काबिज साया बिल्डर ने 1.5 एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) की जगह 2.5 एफएआर लेकर फ्लैट बना दिया। उन्होंने बताया कि जीडीए ने वर्ष 1989 में राजस्व ग्राम मकनपुर की 1295 एकड़ भूमि अधिग्रहित कर इंदिरापुरम योजना की आधारशिला रखी। इसमें किसानों को 90 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर से मुआवजा निर्धारित किया गया। इस मामले में कुछ किसान हाई कोर्ट चले गए। 1991 में हाईकोर्ट ने इस भूमि का मुआवजा 297 रुपये निर्धारित किया। इसमें बाजारी मूल्य के हिसाब से अतिरिक्त प्रतिकर लगाते हुए इस जमीन के लिए अंतिम रूप से 2800 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा तय हुआ।

इस जमीन में से 375 एकड़ जमीन पर 14 मंजिला टावर का निर्माण हुआ लेकिन आकस्मिक घटना से एक बिल्डिंग गिरने के बाद यहां निर्माण कार्य रोक दिया गया। बाद में जीडीए ने जीटीपीएल नाम की एक कंपनी से 1994 में अनुबंध कर बिल्डिंग बनाने का एमओयू साईन किया। इसमें जीडीए ने मानकों का प्रयोग नहीं किया। जीडीए की महायोजना 2001 में भूमि का भूउपयोग कृषि था। जबकि 1989 में ही जमीन का अधिग्रहण आवासीय कालोनी बनाने के लिए किया गया था। एमओयू में जीडीए को इस कंपनी ने पूरा पैसा जमा नहीं कराया और भाग गई। बाद में कंपनी ने दोबारा एमओयू 1995 में किया। लेकिन इस बार भी कंपनी पैसा नहीं दे पाई। यहीं से जीडीए को नुकसान पहुंचाने का सिलसिला शुरू हुआ।

कंपनी के भागने के साथ नीलामी में ज्वाइंटवेचर के रूप में विकसित करने फैसला किया। उस समय शिप्रा ने बची हुई भूमि 22.31 हेक्टेयर जमीन पर बने अर्धनिर्मित टावर लिए। यह टावर वैभवखंड के भूखंड संख्या 10 एवं 17 पर बने थे। जीडीए ने यह भूमि शिप्रा को केवल 1900 रुपये प्रति वर्गमीटर के हिसाब से दी। इस ज्वाइंटवेंचर की शत थी कि इसकी बिक्री जीडीए करेगा, लेकिन शिप्रा ने इस शर्त का उल्लंघन किया। राजेंद्र त्यागी ने जीडीए की कार्यशैली पर सवाल उठाया है। उन्होंने बताया कि जिस जमीन का खरीद मूल्य 6920 रुपये वर्गमीटर 1989 में आता है। उसे 1900 रुपये में शिप्रा को देकर करोड़ों का नुकसान हुआ। वहीं शिप्रा ने आगे चलकर भूखंड संख्या 10 के दो हिस्से कर उसे रोजबेरी डेवेलपर्स प्रा.लि. के नाम कर दिया। यह पट्टा 2008 में किया गया। बात यही नहीं रुकी रोजबेरी डेवेलपर्स ने भी 2015 में इस जमीन मेसर्स साया बिल्डर के नाम से कर दिया गया। इस मामले में सबसे बड़ी गड़बड़ी एफएआर को लेकर हुई। शिप्रा को दिए गए 1.5 एफएआर की जगह 2.5 एफएआर कर बेच दिया। जीडीए ने भी इस मामले में बिना ध्यान दिए शिप्रा स्टेट को एफएआर 2.5 कर दी।

इस मामले में 446 करोड़ रुपया अतिरिक्त एफएआर देने में लिया जाना था, जो नहीं लिया गया। त्यागी ने कहा कि जीडीए जनता पर अनावश्यक शुल्क लगाने के बजाय यदि बिल्डर्स की अनियमितताओं की जांच कर उनसे राजस्व की वसूली करें तो जीडीए की माली खुद ब खुद सुधर जाएगी। उधर जीडीए उपाध्यक्ष कंचन वर्मा का कहना है कि शिकायती पर की प्रतिलिपि मिली है उसकी जांच कराई जाएगी।


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